Poetry

चन्द्रभान ख़याल की रचनाएँ

क़तरा क़तरा एहसास

फैल कर फिर शब-ए-तारीक हुई बहर-ए-सियाह
क़तरा क़तरा लब-ए-तन्हाई से टपके एहसास
और पल्कों की सलीबों पे वो गुज़रे हुए दिन
जैसे खंडरों की फ़सीलों पे टंगा हो इतिहास

दफ़्न है राख के अम्बार तले अज़्म की लाश
जुस्तुजू उस की करे आज किसे फ़ुर्सत है
रौशनी माँग न सूरज से न सितारों से
तीरा ओ तार मकानों में बड़ी राहत है

अब तो अल्फ़ाज़ के चेहरों की ख़राशें पढ़ कर
वक़्त को टाल दिया जाए गदागर की तरह
वर्ना वो लम्स जो शबनम से सुबुक-तर था कभी
आज फिर सीने पे गिर जाएगा पत्थर की तरह

नींद के तआक़ुब में

नींद के तआक़ुब में
दूर दूर तक ला-हासिल
देर से भटकता हूँ
नीली आँखों वाली
जंगली बिल्ली
बार बार दुम हिलाती है
मेरी चारपाई के नीचे
नीम रौशन लैम्प के इर्द-गिर्द
कीड़ों पे झपटती छिपकली
बे-ख़बर है अपने अंत से
कितना ग़ैर-मुतवक़्क़ें होगा
मिल जाना अनंत से

मिट्टी के तेल की गंध
क़ुलांचें भर रही है कमरे में
बे-लगाम घोड़ी की तरह
छत पर
रेंगती हुई ख़ामोशी
बार बार दोहरा रही है
पापी निशाचरों का गीत

और नींद मीलों दूर
किसी ना-मालूम दरख़्त के पत्तों में छुपी
चिड़ियों सा चहचहा रही है
मुझे बुला रही है

लौट चलिए

सोख़्ता-जाँ सोख़्ता-दिल
सोख़्ता रूहों के घर में
राख गर्द-ए-आतिशीं शोलों के साए
नक़्श हैं दीवारों पर मफ़रूक़ चेहरे
लौट चलिए अपने सब अरमान ले कर

झूठ है गुज़रा ज़माना
और किसी उजड़े क़बीले की भटकती रूह शायद
अपने मुस्तक़बिल का धुंदला सा तसव्वुर
बहर-ए-ग़म के दरमियाँ है
एक काले कोह की मानिंद ये इमरोज़ अपना
कोह जिस पर रक़्स करते हैं सितम-ख़ुर्दा तमन्नाओं के आसेब
लौट चलिए
अपने सब अरमान लेकर
सोचिए तो
यूँ अबस आतिश-कदों में क्यूँ जलें दिल
क्यूँ हें हर वक़्त सीनों पर चट्टानें
देखिए तो
चंद लुक़में कुछ किताबें
एक बिस्तर एक औरत
और किराए का ये ख़ाली तंग कमरा
आज अपनी ज़ीस्त का मरकज़ हैं लेकिन
तीरगी का ग़म इन्हें भी खा रहा है
चार जानिब ज़हर फैला जा रहा है
लौट चलिए
अपने सब अरमान ले कर
अपने सब पैमान ले कर
जिस्म ले कर जान ले कर

समंदर का सुकूत

आज फिर घात में बैठा है समुंदर का सुकूत
हम को इक दूसरे से दूर ही रहना होगा
हम को हर हाल में मजबूर ही रहना होगा

मुझ को इस दौर-ए-जराहत से गुज़र जाने दे
मुझ को जीने की तमन्ना नहीं मर जाने दे
मेरी तक़्दीर में ग़म हैं तो कोई बात नहीं
मुझ को ज़ुल्मत की गुफाओं में उतर जाने दे

तू न घबरा कि तिरे हुस्न की मिश्अल ले कर
तेरे हमराह कभी तेरे बिछौने के क़रीब
रात भर धूम मचाएगा मिरे जिस्म का भूत
आज फिर घात में बैठा है समुंदर का सुकूत

ज़र्फ़ बाक़ी न कोई अज़्म-ए-निहाँ बाक़ी है
सिर्फ़ एहसास के चेहरे पे धुआँ बाक़ी है
कोई साया है न साथी है न महफ़िल कोई
दिलकशी ख़त्म है फिर क्यूँ ये जहाँ बाक़ी है

ये जहाँ जिस में सब अतराफ़ तबाही के निशाँ
सूरत ओ शक्ल पे ज़ख़्मों की तरह फैले हैं
और हर ज़ख़्म है इंसान की वहशत का सुबूत
आज फिर घात में बैठा है समुंदर का सुकूत

तल्ख़ तन्हाई का इक दर्द लिए चेहरे पर
ले के फिरता हूँ मैं ज़ख़्मों के दिए चेहरे पर
रूह मजरूह जबीं ज़ख़्म-ज़दा दिल घाइल
फिर भी हँसता हूँ नई आस लिए चेहरे पर

ज़िंदगी है कि किसी शाह की बेगम जिस को
वक़्त बाज़ार में लाया है बरहना कर के
और ख़ामोश हैं तहज़ीब ओ तमद्दुन के सपूत
आज फिर घात में बैठा है समुंदर का सुकूत

वक़्त कहता है हमें दूर ही रहना होगा
हम को हर हाल में मजबूर ही रहना होगा

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