चांद शेरी की रचनाएँ

मेरे लि‍ए कभी

बरसात होगी अश्‍क की मेरे लि‍ए कभी।
रोया करेंगे आप भी मेरे लि‍ए कभी।
ढक जायेगी गुलों से मेरी क़ब्र देखना,
ऐसी बहार आएगी मेरे लि‍ए कभी।
ऐ ज़ख्‍़म दे के भूलने वाले ज़रा बता,
मरहम की तूने फ़ि‍क्र की मेरे लि‍ए कभी।
दोज़ख़ बनी है आज वो मेरे फ़ि‍राक़ में,
दुनि‍या जो एक स्‍वर्ग थी मेरे लि‍ए कभी।
‘शेरी’ न था खयाल कि‍ महँगी पड़ेगी यूँ,
इक बेवफ़ा की दोस्‍ती मेरे लि‍ए कभी।

कराता भगवान है / 1

सुनो बच्चो। तुम मत करो कोई बुराई
बुराई से बढती है जग में लडाई

गड़ी फाँस मन में तो मतभेद होते
मतभेद होते तो होती जुदाई

बदल जाते व्यवहार आपस में सबके
नहीं साथ रह पाते हैं भाई भाई

उचित मान सम्मान जब होता सबका
तो हर एक के मन में उपजती भलाई

मन को भी खुद शांति मिलती है तब ही
किसी के लिये खोदी जाये न खाई

खुशी और उत्साह से हो जो सहयोग
कठिनाई कोई तो कभी आ न पायी

मन में अगर सबकी शुभ कामना हो
तो दिखती न ओैरों में कोई बुराई

इससे सम्हल के चलो राह अपनी
जिससे हो खुद की ओैं सबकी भलाई

यही रीति सीधी औं सच्ची है सबसे
जो देती सुख शांति सबको हे भाई

आती हैं घड़ियां मिलन की बडे शुभ संयोग से

खुशी मिलती मन को सबके स्नेह औ सहयोग से
बढ़ा करती दूरियाँ नित द्वेश और वियोग से

फूलो से ले सीख अपनी जिदंगी महकाइये
बाड कांटो की लगाकर चुभन मन बिखराइये
बढती नई पीडायें सूनेपन से औं नये रोग से

अपसी सद्भाव से बढते है मन के हौसले
मन अगर हो निश्कपट तो होते सच्चे फैसले
प्रेम बढता है हमेशा प्रेम के ही प्रयोग से

सच्चाई के रास्ते में आते कई एक विघ्न है
क्योंकि सद्भाव संग शंकाये भी संलग्न है
विघ्न होते कम सदा सबके हो तो सहयोग से

आये शुभ अवसर का सबको लाभ लेना चाहिये
मन के हर कटुता कलुश को त्याग देना चाहिये
सुख नहीं मिलता कभी दुर्भाव के उपयोग से

आती हैं घडियाँ मिलन की शुभ बड़े संयोग से
है अमित सुख शांति सबको स्नेह के उपयोग से

कराता भगवान है / 2

आदमी माध्यम है सब कुछ कराता भगवान है
उस अलोकिक शक्ति से हर आदमी अनजान है

घटित हो जाती कई घटनाये सहज प्रसंग से
जिनके हो सकने का होता कोई नहीं अनुमान है

काम ऐसे भी कि जिनकी कोई नहीं संभावना
औं किसी का भी कभी जाता जहॉ नहि ध्यान है

कैसे हो जाते है वे सब काम बिना प्रयास ही
मन को लगता सब किसी ने कर दिया आसान है

यह समझ आता तभी जब काम हो जाता है सब
तब समझ आता कि सच में आदमी नादान है

डरता रहता आदमी कि कैसे होगा काम यह
पर कृपा से उसकी जुट जाता सहज सामान है

समझता यह बस वही जिसपर परिस्थिति बीतती
औरों को तो बना रहता हर तरफ अज्ञान है

करा देता कठिन अवसर पै भी जो सब बिन कहे
किंतु जो दिखता नहीं बस वही तो भगवान है

नया जमाना

जब से मन ने खो दिया संतोष का अनुपम खजाना
रह गया है काम सबका एक केवल धन कमाना

जो था शांति का पुजारी बन गया मजदूर मानव
फेर ये अटपट समय का आ गया कैसा जमाना?

बढ गया संघर्श जीवन में है नित नई समस्यायें
कठिन-सा अब हो गया अपनों से भी मिलना मिलाना

बिखरते जाते दिनो दिन आपसी सम्बंध सारे
याद तक करता कोई अपनों का रिश्ता पुराना

कुछ तो है मजबूरियाँ कुछ मन की है बेईमानी
देखकर भी सीखते जाने कई ऑखे चुराना

धीरे धीरे मिटती जाती है पुरानी मान्यतायें
अब नहीं है आपसी सुख दुख का सुनना सुनाना

चलते चलते ही हुआ करती कभी कोई मुलाकाते
हलो हलो ‘बाय’ कहकर ही चला अब निकल जाना

नये युग की हवा में उड गई सब संवेदनाये
देखते ही

ओछी समझ पाकिस्तान की  

बातें करता रहता जो नित ऐंठ औं अभिमान की
ना समझदारी ही उसमें दिखती पाकिस्तान की

हमने ऑगन में ही अपने दी उसे रहने जगह
पर झलक आती है उसकी ऑखो में शैतान की

करता रहता सरहदो पर ओछी हरकत आये दिन
शायद उसको नहीं चिंता खुद के भी अपमान की

अमरीका की इनायत पै चलता आया आज तक
भुला कर परवाह सारे विश्व के कल्याण की

आये दिन बदनियत से करता है वह घुसपैठ जो
बताता हैं नियत उसकी है नहीं ईमान की

पडोसी भर क्या? खफा उससे है अब सारा जहॉ
उसकी कीमत रह गई है अदना एक नादान की

बेशरम इतना कि करता जा रहा नई उलझनें
औं जुटाता जा रहा नये मौत के सामान ही

अहित अपना कर रहा है कर रहा जग का बुरा
खो गई है समझ शायद कल के भी अनुमान की

देखते आ गया यह कैसा जमाना?

सही संस्कार आवश्यक है

प्रेम को बसरा के बॅटता जा रहा संसार है
इससे घटता जा रहा सद्भाव, ममता, प्यार है

मन में बटती जा रही नित स्वार्थ की ही भावना
भुला यह कि औरों को भी जीने का अधिकार है

मस्त है हर आदमी अपने रचे संसार में
होड है बस धन कमाने हर एक जान बीमार है

सुख के सब नये साधन को जुटाने की चाह में
अनैतिकता से कमाने का बढ़ा व्यवहार है

बदलती जातीं पुरानी मान्य सब परिपाटियाँ
इससे बढते जा रहे नित नये अत्याचार हैं

स्वतः मरकर दूसरों को मारने में क्या है सुख?
समझ पाना कठिन है आतंक का ये विचार है

हिंसा से तो फैलते दुख मेल में ही शांति है
आपसी सद्भाव, ममता, प्रेम का आधार है

सारी दुनियाँ ग़लत रस्ते पै ही बढती जा रही
आदमी को सही पथ पै चलाता संस्कार है

 

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