Poetry

जगत मोहन लाल ‘रवाँ’की रचनाएँ

गुल-ए-वीराना हूँ कोई नहीं है क़द्र-दाँ मेरा

गुल-ए-वीराना हूँ कोई नहीं है क़द्र-दाँ मेरा
तू ही देख ऐ मेरे ख़ल्लाक हुस्न-ए-राएगाँ मेरा

ये कह कर रूह निकली है तन-ए-आशिक़ से फ़ुर्कत में
मुझे उजलत है बढ़ जाए न आगे कारवाँ मेरा

हवा उस को उड़ा ले जाए अब या फूँक दे बिजली
हिफ़ाजत कर नहीं सकता मेरी जब आशियाँ मेरा

ज़मीं पर बार हूँ और आसमाँ से दूर ऐ मालिक
नहीं मालूम कुछ आख़िर ठिकाना है कहाँ मेरा

मुझे नग़मे का लुत्फ़ आता है रातों की ख़मोशी में
दिल-ए-शिकस्ता है इक साज़-ए-आंहब फ़ुँगा मेरा

वहीं से इब्तिदा-ए-कूचा-ए-दिलदार की हद है
क़दम ख़ुद चलते चलते आ के रूक जाए जहाँ मेरा

ज़रा दूर और है एक कश्ती-ए-उम्र-ए-रवाँ साहिल
के इस बहर-ए-जहाँ में हर नफ़स है बादबाँ मेरा

हुई जाती है तन्हाई में लज़्ज़त रूह की ज़ाए
लुटा जाता है वीराने में गंज-ए-शाएगाँ मेरा

अनासिर हँसते हैं दुनिया की वुसअत मुस्कुराती है
किसी से पूछते हैं अहल-ए-बेनश जब निशाँ मेरा

मेरे बाद और फिर कोई नज़र मुझ सा नहीं आता
बहुत दिन तक रक्खेंगे सोग अहल-ए-ख़ानदाँ मेरा

ग़नीमत है नफ़स दो-चार बाक़ी हैं अब वरना
कभी का लुट चुका सरमाया-ए-सोद-ओ-ज़ियाँ मेरा

अभी तक फ़स्ल-ए-गुल में इक सदा-ए-दर्द आती है
वहाँ की ख़ाक से पहले जहाँ था आशियाँ मेरा

‘रवाँ’ सच है मोहब्बत का असर जाए नहीं होता
वो रो देते हैं अब भी ज़िक्र आता है जहाँ मेरा

होता तो वही जो कुछ क़िस्मत में लिखा होता

होता तो वही जो कुछ क़िस्मत में लिखा होता
तदबीर अगर करता कुछ रंज सिवा होता

ऐ फ़लसफ़ा-ए-फ़ितरत कुछ बात न गर होती
इस ख़ाक के पुतले को ये हुस्न अता होता

अल्लाह की मर्ज़ी में फ़रयाद ये क्या माने
जब बस न था कुछ अपना तो सब्र किया होता

शर्मिंदा-ए-दरमान क्यूँ ख़ालिक़ ने किया हम को
जिस की न दवा होती वो दर्द दिया होता

परवर्दा-ए-इसयाँ है दुन्या-ए-ख़ता मसलक
ऐ काश के मैं इस में पैदा न हुआ होता

अच्छा है रवाँ तुम ने मय-ख़ाने से मुँह मोड़ा
आग़ाज तो जो कुछ था अंजाम बुरा होता

इसी हवस में के हो उस हसीन के क़ाबिल

इसी हवस में के हो उस हसीन के क़ाबिल
ये दिल रहा है न दुनिया न दीन के क़ाबिल

जुनून-ए-सजदा ज़माने की ख़ाक छान चुका
कहीं ज़मीं न मिली इस जबीन के क़ाबिल

ये कह के सुब्ह ने की ख़त्म शम्मा की हस्ती
ये दाग़-ए-ख़ूँ है मेरी आस्तीन के क़ाबिल

वो मैं के दिल के धड़कने से चौंक पड़ता हूँ
कहाँ से लाऊँ फ़ुगाँ सामईन के क़ाबिल

उतार देते हैं लाशा मेरा कहाँ अहबाब
ये आसमान नहीं इस ज़मीं के क़ाबिल

‘रवाँ’ सिवाए अजल इस जहाँ-ए-फ़ानी में
नहीं है और कोई शय यक़ीन के क़ाबिल

जीने में थी न नज़ा के रंज ओ महान में थी

जीने में थी न नज़ा के रंज ओ महान में थी
आशिक़ की एक बात जो दीवाना-पन में थी

सादा वरक़ था बाहमा गुल-हा-ए-रंग-रंग
तफ़सीर जान पाक बयाज़-ए-कफ़न में थी

बढ़ता था और ज़ौक-ए-तलब बेकसी के साथ
कुछ दिल-कशी अजीब नवाह-ए-वतन में थी

बीमार जब हैं करते हैं फ़रयाद चारा-गर
क्या दास्तान-ए-दर्द सुकूत-ए-महन में थी

कहता था चश्म-ए-शौक़ से वो आफ़ताब-ए-हुस्न
हलकी सी इक शुआअ थी जो अंजुमन में थी

कुछ इजि़्तराब-ए-इश्क़ का आलम ने पूछिये
बिजली तड़प रही थी के जान इस बदन में थी

किस से कहूँ के थी वही गुल-हा-ए-रंग-रंग
बिखरी हुई जो ख़ाक सवाद-ए-चमन में थी

किसी तरह न मेरे दिल को जब क़रार आए

किसी तरह न मेरे दिल को जब क़रार आए
मेरी बला से ख़जाँ आए या बहार आए

किसी आलम-ए-फ़ितरत का तक़ाज़ा है
जिधर निगाह-ए-करम हो उधर बहार आए

नफ़स नफ़स मुतग़य्युर है आलम-ए-फ़ानी
किसी को आए तो किस तरह ऐतबार आए

तेरे करम के तसद्दुक़ तेरे करम के नसार
उम्मीद-वार गए हम उम्मीद-वार आए

नजात रूह को हस्ती की कशमकश से कहाँ
आदम में जा के फ़क़त नीस्ती उतार आए

वो बादा-नोश-ए-हक़ीक़त है इस जहाँ में ‘रवाँ’
के झूम जाए फ़लक गर उसे ख़ुमार आए

 

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