जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’की रचनाएँ

उच्छवासों से

ऐ उर के जलते उच्छ्वासों जग को ज्वलदांगार बना दो,
क्लान्त स्वरों को, शान्त स्वरों को, सबको हाहाकार बना दो,
सप्तलोक क्या भुवन चतुर्दश को, फिरकी सा घूर्णित कर दो,
गिरि सुमेर के मेरुदण्ड को, कुलिश करों से चूर्णित कर दो,
शूर क्रूर इन दोनों ही को, रणशय्या पर शीघ्र सुला दो,
इनकी माँ, बेटी, बहनों, वधुओं को, हा हा रुदन रुला दो,
मानव-दानव-दल में घुसकर बन-बन तीर कलेजे छेदो,
छूरी बनकर छाती छेदो, भाले बनकर भेजे भेदो,
कोई भी बेलगाम बचे मत, प्रलयंकर हो लाय लगा दो,
उठा उठाकर आज पदस्थों को पटको, पददलित बना दो,
थल को जल, जल अग्नि, अग्नि को वायु, वायु अविचलित बना दो,
उससे शून्य, शून्य नभ को फिर, कर भैरव-रव तीव्र हिला दो,
इससे मिट्टी न बन सके फिर, मिट्टी में इस भाँति मिला दो,
दुख मत रक्खो, सुख मत रक्खो, संसृति की कुछ बात न रक्खो,
साँझ न रक्खो, प्रात न रक्खो, ये दुर्दिन दिन-रात न रक्खो।

बरहमपुर-बंगाल जेल
रचनाकाल : 1931

शहीदों की चिताओं पर

उरूजे कामयाबी पर कभी हिन्दोस्ताँ होगा
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियाँ होगा

चखाएँगे मज़ा बर्बादिए गुलशन का गुलचीं को
बहार आ जाएगी उस दम जब अपना बाग़बाँ होगा

ये आए दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ ख़ंजरे क़ातिल
पता कब फ़ैसला उनके हमारे दरमियाँ होगा

जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज़
न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ औ तू कहाँ होगा

वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है
सुना है आज मक़तल में हमारा इम्तिहाँ होगा

शहीदों की चिताओं पर लगेगें हर बरस मेले
वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा

कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे
जब अपनी ही ज़मीं होगी और अपना आसमाँ होगा

रवि रश्मि किरीट धरे

रवि रश्मि किरीट धरे द्युति कुन्तलों की नव नीर धरों पय लिए
श्रुति भार हितैषी स्ववादित वीण का किन्नरों से भ्रमरों पय लिए
उतरी पड़ती नभ से परी सी मानो स्वर्ण प्रभात परों पय लिए
किरणों के करों सरों के जलजात उषा की हँसि अधरों पय लिए

दुखिनी बनी दीन कुटी में कभी

दुखिनी बनी दीन कुटी में कभी, महलों में कभी महरानी बनी।
बनी फूटती ज्वालामुखी तो कभी, हिमकूट की देवी हिमानी बनी

चमकी बन विद्युत रौद्र कभी, घन आनंद अश्रु कहानी बनी।
सविता ससि स्नेह सोहाग सनी, कभी आग बनी कभी पानी बनी।

भवसिंधु के बुदबुद प्राणियों की तुम्हें शीतल श्वाँसा कहें, कहो तो।
अथवा छलनी बनी अंबर के उर की अभिलाषा कहें, कहो तो।

घुलते हुए चंद्र के प्राण की पीड़ा भरी परिभाषा कहें, कहो तो।
नभ से गिरती नखतावलि के नयनों कि निराशा कहें, कहो तो

परिचय

हूँ हितैषी सताया हुआ किसी का,
हर तौर किसी का बिसारा हुआ .
घर से हूँ किसी के निकाला हुआ,
दर से किसी के दुत्कारा हुआ.
नजरों से गिराया हुआ किसी का,
दिल से किसी का हूँ उतारा हुआ.
अजी, हाल हमारा हो पूछते क्या!
हूँ मुसीबत का इक मारा हुआ.

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