जगदीश पंकज की रचनाएँ

आज अपना दर्द हम किसको सुनाएँ

आज अपना दर्द हम किसको सुनाएँ
पल रही सबके दिलों में वेदनाएँ

पुस्तकों से बन्द होते जा रहे हैं
लोग पढ़ पाते नहीं हैं भूमिकाएँ

आस्थाएँ मौन घुटती जा रही हैं
मुक्ति की धूमिल हुई संभावनाएँ

रात का आँचल पड़ा है भोर के मुख
ब्राह्म-वेला में कहो क्या गुनगुनाएँ

कोई कविता प्राण की कैसे सुनेगा
घिर रही चारों तरफ आलोचनाएँ

आज हम किससे कहें अपनी कहानी
मिल रही सबकी निराशक सूचनाएँ

कुछ घटना कुछ क्षण होते हैं

कुछ घटना कुछ क्षण होते हैं
जो सारा जीवन होते हैं

किसको फेंकें किसे सहेजें
सपने बिखरे कण होते हैं

लोकतन्त्र में मतदाता तो
मत देने को गण होते हैं

किसको ओढें, किसे बिछाएँ
वे जो नंगे तन होते हैं

अपनी-अपनी राम कहानी
अपने गीत-भजन होते हैं

लो बोझ आसमान का, डैनों पे तोलकर

लो बोझ आसमान का, डैनों पे तोलकर ।
उड़ने लगा विहंग, आज पंख खोलकर ।

मौसम की बात साफ-साफ,कह के देखिए
सुख ही मिलेगा आपको, कटु-सत्य बोलकर ।

कितनी उमस है, धुन्ध-धुआँ आसमान में
ऊबे नहीं हैं लोग, अभी ज़हर घोलकर ।

हम हादसों से हरकतों में, आ गए मगर
संदिग्ध उँगलियों को भी, देखें टटोलकर ।

चाही थी स्वप्न में कभी, उजली कोई सुबह
‘पंकज’ उसी की आस में, बैठे हैं डोलकर ।

वक़्त को कुछ और, थोड़ी-सी हरारत चाहिए

वक़्त को कुछ और, थोड़ी-सी हरारत चाहिए ।
अब ये लाज़िम है कि, हर शै को शरारत चाहिए ।

आईने में देखकर चेहरा, वो शर्माने लगे
जैसे शीशे पर उन्हें, कोई इबारत चाहिए ।

आज जिस्मो-जान, तहज़ीब-ओ-तमद्दुन बिक रहे
और मेरे दौर को, कैसी तिज़ारत चाहिए ।

हिल गई दीवार, औ’ बुनियाद भी हिलने लगी
टिक सके तूफ़ान में, ऐसी इमारत चाहिए ।

लोग फिरते हैं, नक़ाबों को यहाँ पहने हुए
कर सके जो बेहिज़ाबी, वह महारत चाहिए ।

आप करते हैं हिक़ारत, आदमी से किसलिए
जबकि अपनी ही हिक़ारत से, हिक़ारत चाहिए ।

हम बहस करते रहे ‘पंकज’ जहाँ चलता रहा
तय करो अहले-वतन किस ढंग का भारत चाहिए ।

शब्द जल जाएँगे हवाओं से

शब्द जल जाएँगे हवाओं से
आप गुज़रेंगे बस तनावों से

मैं फ़कत आईना दिखाता हूँ
ख़ुद को ख़ुद पूछिए अदाओं से

आपकी चीख़ शोर में गुम है
लोग चिपके हैं अपने घावों से

यह महज इत्तिफ़ाक ही होगा
खड़े होगे जो अपने पावों से

खंजरों से तो बच भी जाओगे
बचना मुश्किल है इन अदाओं से

आग बाहर हो या कि भीतर हो
हम सभी घिर गए शुआओं से

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