Poetry

जमील मज़हरी की रचनाएँ

तोल अपने को तोल

देख के कर्रोफ़र दौलत की तेरा जी ललचाय
सूँघ के मुश्की ज़ुल्फ़ों की बू नींद-सी तुझ को आए
जैसे बे-लंगर की किश्ती लहरों में बोलाय
मन की मौज में तेरी नीयत यूँ है डावाँडोल
तोल अपने को तोल,

यह गेसू[1], यह बिखरे गेसू, नाग हैं, काले नाग
इन तिरछी-तिरछी नज़रों को लाग है, तुझसे लाग
रूप की इस सुंदर नगरी से, भाग रे शाइर भाग
तुझसे तुझको छीन रहे हैं, यह परियों के गोल
तोल अपने को तोल ।

औरत

है तेरे जल्वा-ए-रंगी[1] से उजाली दुनिया
तुझसे आबाद है शाइर की ख़याली दुनिया

नग़्म:-ए-रूहे अमल[2], बू-ए-गुलिस्तान-ए-हयात[3]
गर्मि-ए-बज़्मे जहाँ[4] शमः-ए-शबिस्तान-ए-हयात[5]

तू है मासूम, तिरी सारी अदाएँ मासूम
इन्तहा ये है कि होती है ख़ताएँ मासूम

हुस्न किरदार निहाँ[6] हुस्न तबीयत में[7] तेरे
मय-ए-सर जोश-ओ-वफ़ा शीशः-ए-इस्मत[8] में तेरे

अपने हाथों से ख़ुदा ने है बनाया तुझको
हम कहेंगे दिल-ए-फ़ितरत की तमन्ना तुझको

माहे-कामिल[9] से तड़प, बर्क़ से[10] ग़ैरत माँगी
सीनः-ए-मिहर से[11] थोड़ी-सी हरारत माँगी

रूह[12] फूलों की बनी, जिससे वह ख़ुशबू लेकर
दिल-ए-शाइर के अमानत थे जो आँसू लेकर

गूँधा क़ुदरत ने तिरी शोख़ तबीयत का ख़मीर
और तिरी ख़ाक के ज़र्रों से मुहब्बत का ख़मीर

दहर में[13] मक़सदे-तख़लीक की[14] हामिले[15] है तू
जिसके आगोश में[16] कुलज़म[17] है, वह साहिल[18] है तू

चढ़ के परवान तेरी गोद से इन्साँ निकला
तूने जिस फूल को सींचा वह गुलिस्ताँ निकला

मानि-ए-लफ़्ज़-ए-सकूँ राज-ए-मुहब्बत है तू
है ये मुज्मल[19] तेरी तारीफ़ कि औरत है तू

बदल जाते हैं दिल-ए-हालात जब

बदल जाते हैं दिल-ए-हालात जब करवट बदलते हैं
मोहब्बत के तसव्वुर भी नए साँचों में ढलते हैं

तबस्सुम जब किसी का रूह में तहलील होता है
तो दिल की बाँसुरी से नित नए नग़मे निकलते हैं

मोहब्बत जिन के दिल की धड़कनों को तेज़ रखती है
वो अक्सर वक़्त की रफ़्तार से आगे भी चलते हैं

उजाले के पुजारी मुज़्महिल क्यूँ हैं अँधेरे से
के ये तारे निगलते हैं तो सूरज भी उगलते हैं

इन्ही हैरत-ज़दा आँखों से देखे हैं वो आँसू भी
जो अक्सर धूप में मेहनत की पेशानी से ढलते हैं

मोहब्बत तो तलब की राह में इक ऐसी ठोकर है
के जिस से ज़िंदगी की रेत में ज़मज़म उबलते हैं

ग़ुबार-ए-कारवाँ हैं वो न पूछो इज़्तिराब उन का
कभी आगे भी चलते हैं कभी पीछे भी चलते हैं

दिलों के ना-ख़ुदा उठ कर सँभालें कश्तियाँ अपनी
बहुत से ऐसे तूफ़ाँ ‘मज़हरी’ के दिल में पलते हैं

ग़ौर तो कीजे के ये सजदा रवा क्यूँ कर

ग़ौर तो कीजे के ये सजदा रवा क्यूँ कर हुआ
उस ने जब कुछ हम से माँगा तो ख़ुदा क्यूँ कर हुआ

ऐ निगाह-ए-शौक़ इस चश्म-ए-फ़ुसूँ-परदाज़ में
वो जो इक पिंदार था आख़िर हया क्यूँ कर हुआ

इक तराज़ू इश्क़ के हाथों में भी जब है तो वो
आलम-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ से मावरा क्यूँ कर हुआ

दीन ओ दानिश दोनों ही हर मोड़ पर थे दिल के साथ
यक-ब-यक दीवाना दोनों से ख़फ़ा क्यूँ कर हुआ

रह-ज़नों के ग़ोल इधर थे रह-बरों की भीड़ उधर
आ गए मंज़िल पे हम ये मोजज़ा क्यूँ कर हुआ

ख़ार-ज़ार-ए-दीन-ओ-दानिश लाला-ज़ार-ए-हुस्न-ओ-इश्क़
दिल की इक वहशत से तय ये मरहला क्यूँ कर हुआ

अपने ज़ेहनी ज़लज़लों का नाम जो रख लो मगर
दो दिलों का इक तसादुम सानेहा क्यूँ कर हुआ

तेरी महरूमी उसे जो भी कहे लेकिन ‘जमील’
ग़ैर से उस ने वफ़ा की बे-वफ़ा क्यूँ कर हुआ

हस्ती है जुदाई से उस की जब वस्ल हुआ

हस्ती है जुदाई से उस की जब वस्ल हुआ तो कुछ भी नहीं
दरिया में न था तो क़तरा था दरिया में मिला तो कुछ भी नहीं

इक शम्मा जली तो महफ़िल में हर सम्त उजाला फैल गया
क़ानून यही है फ़ितरत का परवाना जला तो कुछ भी नहीं

सैलाब में तिनके रक़्साँ थे मौजों से सफीने लरज़ाँ थे
इक दरिया था सौ तूफ़ान थे दरिया न रहा तो कुछ भी नहीं

असलियत थी या धोका था इक फ़ितना-ए-रंगीं बरपा था
सौ जलवे थे इक पर्दा था पर्दा न रहा तो कुछ भी नहीं

तूफ़ाँ भी था आँधी भी थी बाराँ भी था बिजली भी थी
आई जो घटा तो सब कुछ था बरसी जो घटा तो कुछ भी नहीं

फूलों से चमन आबाद भी थे दाम अपना लिए सय्याद भी थे
सब कुछ था ‘जमील’ इस गुलशन में बदली जो हवा तो कुछ भी नहीं

जिस सम्त नज़र जाए मेला नज़र आता है

जिस सम्त नज़र जाए मेला नज़र आता है
हर आदमी उस पर भी तन्हा नज़र आता है

सौदा-ए-दिल-ओ-दीं या सौदा-ए-दिल-ओ-दुनिया
आशिक़ को तो दोनों में घाटा नज़र आता है

अँधों को तेरे ऐ हुस्न अब मिल गई बीनाई
अब इश्क़ का हर जज़्बा नंगा नज़र आता है

पस्ती से अगर देखो नीचा भी है कुछ ऊँचा
ऊँचा भी बुलंदी से नीचा नज़र आता है

क्या शिकवा तअक़्क़ुल के ख़ामोश तहय्युर से
जब अपना तसव्वुर भी गूँगा नज़र आता है

ऐ नाज़-ए-ख़ुद-आराई दे ज़र्फ़ को पहनाई
घुटता हुआ क़तरे में दरिया नज़र आता है

रहमत भी तेरी शायद कुछ कान की ऊँची है
इंसाफ़ भी तेरा कुछ अँधा नज़र आता है

नालाँ हैं ‘जमील’ अपनी आँखों से के अब उन को
सूरज का पुजारी भी अँधा नज़र आता है

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