जयंत परमार की रचनाएँ

ग़ालिब

जब भी तुझको पढ़ता हूँ
लफ़्ज़-लफ़्ज़ से गोया
आसमाँ खिला देखूँ
एक-एक मिसरे में
कायनात का साया
फैलता हुआ देखूँ!

 

ग़ालिब की मज़ार

राग दरबारी में
शाम सायाफिगन
काले बादल पे तारा
शफ़क़ सुर्ख़-रू
गुनगुनाती रदीफ़ों के
जाम-ओ-सुबू
महफ़िले-शब चराग़ाँ
फ़क़ीरों की धुन
ये ज़मीं-आसमाँ
काफ़ियों के नुजूम

मेरा बर्गे-दिल
सो रहा है यहाँ
आख़िर नींद में
रेख़्ता के हसीं
पेड़ की छाँव में
चाँद के गाँव में

नज़र-ए-ग़ालिब

तुंद शोले मेरी लह्द में थे
तौफ़-ओ-तावीज़ भी सनद में थे

दिल ने चाहा छुपा लूँ आँखों में
वे सितारे जो दिल की हद में थे

इन जुनूँ सरपसंद था गोया
कुछ शफ़क़ हौसले शबद में थे

जब भी पढ़ता हूँ ताज़ा लगते हैं
रंग क्या-क्या मियाँ असद में थे

पेंसिल-1

बेंच पे बैठी
ब्ल्यू जींस वाली लड़की
पेंसिल छीलती है
और उसमें से
फूटता है इक काला फूल
पेंसिल लिखती है
काले-काले अक्षर
कोरे काग़ज़ पर
जैसे काली तितलियाँ!

पेंसिल लिखती है
सफ़ेद अक्षर
आसमान के कैनवस पर
जैसे सूरज चाँद सितारे!!

पेंसिल लिखती है
पंख सुनहरी
कायनात की बाँहों पर
जैसे लड़की के सपने!!!

पेंसिल-2 

मेरी बच्ची
प्यारी-सी नन्हीं बच्ची
शार्पनर से
सुलगाती है इक पेंसिल

सफ़ेद काग़ज़ के आकाश में
रौशनी फैलने लगती है–

पेड़ को लेकर उड़ती काली चिड़िया
मोर की आँखो पर चश्मा
हवा में उड़ता अग्निरथ
सड़क पर चलता एरोप्लेन
गाय से बातें करता बाघ
काले दरख़्त पे
एक आँख वाला सूरज
उस पर बादल का टुकड़ा
बादल के माथे पर उड़ती नीली मछली
झरने की लहरों पे तैरती पीली तितली

मेरी प्यारी-सी बच्ची
अपनी मस्ती में क्या-क्या
खींच रही है तस्वीरें!

लेकिन जब भी
स्कूल का मास्टर
होमवर्क देता है उसको
मेरी प्यारी-सी गुड़िया
अकसर यूँ ही ग़ुस्से में
नोक तोड़कर रख देती है
और पेंसिल की मोमबत्ती बुझ जाती है
सफ़ेद काग़ज़ के आकाश में
रह जाता

तेरा नाम

फूल की पत्ती-पत्ती पर
अपनी उँगलियों से
लिखता हूँ तेरा नाम!

फूल तो झड़ जाता है
लेकिन तेरा नाम
ख़ुशबू बनकर
फैल रहा है चारों ओर!

है सिर्फ़ धुआँ!

 

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