Poetry

जहीर कुरैशी

पप्पी करे शिकायत

पापा के घर में घुसते ही बोल उठी पप्पी-
पापा-पापा, आज हमें मम्मी ने मारा था।
हम तो खेल रहे थे अपनी शीलू गुड़िया से
शीलू गुड़िया से यानी आफत की पुड़िया से।
तभी आ गई थी रीता की नानी अपने घर,
मम्मी इकदम उलझ पड़ी थी नानी बुढ़िया से।
‘अबरीना के घर जाएगी तो तोडूँगी टाँग’,
हाँ पापा यह कहकर मम्मी ने दुतकारा था।
पापा जब अपनी मम्मी गुस्सा होा जाती हैं
उनका चेहरा लाल तवे जैसा हो जाता है।
तब अकसर मम्मी जी मुँह ढककर सो जाती हैं,
फिर मुझको क्या करना, मुझको समझ न आता है।
आज भी मम्मी गुस्सा करके लेटी थी पापा-
मैंने उन्हें छुआ तो चाँटा पड़ा करारा था।
वैसे पापा, अपनी मम्मी अच्छी मम्मी हैं,
मुझे प्यार करती हैं, मेरी पप्पी लेती हैं!
मुझे रात में परियों वाली कथा सुनाती हैं,
शाला जाते समय मुझे टॉफी भी देती हैं।
लेकिन जब भी मम्मी जी को गुस्सा आता है-
मुझको लगता है-मुझ पर ही गुस्सा सारा था।

सपने में

बबलू के ‘पर’ उग आते हैं सपने में,
बबलू पंछी बन जाते हैं सपने में।

पिंटू सपने में परियों से मिलते हैं,
उनको अपने घर लाते हैं सपने में।

अकसर सात महीने के आशू बेटे,
सोते-सोते मुस्काते हैं सपने में।

नीटू जी छत की मुँडेर से गिरते ही,
‘ओ मम्मी जी’ चिल्लाते हैं सपने में।

चिंटू पापा बनकर छड़ी उठाते हैं
पापा चिंटू बन जाते हैं सपने में।

बच्चे दिन में जो भी गलती करते हैं,
अकसर उस पर पछताते हैं सपने में!

कुकडूँ-कूँ

मुर्गा है एलार्म-घड़ी
बातें करता बड़ी-बड़ी!

तड़के बाँग लगाता यूँ
कुकडूँ-कूँ, भई, कुकडू़ँ-कूँ!

कहता है-जागो भाई,
सुबह कर रही अगुवाई!

सुबह-सुबह यदि सोते हो,
तन में आलस बोते हो!

बात पते की कहता हूँ,
कुकडू़ँ-कूँ, भई, कुकडू़-कूँ!

जो जगते हैं सुबह-सुबह,
उन्हें नहीं आलस का भय!

दिन भर ताजा रहते हैं,
नदियों जैसे बहते हैं!

मैं भी ताजा रहता हूँ,
कुकडू़ँ-कूँ, भई, कुकडू़-कूँ!

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