ज़क़ी तारिक़ की रचनाएँ

बे-मकाँ मेरे ख़्वाब होने लगे

 बे-मकाँ मेरे ख़्वाब होने लगे
रत-जगे भी अज़ाब होने लगे

हुस्न की महफ़िलों का वज़्न बढ़ा
जब से हम बार-याब होने लगे

है अजब लम्स उन के हाथों का
संग-रेज़े गुलाब होने लगे

अब पिघलने लगे हैं पत्थर भी
राब्ते कामयाब होने लगे

मेरा सच बोलना क़यामत था
कैसे कैसे इताब होने लगे

ज़िक्र था उन की बे-वफ़ाई का
आप क्यूँ आब आब होने लगे

पुर-सुकूँ हिज्र साअतें देखूँ
वस्ल लम्हे अज़ाब होने लगे

हम भी कहने लगे हैं रात को रात
हम भी गोया ख़राब होने लगे

कुछ ज़ुबाँ से निकल गया था यूँही
क्यूँ ख़फ़ा आँ जनाब होने लगे

ऐ ‘ज़की’ मुझ को मिल गई मेराज
मेरे शेर इंतिख़ाब होने लगे

भरे तो कैसे परिंदा भरे उड़ान

 भरे तो कैसे परिंदा भरे उड़ान कोई
नहीं है तीर से ख़ाली यहाँ कमान कोई

थीं आज़माइशें जितनी तमाम मुझ पे हुईं
न बच के जाएगा अब मुझ से इम्तिहान कोई

ये तोता मैना के क़िस्से बहुत पुराने हैं
हमारे अहद की अब छेड़ो दास्तान कोई

नए ज़माने की ऎसी कुछ आँधियाँ उट्ठीं
रहा सफ़ीने पे बाक़ी न बादबान कोई

बिखर के रह गईं रिश्तों की सारी ज़ंजीरें
बचा सका न रिवायत को ख़ानदान कोई

‘ज़की’ हमारा मुक़द्दर हैं धूप के ख़ेमे
हमें न रास कभी आया साएबान कोई

दुरीदा-जैब गिरेबाँ भी चाक चाहता

 दुरीदा-जैब गिरेबाँ भी चाक चाहता है
वो इश्क़ क्या है जो दामन को पाक चाहता है

मेरे ग़मों से सरोकार भी वो रक्खेगा
मेरी ख़ुशी में जवाब इश्तिराक चाहता है

फिर आज शर्त लगाई है दिल ने वहशत से
फिर आज दामन-ए-एहसास पाक चाहता है

वो तंग आ के ज़माने की सर्द-महरी से
तअल्लुक़ात में फिर से तपाक चाहता है

तमाम उम्र रहा ख़ुद तबाह-हाल मगर
नसीब बच्चों का वो ताब-नाक चाहता है

अजीब नज़रों से तकता है वो दुकानों को
ग़रीब बच्ची की ख़ातिर फ़्राक चाहता है

बग़ैर ख़ून किए दिल को कुछ नहीं मिलता
कोई भी फ़न हो ‘ज़की’ इंहिमाक चाहता है

इताब ओ क़हर का हर इक निशान

 इताब ओ क़हर का हर इक निशान बोलेगा
मैं चुप रहा तो शिकस्ता मकान बोलेगा

अभी हुजूम है उस को जुलूस बनने दे
तेरे ख़िलाफ़ हर इक बे-ज़ुबान बोलेगा

हमारी चीख़ कभी बे-असर नहीं होगी
ज़मीं ख़मोश सही आसमान बोलेगा

जो तुम सुबूत न दोगे अज़ाब के दिन का
गवाह बन के ये सारा जहाँ बोलेगा

कभी तो आएगा वो वक़्त भी ‘ज़की’ तारिक़
यक़ीन बन के हमारा गुमान बोलेगा

कौन कहता है गुम हुआ परतव

 कौन कहता है गुम हुआ परतव
लहज़ा लहज़ा है आईना परतव

हर तरफ़ छा गया है इक जलवा
जाने किस का ये पड़ गया परतव

नक़्श पलकों पे जब हुआ रौशन
अपनी आँखों में भर लिया परतव

मेरे अंदर निहाँ है अक्स मेरा
आईने में है आप का परतव

डर रहा है ‘ज़की’ अँधेरों से
खो न जाए कहीं तेरा परतव

मेरे ख़्वाबों का कभी जब आसमाँ

 मेरे ख़्वाबों का कभी जब आसमाँ रौशन हुआ
रह-गुज़ार-ए-शौक़ का एक इक निशाँ रौशन हुआ

अजनबी ख़ुश्बू की आहट से महक उट्ठा बदन
क़हक़हों के लम्स से ख़ौफ़-ए-ख़िज़ाँ रौशन हुआ

फिर मेरे सर से तयक़्क़ुन का परिंदा उड़ गया
फिर मेरे एहसास में ताज़ा-गुमाँ रौशन हुआ

जाने कितनी गर्दनों की हो गईं शमएँ क़लम
तब कहीं जा कर ये तीरा ख़ाक-दाँ रौशन हुआ

शहर में ज़िंदाँ थे जितने सब मुनव्वर हो गए
किस जगह दिल को जलाया था कहाँ रौशन हुआ

जल गया जब यास के शोलों से सारा तन ‘ज़की’
तब कहीं उम्मीद का धुँदला निशाँ रौशन हुआ

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