ज़फ़र’ मुरादाबादी की रचनाएँ

बढ़े कुछ और किसी इल्तिजा से कम न हुए

बढ़े कुछ और किसी इल्तिजा से कम न हुए
मेरी हरीफ़ तुम्हारी दुआ से कम न हुए

सियाह रात में दिल के मुहीब सन्नाटे
ख़रोश-ए-नग़मा-ए-शोला-नवा से कम न हुए

वतन को छोड़ के हिजरत भी किस को रास आई
मसाएल उन के वहाँ भी ज़रा से कम न हुए

फ़राज़-ए-ख़ल्क से अपना लहू भी बरसाया
ग़ुबार फिर भी दिलों की फ़ज़ा से कम न हुए

बुलंद और लवें हो गईं उम्मीदों की
दिए वफ़ा के तुम्हारी जफ़ा से कम न हुए

भँवर में डूब के तारीख़ बन गए गोया
सफ़ीने इश्‍क़ के सैल-ए-बला से कम न हुए

हमारे ज़ेहन भटकते रहे ख़लाओं में
सफ़र नसीब के ज़ंजीर-ए-पा से कम न हुए

सदाबहार ख़याबान-ए-आरज़ू था ‘जफ़र’
लहू के फूल हमारी क़बा से कम न हुए

 

बे-क़नाअत काफ़िले हिर्स ओ हवा ओढ़े हुए

बे-क़नाअत काफ़िले हिर्स ओ हवा ओढ़े हुए
मंज़िलें भी क्यूँ न हों फिर फ़ासला ओढ़े हुए

इस क़दर ख़िल्क़त मगर है मौत को फ़ुर्सत बहुत
हर बशर है आज ख़ु अपनी क़जा़ ओढ़े हुए

उन के बातिन में मिला शैतान ही मसनद-नर्शी
जो ब-ज़ाहिर थे बहुत नाम-ए-ख़ुदा ओढ़े हुए

क्या करे कोई किसी से पुर्सिश-ए-अहवाल भी
आज सब हैं अपनी अपनी कर्बला ओढ़े हुए

क्या ख़बर किस मोड़ पर बिखरे मता-ए-एहतियात
पत्थरों के शहर में हूँ आईना ओढ़े हुए

सब दिलासे उस के झूठे उस के सब वादे फरेब
कब तक आख़िर हम रहें सब ओ रजा ओढ़े हुए

क्यूँ तज़बज़ुब में न हों इस दौर के अहल-ए-नज़र
गुम-रही है आगही का फ़लसला ओढ़े हुए

उँगलियाँ मजरूह हो जाएँगी रहना दूर दूर
ख़ार भी हैं इन दिनों गुल की रिदा ओढ़े हुए

बख़्षिशों से जिस की ख़ास ओ आम थे फै़ज़-याब
हम भी थे उस बज़्म में लेकिन अना ओढ़े हुए

फ़स्ल-ए-गुल आई तो वीराने भी महके हर तरफ
आज ख़ुद ख़ुश-बू को थी बाद-ए-सबा ओढ़े हुए

इक ज़मीं ही तंग क्या थी उस से जब बिछड़े ‘जफर’
आसमाँ भी था ग़ज़ब-परवर घटा ओढ़े हुए

कभी दुआ तो कभी बद्-दुआ से लड़ते हुए

कभी दुआ तो कभी बद्-दुआ से लड़ते हुए
तमाम उम्र गुज़ारी हवा से लड़ते हुए

हुए न ज़ेर किसी इंतिहा से लड़ते हुए
महाज़ हार गए हम क़ज़ा से लड़ते हुए

बिखर रहा हूँ फ़िज़ा में गुबार की सूरत
खिलाफ-ए-मस्लहत अपनी अना से लड़ते हुए

फ़िज़ा बदलते ही जाग उट्ठी फ़ितरत-ए-मै-कश
शिकस्त खा गई तौबा घटा से लड़ते हुए

क़लम की नोक से बहता रहा लहू मेरा
हिसार-ए-खिल्क़त-ए-फिक्र-ए-रसा से लड़ते हुए

जुनूँ नवर्द को मंज़र न कोई रास आया
मरा तो शोख़ी-ए-आब-ओ-हवा से लड़ते हुए

पहुँच सके न किसी ख़ुश-गवार मंज़िल तक
तुम्हारी याद की ज़ंजीर-ए-पा से लड़ते हुए

उन्हीं पे बंद हुआ इर्तिका का दरवाज़ा
फ़ना हुए हैं जो अपनी बक़ा से लड़ते हुए

‘जफर’ घिरे तो उसी रज़्म-ए-गाह-ए-हस्ती में
हुए शहीद सफ़-ए-कर्बला से लड़ते हुए

खुश-गमाँ हर आसरा बे-आसरा साबित हुआ

ख़ुश-गमाँ हर आसरा बे-आसरा साबित हुआ
ज़िंदगी तुझ से तअल्लुक खोखला साबित हुआ

जब शिकायत की कबीदा-ख़ातिरी हासिल हुई
सब्र-ए-महरूमी मेरा हर्फ-ए-दुआ साबित हुआ

बे-तलब मिलती रहें यूँ तो हज़ारों नेमतें
थे तलब की आस में बरहम तो क्या साबित हुआ

रू-ब-रू होते हुए भी हम रहे मंज़िल से दूर
इक अना का मसअला ज़ंजीर-ए-पा साबित हुआ

आह भर कर चल दिए सब ही तमाशा देख कर
वक़्त पर जो डट गया वो देवता साबित हुआ

टूट कर बिखरा मेरे दिल से यक़ीं का आईना
मैं उसे समझा था क्या लेकिन वो क्या साबित हुआ

साँस जो आया बदन में था वफ़ा से हम-किनार
और जब वापस हुआ तो बे-वफ़ा साबित हुआ

सर के शैदाई बहुत मायूस महफ़िल से उठे
जब ‘ज़फ़र’ जैसा सुख़न-वर बे-नवा साबित हुआ

नक़ाब उस ने रूख़-ए-हुस्न-ए-ज़र पे डाल दिया

नक़ाब उस ने रूख़-ए-हुस्न-ए-ज़र पे डाल दिया
के जैसे शब का अँधेरा सहर पे डाल दिया

समाअतें हुईं पुर-शौक हादसों के लिए
ज़रा सा रंग-ए-बयाँ जब ख़बर पे डाल दिया

तमाम उस ने महासिन में ऐब ढूँड लिए
जो बार-ए-नक़्द-ओ-नज़र दीदा-वर पे डाल दिया

अब इस को नफ़ा कहीं या ख़सारा-ए-उल्फ़त
जो दाग़ उस ने दिल-ए-मोतबर पे डाल दिया

क़रीब ओ दूर यहाँ हम-सफ़र नहीं कोई
तेरी तलब ने ये किस रह-गुज़र पे डाल दिया

हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जानाँ से हाथ धो लेंगे
कुछ और बोझ जो पा-ए-सफ़र पे डाल दिया

जो हम अज़ाब था उस की ही छाँव में आ कर
ख़ुद अपनी धूप का लश्‍कर शजर पे डाल दिया

भटक रहा था जो असरार-ए-फ़न की वादी में
उरूज दे के फराज़-ए-हुनर पे डाल दिया

बे-एतदाल थे ख़ुद उन के खत्त-ओ-खाल ‘ज़फ़र’
हर इत्तिहाम मगर शीशा-गर पे डाल दिया

 

निगाह-ए-हुस्न-ए-मुजस्सम अदा हो छूते ही

निगाह-ए-हुस्न-ए-मुजस्सम अदा हो छूते ही
गँवाए होश भी उस दिल-रूबा को छूते ही

तमाम फूल महकने लगे हैं खिल-खिल कर
चमन में शोख़ी-ए-बाद-सबा को छूते ही

मशाम-ए-जाँ में अजब है सुरूर का आलम
तसव्वुरात में ज़ुल्फ़-ए-दोता को छूते ही

निगाह-ए-शौक़ की सब उँगलियाँ सुलग उट्ठीं
गुलाब जिस्म की रंगीन क़बा को छूते ही

नज़र को हेच नज़र आए सब हसीं मंज़र
बस एक शुआ-ए-रूख-ए-जाँ-फ़जा को छूते ही

जो आँसुओं से हुई बा-वज़ू अकेले में
दर-ए-क़ुबूल खुला उस दुआ को छूते ही

नहाईं शिद्दत-ए-अहसास के उजाले में
समाअतें मेरे सोज़-ए-नवा हो छूते ही

हिसार-ए-ज़ब्त जो टूटा तो आँख भर आई
दयार-ए-ग़ैर में इक आश्‍ना को छूते ही

लहू में डूब के काँटे बन चराग़ ‘ज़फर’
रह-ए-वफ़ा में म आशुफ़्ता-पा को छूते ही

रात भर सूरज के बन कर हम-सफ़र वापस हुए

रात भर सूरज के बन कर हम-सफ़र वापस हुए
शाम को बिछड़े हम तो हँगाम-ए-सफर वापस हुए

जल्वागाह-ए-ज़ात से कब ख़ुद-निगर वापस हुए
और अगर वापस हुए तो बे-बसर वापस हुए

थी हमें मल्हूज-ए-ख़ातिर नेक-नामी इस क़दर
चूम कर नज़रों से उन के बाम ओ दर वापस हुए

मुज़्दा परवाज़-ए-अदम का है के राहत की नवेद
दम लबों पर है तो अपने बाल ओ पर वापस हुए

शौक़-ए-मंज़िल था कहाँ मुझ सा किसी का मोतबर
दो क़दम भी चल न पाए हम-सफ़र वापस हुए

कारवाँ से जो भी बिछड़ा गर्द-ए-सहरा हो गया
टूट कर पत्ते कब अपनी शाख़ पर वापस हुए

सुब्ह दम ले कर चली घर से तलाश-ए-रोज़-गार
शाम हम रूख़ पर लिए गर्द-ए-सफर वापस हुए

ज़िंदगी में आईं सुब्हें और शामें भी बहुत
अहद-ए-रफ़्ता के कहाँ शाम ओ सहर वापस हुए

आख़िरश बुझ ही गया है ख़ुश-गुमानी का चराग़
तुम बिछड़ कर फिर कहाँ इम्कान भर वापस हुए

ख़ुश-गुमानी का भरम रक्खा नई पहचान ने
फिर मेरे नग़मों में ढल कर सीम-बर वापस हुए

होश से आरी रही दीवानगी अपनी ‘ज़फर’
बा-ख़बर महफ़िल में रह कर बे-ख़बर वापस हुए

तमाम रंग जहाँ इल्तिजा के रक्खे थे

तमाम रंग जहाँ इल्तिजा के रक्खे थे
लहू लहू वहीं मंज़र अना के रक्खे थे

करम के साथ सितम भी बला के रक्खे थे
हर एक फूल ने काँटे छुपा के रक्खे थे

सुकूल चेहरे पे हर ख़ुश अदा के रक्खे थे
समंदरों ने भी तेवर छुपा के रक्खे थे

मेरी उम्मीद का सूरज के तेरी आस का चाँद
दिए तमाम ही रूख़ पर हवा के रक्खे थे

वो जिस की पाक उड़ानों के मोतरिफ थे सब
जले हुए वही शहपर हया के रक्खे थे

बना यज़ीद ज़माना जो मैं हुसैन बना
के ज़ुल्म बाक़ी अभी कर्बला के रक्थे थे

उन्हीं को तोड़ गया है ख़ुलूस का चेहरा
जो चंद आइने हम ने बचा के रक्खे थे

यूँही किसी की कोई बंदगी नहीं करता
बुतों के चेहरों पे तेवर ख़ुदा के रक्खे थे

गए हैं बाब-ए-रसा तक वो दस्तकें बन कर
‘जफ़र’ जो हाथ पे आँसू दुआ के रक्खे थे

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