‘ज़हीर’ देहलवी की रचनाएँ

ऐ मेहर-बाँ है गर यही सूरत निबाह की

ऐ मेहर-बाँ है गर यही सूरत निबाह की
बाज़ आए दिल लगाने से तौबा गुनाह की

उल्टे गिले वो करते हैं क्यूँ तुम ने चाह की
क्या ख़ूब दाद दी है दिल-ए-दाद-ख़्वाह की

क़ातिल की शक्ल देख के हँगाम-ए-बाज़-पुर्स
नियत बदल गई मेरे इक इक गवाह की

मेरी तुम्हारी शक्ल ही कह देगी रोज़-ए-हश्र
कुछ काम गुफ़्तुगू का न हाजत गवाह की

ऐ शैख़ अपने अपने अक़ीदे का फ़र्क़ है
हुरमत जो दैर की है वही ख़ानक़ाह की

बज़्म-ए-दुश्मन में जा के देख लिया

बज़्म-ए-दुश्मन में जा के देख लिया
ले तुझे आज़मा के देख लिया

तुम ने मुझ को सता के देख लिया
हर तरह आज़मा के देख लिया

उन के दिल की कुदूरतें न मिटीं
अपनी हस्ती मिटा के देख लिया

कुछ नहीं कुछ नहीं मोहब्बत में
ख़ूब जी को जला के देख लिया

कुछ नहीं जुज़ ग़ुबार-ए-कीन-ओ-इनाद
हम ने दिल में समा के देख लिया

न मिले वो किसी तरह न मिले
ग़ैर को भी मिला के देख लिया

क्या मिला नाला ओ फ़ुग़ाँ से ‘ज़हीर’
हश्र सर पर उठा के देख लिया

 

दिल गया दिल का निशाँ बाक़ी रहा

दिल गया दिल का निशाँ बाक़ी रहा
दिल की जा दर्द-ए-निहाँ बाक़ी रहा

कौन ज़ेरे-ए-आसमाँ बाक़ी रहा
नेक-नामों का निशाँ बाक़ी रहा

हो लिए दुनिया के पूरे कारोबार
और इक ख़्वाब-ए-गिराँ बाक़ी रहा

रफ़्ता रफ़्ता चल बसे दिल के मकीं
अब फ़क़त ख़ाली मकाँ बाक़ी रहा

चल दिए सब छोड़ कर अहल-ए-जहाँ
और रहने को जहाँ बाक़ी रहा

कारवाँ मंज़िल पे पहुँचा उम्र का
अब ग़ुबार-ए-कारवाँ बाक़ी रहा

मिल गए मिट्टी में क्या क्या मह-जबीं
सब को खा कर आसमाँ बाक़ी रहा

मिट गए बन बन के क्या क़स्र ओ महल
नाम को इक ला-मकाँ बाक़ी रहा

आरज़ू ही आरज़ू में मिट गए
और शौक़-ए-आस्ताँ बाक़ी रहा

ऐश ओ इशरत चल बसे दिल से ‘ज़हीर’
दर्द ओ ग़म बहर-ए-निशाँ बाक़ी रहा

दिल को आज़ार लगा वो के छुपा भी न सकूँ

दिल को आज़ार लगा वो के छुपा भी न सकूँ
पर्दा वो आ के पड़ा है के उठा भी न सकूँ

मुद्दआ सामने उन के नहीं आता लब तक
बात भी क्या ग़म-ए-दिल है कि सुना भी न सकूँ

बे-जगह आँख लड़ी देखिए क्या होता है
आप जा भी न सकूँ उन को बुला भी न सकूँ

वो दम-ए-नज़ा मेरे बहर-ए-अयादत आए
हाल कब पूछते हैं जब कि सुना भी न सकूँ

ज़िंदगी भी शब-ए-हिज्राँ है के कटती ही नहीं
मौत है क्या तेरा आना के बुला भी न सकूँ

दम है आँखों में उसे जान में लाऊँ क्यूँकर
कब वो आए के उन्हें हाथ लगा भी न सकूँ

शर्म-ए-इस्याँ ने झुकाया मेरी गर्दन को ‘ज़हीर’
बोझ वो आ के पड़ा है कि उठा भी न सकूँ

 

Share