Poetry

जुगलप्रिया की रचनाएँ

मन तुम मलिनता तजि देहु

मन तुम मलिनता तजि देहु।
सरन गहु गोविंद की अब करत कासो नेहु॥
कौन अपने आप काके परे माया सेहु।
आज दिन लौं कहा पायो कहा पैहौ खेहु॥
विपिन वृंदा वास करु जो सब सुखनि को गेहु।
नाम मुख मे ध्यान हिय मे नैन दरसन लेहु॥
छाँड़ि कपट कलंक जग में सार साँचो एहु।
‘जुगल प्रिया’ बन चित्त चातक स्याम स्वाँती मेहु॥

दृग तुम चपलता तजि देहु

दृग तुम चपलता तजि देहु।
गुंजरहु चरनार विंदनि होय मधुप सनेहु॥
दसहुँ दिसि जित तित फिरहु किन सकल जग रस लेहु।
पै न मिलि है अमित सुख कहुं जो मिलै या गेहु॥
गहौ प्रीति प्रतीत दृढ़ ज्यों रटत चातक मेहु।
बनो चारु चकोर पिय मुख-चंद छवि रस एहु॥

नीर प्रिय लागे जमुना तेरो

नीर प्रिय लागे जमुना तेरो।
जा दिन दरस परस ना पाऊँ बिकल होत जिय मेरो॥
नित्य नहाऊँ तब सुख पाऊँ होत अलिन सों भेरो।
जुगल प्रिया घट भरि कर लीन्हें सदाचित चेरो॥

 

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