जोश मलीहाबादी की रचनाएँ

तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए

तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए ।

सुरमई शाल का डाले हुए माथे पे सिरा,
बाल खोले हुए सन्दल का लगाए टीका,
यूँ जो हँसती हुई तू सुब्ह को आ जाए ज़रा,
बाग़-ए-कश्मीर के फूलों को अचम्भा हो जाए,
तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए ।

ले के अँगड़ाई जो तू घाट पे बदले पहलू,
चलता-फिरता नज़र आ जाए नदी पर जादू,
झुक के मुँह अपना जो गँगा में ज़रा देख ले तू,
निथरे पानी का मज़ा और भी मीठा हो जाए,
तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए ।

सुब्ह के रँग ने बख़्शा है वो मुखड़ा तुझको,
शाम की छाँव ने सौंपा है वो जोड़ा तुझको,
कि कभी पास से देखे जो हिमाला तुझको,
इस तिरे क़द की क़सम और भी ऊँचा हो जाए,
तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए ।

छा गई बरसात की पहली घटा, अब क्या करूँ

छा गई बरसात की पहली घटा, अब क्या करूँ ?
ख़ौफ़ था जिस का वो आ पहुँची बला, अब क्या करूँ ?
हिज्र[1] को बहला चली थी गर्म मौसम की सुमूम[2]
ना-गहाँ[3] चलने लगी ठण्डी हवा, अब क्या करूँ ?

आँख उठी ही थी कि अब्र-ए-लाला-गूँ[4] की छाँव में
दर्द से कहने लगा कुछ झुटपुटा, अब क्या करूँ ?
अश्क अभी थमने न पाए थे कि बेदर्दी के साथ
बून्दियों से बोस्ताँ[5] बजने लगा, अब क्या करूँ ?

ज़ख़्म अब भरने न पाए थे कि बादल चर्ख़[6] पर
आ गया अँगड़ाइयाँ लेता हुआ, अब क्या करूँ ?
आ चुकी थी नींद-सी ग़म को कि मौसम ना-गहाँ[7]
बहर-ओ-बर[8] में करवटें लेने लगा, अब क्या करूँ ?

चर्ख़ की बे-रँगियों से सुस्त थी रफ़्तार-ए-ग़म
यक-ब-यक हर ज़र्रा गुलशन बन गया, अब क्या करूँ ?
क़ुफ़्ल-ए-बाब-ए-शौक़[9] थीं माहौल की ख़ामोशियाँ
दफ़अतन[10] काफ़िर पपीहा बोल उठा, अब क्या करूँ ?

हिज्र का सीने में कुछ कम हो चला था पेच-ओ-ताब[11]
बाल बिखराने लगी काली घटा, अब क्या करूँ ?
आँख झपकाने लगी थी दिल में याद-ए-लहन-ए-याद[12]
मोर की आने लगी बन से सदा, अब क्या करूँ ?

घट चला था ग़म की रँगीं बदलियों की आड़ से
उन का चेहरा सामने आने लगा अब क्या करूँ ?
आ रही हैं अब्र से उन की सदाएँ ‘जोश’ ‘जोश’
ऐ ख़ुदा ! अब क्या करूँ, बार-ए-ख़ुदा ! अब क्या करूँ ?

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