ज्ञानेन्द्रपति की रचनाएँ

ट्राम में एक याद

चेतना पारीक कैसी हो?
पहले जैसी हो?
कुछ-कुछ ख़ुुश
कुछ-कुछ उदास
कभी देखती तारे
कभी देखती घास
चेतना पारीक, कैसी दिखती हो?
अब भी कविता लिखती हो?

तुम्हें मेरी याद तो न होगी
लेकिन मुझे तुम नहीं भूली हो
चलती ट्राम में फिर आँखों के आगे झूली हो
तुम्हारी क़द-काठी की एक
नन्ही-सी, नेक
सामने आ खड़ी है
तुम्हारी याद उमड़ी है

चेतना पारीक, कैसी हो?
पहले जैसी हो?
आँखों में अब भी उतरती है किताब की आग?
नाटक में अब भी लेती हो भाग?
छूटे नहीं हैं लाइब्रेरी के चक्कर?
मुझ-से घुमन्तूू कवि से होती है टक्कर?
अब भी गाती हो गीत, बनाती हो चित्र?
अब भी तुम्हारे हैं बहुत-बहुत मित्र?
अब भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हो?
अब भी जिससे करती हो प्रेम उसे दाढ़ी रखाती हो?
चेतना पारीक, अब भी तुम नन्हीं सी गेंद-सी उल्लास से भरी हो?
उतनी ही हरी हो?

उतना ही शोर है इस शहर में वैसा ही ट्रैफ़िक जाम है
भीड़-भाड़ धक्का-मुक्का ठेल-पेल ताम-झाम है
ट्यूब-रेल बन रही चल रही ट्राम है
विकल है कलकत्ता दौड़ता अनवरत अविराम है

इस महावन में फिर भी एक गौरैये की जगह ख़ाली है
एक छोटी चिड़िया से एक नन्ही पत्ती से सूनी डाली है
महानगर के महाट्टहास में एक हँसी कम है
विराट धक-धक में एक धड़कन कम है कोरस में एक कण्ठ कम है
तुम्हारे दो तलवे जितनी जगह लेते हैं उतनी जगह ख़ााली है
वहाँ उगी है घास वहाँ चुई है ओस वहाँ किसी ने निगाह तक नहीं डाली है

फिर आया हूँ इस नगर में चश्मा पोंछ-पोंछ कर देखता हूँ
आदमियों को क़िताबों को निरखता लेखता हूँ
रंग-बिरंगी बस-ट्राम रंग बिरंगे लोग
रोग-शोक हँसी-खुशी योग और वियोग
देखता हूँ अबके शहर में भीड़ दूनी है
देखता हूँ तुम्हारे आकार के बराबर जगह सूनी है

चेतना पारीक, कहाँ हो कैसी हो?
बोलो, बोलो, पहले जैसी हो?

खेसाड़ी दाल की तरह निन्दित

खेसाड़ी दाल की तरह निन्दित
उखाड़कर फेंक दिया जाऊँगा
भारतीय कविता के क्षेत्र से

उस जगह लाल गाल वाले टमटार बोये जायेंगे
टमाटर ही टमाटर
जैव प्रयोगशालाओं में परिवर्तित अन्त:रचनावाले
स्वस्थ-सुन्दर-दीर्घायु
गुदाज़ होगी उनकी देह
अनिन्द्य होगा उनका रस
बोतलों में सरलता से बन्द होकर
शुष्कहृदयों को रसिक बनायेंगे
रसिकों को ललचायेंगे
और रसज्ञों को भायेंगे
वे टमाटर
इनके खेत और उनके घर भरेंगे
उनके गुण गाते न थकेंगे गुणीजन
उनकी अनुशंसा होगी , प्रशंसा होगी
वे योगानुकूल माने जायेंगे निर्विवाद
मानव-संसाधन-मन्त्रालय के अन्तर्गत
संस्कृति विभाग में
गुपचुप खुला है एक प्रकोष्ठ
कृषि-मन्त्रालय के खाद्य प्रसंस्करण प्रभाग के साझे में
क्योंकि अब लक्ष्य है निर्यात और अभीष्ट है विदेशी पूँजी-निवेश
और यह है निश्चित
कि देसी और दुब्बर खेसाड़ी दाल की तरह निन्दित
उखाड़कर फेंक दिया जाऊँगा
भारतीय कविता के क्षेत्र से
क्योंकि अब
इतिहास की गति के भरोसे न बैठ
इतिहास की मति बदलने की तकनीक है उनकी मुट्ठी में

खो जाऊँगा
जिस तरह खो गयी है
बटलोई में दाल चुरने की सुगन्ध
अधिकतर घरों में
और अखबारों को खबर नहीं
अख़बारों के पृष्ट पर
विज्ञापनों से बची जगह में
वर्ल्ड बैंक के आधिकारिक प्रवक्ता का बयान होगा
खुशी और धमकी के ताने-बानेवाला बयान
जिसका मसौदा
किसी अर्थशास्त्री ने नहीं
किसी भाषाशास्त्री ने नहीं
बल्कि सामरिक जासूसों की स्पेशल टीम ने
टास्क फोर्स ने
तैयार किया होगा
ढँकने-तोपने-कैमाओफ्लेज-में माहिर
पेन्टागन और सी. आई.ए. के चुनिन्दा युद्धकला-विशारद अफ़सरों के
एक संयुक्त गुप्त दल ने ।

माचिस की बाबत

बाज़ार से
माचिसें गायब हैं
दस दुकान ढूंढे नहीं मिल रही है एक माचिस
बड़ी आसानी से पायी जाती थी जो हर कहीं
परचून की पसरी दुकानों पर ही नहीं
पान के खड़े पगुराते खोखों पर भी

राह चलते
चाह बलते
मिल जाने वाली माचिस, मुस्तैद
एक मुँहलगी बीड़ी सुलगाने को
एहतियात से!

क्या हमने सारी माचिसें खपा डालीं
जला डालीं बुझा डालीं
गुजरात में, पिछले दिनों
आदमियों को ज़िन्दा जलाने में
आदमीयत का मुर्दा जलाने में?

जब माचिस मिलने भी लगेगी इफरात, जल्द ही
अगरबत्तियां जलाते
क्या हमारी तीलियों की लौ काँपेगी नहीं
ताप से अधिक पश्चात्ताप से?!

जल्बाज जलद 

जबसे बोतलबंद हुआ है पानी
हथेली भूलने लगी है चुल्लू बांधना

अनारक्षित डिब्बों के रेलयात्रियों के लिए भी बोतलबंद है पानी
आरक्षित डिब्बों के रेलयात्रियों द्वारा पीकर त्यागी गई
ब्रांडधारी प्लास्टिक बोतलों में-
जिन्हें उठा लेते हैं वे
काले कोट, खाकी वर्दी को मुस्कराता सलाम ठोंक, डिब्बे में घुस
वे-स्टेशनजीवी
-और भर लेते हैं उनमें आकण्ठ पानी
रेलवे के नलकों से-ऐसे जो बहते ही रहते धारासार
लेकिन होते प्राय: खुश्क ट्रेन आने के थोड़ा पहले ही-
ऐसी ही है साँठ-गाँठ रेलवे कर्मचारियों की बोतलबंद
पानी के विक्रेताओं से-
इनसे नहीं, साँठ-गाँठ उनसे जो
ठंडे बक्से में
रखे हुए हैं ब्रांडधारी पारदर्शी प्लास्टिक बोतलें पानी की
जिनकी लम्बूतरी गरदन गहने को
आपके पास दस अंगुलियों का नहीं
दस रुपयों का होना जरुरी है

‘मन में पानी के अनेक संस्मरण हैं’-कहा था एक कवि ने
खिलंदड़ी बौछार ममतालु जलधार

लहर तरंग ज्वार
पानी के सारे संस्मरण मथने लगते हैं जब मन को
निर्जल निदाघ में
जीवन-यात्रा-बीच रेलयात्रा में
उमसते अनारक्षित डिब्बों के बाहर-
प्लेटफार्म पर ट्रेन के लगते ही-
खुली खिड़कियों के आगे
मंडराते हैं जलद मेघों की तरह करतल लिए पानी
जो स्टेशनजीवी
उनमें है दो बैसाखियों पर फुदकता
किसुना भी
औचक एक ट्रेन ने झटक ली जिसकी एक टांग
लेकिन ये ट्रेनें हैं जो
जिलाए रखती हैं उसको
अनारक्षित डिब्बों में कसे यात्रियों को
सस्ता पानी पिलाने के लिए

देखो, इसी प्लेटफार्म पर आ रही है ट्रेन
और ढीली-सी गंजी के नीचे, अपनी देह के मध्य भाग में
चौतरफ
जिसे सुलझा रहा था किसुना मनोयोग को बीड़ीयोग दे देर से,
शायद उसी सुतली के संजाल से
बांध, फांस, लटका ली हैं उसने पानी-भरी
पारदर्शी प्लास्टिक बोतलें-
पतलून पहना बादल वह-अब-मायकोवस्की का
बस केवल एक पांयचा उसकी पतलून का झूलता रहता हवा में
बैसाखियों पर फुदकता जा रहा वह
कालिदास-वर्णित महान पुष्करावर्तक
मेघों के वंशज की गरिमा से भरा-पूरा
प्लेटफार्म के उस छोर, जहाँ
ट्रेन के अनारक्षित डिब्बे रुकते हैं कसे बसे धाह और प्यास से भरे

विज्ञान-शिक्षक से छोटी लड़की का एक सवाल

एक बहुत छोटा-सा सवाल पूछा था विज्ञान-कक्षा की सबसे छोटी लड़की ने
पूछा था कि सारे आदमी जब
एक से ही आदमी हैं
जल और स्थल पर एक साथ चलकर ही
बने हैं इतने आदमी
तो एक आदमी अमीर
एक आदमी ग़रीब क्यों है
एक आदमी तो आदमी है
दूसरा जैसे आदमी ही नहीं है…

सारी कक्षा भौंचक रह गयी थी
खटाखट उड़ने लगे थे फ्यूज़
किवाड़ों में का लोहा बजने लगा था
विज्ञान-शिक्षक की आत्मा हाथ में लपलपाती छड़ी की तरह
दुबली हो गयी थी
उनका मुँह खुल गया था गुस्से में दुःख में
एक पल को उन्होंने अपने भीतर शून्य देखा था
उम्र बीत गयी आदमी की हड्डी-हड्डी को नस-नस को
उनके नाम से जानते
आदमी के दिल के दिमाग़ के जोड़-जोड़ को
भरी कक्षा में टुकड़े-टुकड़े खोलते
आदमी के रोम-रोम में झाँकते
उम्र बीत गयी इस सवाल को कण्ठ में तेज़ प्यास की तरह
अचानक महसूस करते
पर दबा जाते घुड़क कर घुटक लेते
किसी आदमी से अकेले में भी कभी पूछ नहीं पाते

अपने भीतर के जिस सवाल को देखने से वे डर रहे थे
अपने निर्भीक हाथों से
उसी सवाल को उनके रक्त से खींचकर

कर्म का संगीत

कपड़े पछींटता हुआ आदमी

अपने अनजाने संगीतकार बन जाता है

संगीत में मस्त हो जाता है

कर्म का संगीत धीरे-धीरे बन जाता है संगीत का क्रम

धुल जाता है कपड़े का देहाकार दुख

मन तक निखर जाता है

तब कभी मद्धिम आवाज़ में कहता है कपड़ा–

बहुत हुआ

छोड़ो भी मुझे

तुम्हें कोई काम करना है या नहीं पता नहीं

मेरे आगे उज्ज्वल भविष्य है

पसीने की महक वाला

डस्टर

आकाश के सुनील बोर्ड पर

हवाओं की लिखत को पोंछता

डस्टर फिरता है एक पतंग का

–मास्टर जी रविवार की छत पर खड़े हैं, बांधे बाँह

पश्चिम क्षितिज के सम्मुख

वे कुछ राशियाँ थीं रह-रह जोड़ी जातीं–हवाओं की लिखत

रिटायरमेंट के क़रीब मास्टर जी जिन्हें मन ही मन गुनते रहते हैं अक्सर

मकर संक्रान्ति के दिवस का शीर्षक

मकर संक्रान्ति के दिवस का शीर्षक

रात को मिलता है

देर से घर लौटते

जब सरे राह

स्ट्रीट लाईट की रोशनी का पोचारा पुते फलक पर

एक परछाईं प्रसन्न हाथ हिलाती है

वह एक पतंग है

बिजली के तार पर अटकी हुई एक पतंग

रह-रह हिलाती अपना चंचल माथ

नभ को ललकती

एक वही तो है इस पृथ्वी पर

पार्थिवता की सबसे पतली पर्त

जो अपने जिस्म से

आकाश का गुरुत्वाकर्षण महसूस करती है

एक साँझ, पुस्तकालय में

पुस्तकालय की प्रौढ़ पढ़न-मेज़ पर

खुली हुई क़िताब के पन्नों में

है गुरुत्वाकर्षण–ठीक उतना

जितना था बचपन के चौकोर मैदान में

एक साँझ

चिड़ियों का शोर गझिन होकर

एक अदृश्य चुम्बक में बदल जाता है

माथ उठा

पुस्तकालय के निनादित रोशनदानों की ओर ताकते

तुम अचरज करते हो

बाहर कौन बुलाता है

खुली हुई क़िताब के

शब्दार्थ धुंधले हो जाते हैं

बाहर कोई शब्द है जिसका अर्थात नहीं, जो साक्षात

धवल मर्करी ट्यूबों के जलते रहने के बावजूद

पीली पड़ जाती हैं पुस्तकें पुस्तकालय की

उस साँझ

तुम्हारे देखते-देखते

अकाट्य सिर

मेरे कटे हुए सिर का
यदि बनता पेपरवेट
नयनाभिराम
तो वे बहुत खुश होते
रखते मुझे सदा अपनी आंखों के सामने ही
कुलीन शालीन
प्रतिभा के, सौन्दर्य के, गरज़ हर अच्छी चीज के
पारखी वे
लेकिन
यह मेरा सिर
बेहूदा है
किसी जंगली पक्षी के घोंसले जैसा
लेकिन चलो!
उसका एक मुखोश ही बन जाएगा
अफ्रीका और बस्तर के आदिवासी मुखोशों के बीच
दीवार खाली है
उनके ड्राइंगरूम की

मुश्किल यह है/कि यह सिर है या खुराफात!
कभी बन्द न होने वाला एक कारखाना
कविताओं की आधी-अधूरी फैलती-सिकुड़ती
पंक्तियों से भरा हुआ
अपांक्तेय अनुभवों की पंक्तिशेष स्मृतियों से
जिज्ञासाओं से अभीप्साओं से विकल
कवि-माथ!
चाक पर घूमती
अत्यन्त हल्के हाथों सूत से कट जानेवाली
गरदन नहीं है यह
गीली मिट्टी नहीं, पकी हुई इंर्ट है
अकाट्य है त्याज्य है
फेंको इसे दूर घूरे पर
चुपचाप
सिवान पर बढ़ाओ चौकसी
बस्ती में गश्त रात-दिन
हर दिशा में हमेशा ताने हुए बन्दूकें
उपद्रवियों के खिलाफ!

गमछे की गंध

चोर का गमछा
छूट गया
जहां से बक्सा उठाया था उसने,
वहीं-एक चौकोर शून्य के पास
गेंडुरियाया-सा पड़ा चोर का गमछा
जो उसके मुंह ढंकने के आता काम
कि असूर्यम्पश्या वधुएं जब, उचित ही, गुम हो गई हैं इतिहास में
चोरों ने बमुश्किल बचा रखी है मर्यादा
अपनी ताड़ती निगाह नीची किए

देखते, आंखों को मैलानेवाले
उस गर्दखोरे अंगोछे में
गन्ध है उसके जिस्म की
जिसे सूंघ/पुलिस के सुंघिनिया कुत्ते
शायद उसे ढूंढ निकालें
दसियों की भीड़ में
हमें तो
उसमें बस एक कामगार के पसीने की गन्ध मिलती है
खटमिट्ठी
हम तो उसे सूंघ/केवल एक भूख को
बेसंभाल भूख को
ढूंढ़ निकाल सकते हैं
दसियों की भीड़ में

मानव बम

सुतली-बम से लेकर
ट्रांजिस्टर बम तक
कितनी तरह के बम फटे थे
मानव-बमों के फटने से पहले
जनसभाओं में जनपथों पर

सुतली बम के लिए देह-भर सुतली
मिल सकती थी किसी किराने की दुकान पर
कुण्डली बांधे लटकती कोने में, दंश-दृढ़
ट्रांजिस्टर बम के लिए
खोल-भर ट्रांजिस्टर मिल सकता था
चावड़ी मार्केट में या ठठेरी बाजार में थोक-का-थोक
और गुड़िया-बमों के लिए प्लास्टिक की गुड़ियाएं
चाहे जितनी
किसी भी खिलौनों की दुकान पर

मानव-बम के लिए
जिस मां-कोख ने जाया है
कांेपल-कोमल शिशु-तन
उसने तो बिकाऊ नहीं ठहराया है उसे
कितने भी ऊंचे दामों

किस मां-गली से खरीद लाए हैं वे
बम का खोल बनाने मानव-तन कि मानव-मन
भावनाओं की अनगिन उमगती कोंपलोंवाला
सद्य:प्रस्फुटित किसी विचार से महमहाता
मानव-मन
विकासी प्रकृति का परम
वर्द्धमान जीवन का चरम
मानव-मन
जिसकी ब्रेन-वाशिंग कर
बहुविध उपायों से
कभी किसी पवित्र पृथुल ग्रन्थ के हवाले से
कभी किसी गोपनीय गुटका किताब के बल पर
कभी किसी महान उद्देश्य की बारूद भर
कभी..ओह! इस या उस तरह
बनाए जा रहे हैं मानव बम
तैयार किए जा रहे हैं सुसाइड-स्क्वैड-आत्मघाती दस्ते
किन्ही सत्तालोलुप सेनानायकों के हित

और असीसती माएं कलपती रह जाती हैं
उसके लिए जो उनका ही पसार था
कि जिसके पंख अभी पसरे ही थे आकाश में

आवो, चलें हम

आवो, चलें हम
साथ दो कदम
हमकदम हों
दो ही कदम चाहे
दुनिया की कदमताल से छिटक

हाथ कहां लगते हैं मित्रों के हाथ
घड़ी-दो घड़ी को
घड़ीदार हाथ-जिनकी कलाई की नाड़ी से तेज
धड़कती है घड़ी
वक्त के जख्म़ से लहू रिसता ही रहता है लगातार

कहां चलते हैं हम कदम-दो कदम
उंगलियों में फंसा उंगलियां
उंगलियों में फंसी है डोर
सूत्रधार की नहीं
कठपुतलियों की
हथेलियों में फंसी है
एक बेलन
जिन्दगी को लोई की तरह बेलकर
रोटी बनाती

किनकी अबुझ क्षुधाएं
उदरम्भरि हमारी जिन्दगियां
भसम कर रही हैं
बेमकसद बनाए दे रही हैं
खास मकसद से
आवो, विचारें हम
माथ से जोड़कर माथ
दो कदम हमकदम हों हाथ से जोड़े हाथ

आसमानी दृश्य : ज़मीनी भूमिका

है तो

गंगा – घाट पर

नियान लाइट की तेज रोशनी

तेजतर रोशनी आगे भी

लेकिन

गंगतीर से उठने से पहले

हम

चाँद के बादलों के आटोप से

बाहर निकलने की प्रतीक्षा करते हैं

मानो हम

चाँद को बादलों के बीच गुम छोड़कर नहीं जा सकते

मानो आसमानी दृश्य में

हो हमारी भी कोई ज़मीनी भूमिका

यकीनी भूमिका

सम्बोधन चिन्ह

दिन की फुर्सत के फैलाव-बीच उगे

एक पेड़ के तने से

पीठ टिका कर

जब तुम एक प्रेम-पत्र लिखना शुरू करते हो

कुछ सोचते और मुस्कुराते हुए

तुम्हें अचानक लगता है

कोई तुम्हें पुकार रहा है

कौन है – किधर, इस सूनी दोपहर में

तुम मुड़कर वृथा देखते हो

कि कोई हौले से तुम्हारा कन्धा थपथपाता है

और तुम देखते हो तनिक चौंके-से

पेड़ है, एक पत्ते की अंगुली से छूता तुम्हें–

एक शरारती दोस्ताना टहोका

और तुम उस पेड़ को शामिल होने देते हो अपने सम्बोधन में

सम्बोधन चिन्ह की जगह

तुम्हारे वक्ष-कक्ष में 

तुम्हारे वक्ष-कक्ष में

जो होती सुलह-वार्त्ताएँ

इजरायल-फ़िलिस्तीन की

भारत-पाकिस्तान की

इराक-अमरीका की

हठी सरकारों और उग्र पृथकतावादियों की

तुम्हारी छाती के अन्दर

है जो एक गोल मेज़, उसके चौगिर्द बैठ

जो वहाँ होती संधि-वार्त्ताएँ

ज़रूर सफल होतीं

झगड़े सलट जाते अदेर

कट्टर दुश्मन गहरे दोस्त बनकर ही उठते

शान्ति-वार्ताओं के लिए

जगह नहीं इस धरती पर कोई और

शुभाशा के वायुमंडल से भरे तुम्हारे वक्ष-कक्ष से बढ़ कर-

जानता नहीं कोई यह मुझ से ज़्यादा-

कि जिसकी चौखट पर

टिकाते ही अशांत माथा

नींद में निर्भार होने लगती है देह

एक शिशु हथेली मन की स्लेट से पोंछने लगती है आग के आखर

अरण्य : शरण्य

जब एक हाँका

हर ओर से मुझे खदेड रहा था

खूंख़्वार राइफ़ल की नाल की सीध में

लाया जा रहा था मुझे जब्रीया

तुमने मुझे पनाह दी थी

अपनी बाहें खोल कर

कहा था : छुप जाओ

छुपने की बहुत भरोसेमंद जगह है यह

स्त्री के मन से अधिक गहराई तो धरती पर

धरती के पास भी नहीं

तब से मैं तुम में भी जगता हूँ

अमृत कुम्भ 

है तो सधी हुई चाल, संयत भंगी, लजालु दृढ़्ता

लेकिन अमृत-कुम्भ छलकता है

तुम नहीं जानती हो

जानते हैं मेरे हरियाये प्राण

बार-बार

बार-बार

तुम ख़ुद को

सिक्त करने झुकते हो

और रिक्त करके ही उठते हो ।

ललमटिया

न तो गोरी-चिट्टी मुल्तानी मिट्टी
न बाबा की मिथिला की चन्दनवर्णी धूल
यह तो झारखण्ड की ललमटिया है
जिसका रंग बस नामशेष
ललमटिया हुई है कलमटिया
भूतल में जब से दमका है कोयले का अकूत भंडार
उनकी लालची आँखों में
कटे पेड़, ज़मींदोज हो कोयलाने की सम्भावना से दूर
बिलाए विनम्र मवेशी, उद्धत पशु, शोरीले पंछी सारे
चिंग्घाड़ती घूमतीं उत्खनक मशीनें कितनी
दाँतेदार बुलडोजर
गर्दन निकाले, जिराफ़ों को बौना करने वाली क्रेने
चहुँ ओर पेटू ट्रकें चौड़े पंजर की
और फेफड़ों तक को करियाती काली धूल
काली धूल- जिसके भीतर से अनदिखती भी
बस अपने नाम में टिमकती है ललमटिया।

प्यासा कुआँ

प्यास बुझाता रहा था जाने कब से
बरसों बरस से
वह कुआँ
लेकिन प्यास उसने तब जानी थी
जब
यकायक बंद हो गया जल-सतह तक
बाल्टियों का उतरना
बाल्टियाँ- जो अपना लाया आकाश डुबो कर
बदले में उतना जल लेती थीं

प्यास बुझाने को प्यासा
प्रतीक्षा करता रहा था कुआँ, महीनों
तब कभी एक
प्लास्टिक की खाली बोतल
आ कर गिरी थी
पानी पी कर अन्यमनस्क फेंकी गई एक प्लास्टिक-बोतल
अब तक हैण्डपम्प की उसे चिढ़ाती आवाज़ भी नहीं सुन पड़ती

एक गहरा-सा कूड़ादान है वह अब
उसकी प्यास सिसकी की तरह सुनी जा सकती है अब भी
अगर तुम दो पल उस औचक बुढ़ाए कुएँ के पास खड़े होओ चुप।

घर

दीवार में जड़ी
काँच की अलमारी मे
नेत्र-तल पर खड़ी
आनन्द का अयाचित वरदान देती
नटराज-प्रतिमा में नहीं
न भित्ति-कीलित कथकली के मुखौटे में
घर वहाँ नहीं बसता

घर झाँकता है, वहाँ देखो
कूलर-पदतल में
अचीन्हे-से रखे
धूलिधूसर उस अजीबोग़रीब- अजीब ग़रीब चीज़ में
जो दरअस्ल एक लैम्पशेड है
कूड़ेदान में जाने से पहले ठिठका हुआ
एक अथाह कूड़ादान जिसके पेंदे में कोई छेद नहीं
पर जहाँ से
खुलती है दूसरी दुनिया में एक सुरंग
वह दूसरी तरफ़ की दुनिया है
जिसके तट पर कबाड़ियो की उठी हुई हड़ीली बाँहें दिखती हैं
और आगे कुछ नहीं और
बस अनस्तित्व का समुद्र
आकर्षक न होते हुए भी आकर्षक
जिसकी खींचती महाबाँहों में
जाने नहीं देना चाहता है घर
न जाने कितने बल्बों से तपे उस बुझे लैम्पशेड को

भूकम्पों के बीच

आता है एक भूकम्प ऐसा, कभी-कभी
तरंगशाली, उच्च क्षमतावान
बढ़ा देता है जो धरती के अपनी धुरी पर
घूमने की गति
कि छोटा हो जाता है दिन, क्षणांश को

कभी आता है एक भूकम्प ऐसा भी, जैसा कि अभी
इंसानी ज़मीन पर
कि दशाब्दियों से जमी-पथराई हुई
तानाशाही की परतें दरकने लगती हैं
और अचानक छोटी हो आती है
बेअन्त लगने वाली तानाशाहियों की उम्र
एक के बाद एक

इन भूकम्पों में
ढहते हैं रहवास
लहूलुहान इंसानी ज़िंदगियाँ गुज़रती हैं बेवक़्त
अपने ही ख़ून का नमक चख़ते हैं हम
कभी सिर झुकाए
कहीं सिर उठाए ।

समय और तुम

समय सफ़ेद करता है
तुम्हारी एक लट …

तुम्हारी हथेली में लगी हुई मेंहदी को
खीच कर
उससे रंगता है तुम्हारे केश

समय तुम्हारे सर में
भरता है
समुद्र-उफ़न उठने वाला अधकपारी का दर्द
की तुम्हारा अधशीश
दक्षिण गोलार्ध हो पृथ्वी का
खनिज-समृद्ध होते हुए भी दरिद्र और संतापग्रस्त

समय,लेकिन
नीहारिका को निहारती लड़की की आँखें
नहीं मूंद पाता तुम्हारे भीतर
तुम,जो खुली क़लम लिए बैठी हो
औंजाते आँगन में
तुम,जिसकी छाती में
उतने शोकों ने बनाये बिल
जितनी ख़ुशियों ने सिरजे घोंसले

एक आत्म-प्रकाशी पत्र 

एक दिन
की रात
मद्धिम होते-होते लैंप
आख़िरकार
लिखे जा रहे पत्र को
बुझा देता है

हठात बिदा के- सस्नेह – में
अंतिम उजास उसकी

जहॉं से पलट कर देखता हूँ

तब दिखती है
पत्रलेख की वर्तनियों में
वह बलती हुई वर्तिका
अपनी चिमनी के कांचघर में निष्कंप नर्तन करती उसकी शिखा
उस दिन की रात, जिसने
घर का काम-काज जल्दी-जल्दी समेटा था,जलकर खड़ीं होते ही
जब नगर के लैंडस्केप पर हस्बमामूल पुत गई थी
लोडशेडिंग की स्याही
रात को अन्धराती समय से पहले

और
घर भर में विभक्त अपने उजेले को
समेत कर
वह लैंप
जलता रहा था
देर तक, आत्मस्थ
वस्तुओं को अपना जीवन जीने के लिए
उजेले की जरुरत नहीं रह गई थी
कोई क्रियाएँ नहीं थीं उजाला चाह्तीं
फोटोसिन्थेसिस के लिए उजाला चाहते पत्तों की तरह

बच्चों की तरह
सो गई थीं सारी चीज़ें
तुम्हारे माँ तलुओं के पैताने
और सिरहाने
जलता रहा वह लैंप
देर तक, आत्मस्थ
धीरे-धीरे उसका उजाला
एक सरोवर में बदल गया
जिसमें इच्छाएँ
कुमुद्नियों की तरह मुकुलित होती है
निस्पृह इच्छाएँ

वे सभी
कविताओं का रूप ले लेना चाहती हैं
उमग-उमग
पर एक पत्र की पंक्तियाँ ही बनना तय करती हैं

एक संबोधन उपजता है
शुरू करता
प्राण-प्रवाह की एक प्रणाली
जो पुरानी हो कर भी तुम्हारी अपनी है
और मेरा तो वह नाम ही है
बड़भागी हूँ
कि सहभागी हूँ
तुम्हारे प्राणप्रभ कविताकामी रतजगों में

उसको
उसी पत्र को
निस्स्नेह धीरे-धीरे बुझाता
लैंप
विदा का-सस्नेह –
हठात बलात लिखवा
बुझा देता है
वहीं का वहीँ

और
पत्र के लिफाफाकार मोड़े गये कागज़ पर
अशेष शब्दों से भरी कलम
रख
तुम सो जाती हो

आए हैं दाता

आए हैं दाता
धवलहृदय भ्राता
गंगातट, आटे की लोई
नान्ह-नान्ह गोली पोई
पूँग रहें हैं जलचर-नभचर
गंगा की मच्छी औ’ गौरैया-कबूतर
पुण्यप्रभ उज्ज्वल
आख़िर देते चल
हाथ लपेटे खाली झोली
अँगुरियन इत्ती नरम कि पोली
हाथ वह मुलायम मनजोर
पर छीने उसने कितनों के कौर
हालाँकि उसको प्रिय नमस्कार की मुद्रा है
मुद्रा को ही नमस्कार उसका, उसको बस मुद्रा मुद्रा मुद्रा है

आदमी को प्यास लगती है

कालोनी के मध्यवर्ती पार्क में
जो एक हैण्डपम्प है
भरी दोपहर वहाँ
दो जने पानी पी रहे हैं
अपनी बारी में एक जना चाँपे चलाए जा रहा है हैण्डपम्प का हत्था
दूसरा झुक कर पानी पी रहा है ओक से
छक कर पानी पी, चेहरा धो रहा है वह बार-बार
मार्च-अखीर का दिन तपने लगा है, चेहरा सँवलने लगा है,
कण्ठ रहने लगा है हरदम ख़ुश्क
ऊपर, अपने फ़्लैट की खुली खिड़की से देखता हूँ मैं
ये दोनों वे ही सेल्समैन हैं
थोड़ी देर पहले बजाई थी जिन्होंने मेरे घर की घण्टी
और दरवाज़ा खोलते ही मैं झुँझलाया था
भरी दोपहर बाज़ार की गोहार पर के चैन को झिंझोड़े
यह बेजा खलल मुझे बर्दाश्त नहीं
‘दुनिया-भर में नम्बर एक’ – या ऐसा ही कुछ भी बोलने से उन्हें बरजते हुए
भेड़े थे मैंने किवाड़
और अपने भारी थैले उठाए
शर्मिन्दा, वे उतरते गए थे सीढ़ियाँ

ऊपर से देखता हूँ
हैण्डपम्प पर वे पानी पी रहे हैं
उनके भारी थैले थोड़ी दूर पर रखे हैं एहतियात से, उन्हीं के ऊपर
तनिक कुम्हलाई उनकी अनिवार्य मुस्कान और मटियाया हुआ दुर्निवार उत्साह
गीले न हो जाएँ जूते-मोजे इसलिए पैरों को वे भरसक छितराए हुए हैं
गीली न हो जाए कण्ठकस टाई इसलिए उसे नीचे से उठा कर
गले में लपेट-सा लिया है, अँगौछे की तरह
झुक कर ओक से पानी पीते हुए
कालोनी की इमारतें दिखाई नहीं देतीं
एक पल को क़स्बे के कुएँ की जगत का भरम होता है
देख पा रहा हूँ उन्हें
वे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के उत्पाद नहीं हैं
भारतीय मनुष्यों के उत्पाद हैं
वे भारतीय मनुष्य हैं — अपने ही भाई-बन्द
भारतीय मनुष्य — जिनका श्रम सस्ता है
विश्व-बाज़ार की भूरी आँख
जिनकी जेब पर ही नहीं
जिगर पर भी गड़ी है ।

हिन्दी के लेखक के घर 

न हो नगदी कुछ खास
न हो बैंक-बैलेंस भरोसेमन्द
हिन्दी के लेखक के घर, लेकिन
शाल-दुशालों का
जमा हो ही जाता है जखीरा
सूखा-सूखी सम्मानित होने के अवसर आते ही रहते हैं
(और कुछ नहीं तो हिन्दी-दिवस के सालाना मौके पर ही)
पुष्प-गुच्छ को आगे किए आते ही रहते हैं दुशाले
महत्व-कातर महामहिम अँगुलियों से उढ़ाए जाते सश्रद्ध
धीरे-धीरे कपड़ों की अलमारी में उठ आती है एक टेकरी दुशालों की
हिन्दी के लेखक के घर

शिशिर की जड़ाती रात में
जब लोगों को कनटोप पहनाती घूमती है शीतलहर
शहर की सड़कों पर
शून्य के आसपास गिर चुका होता है तापमान, मानवीयता के साथ मौसम का भी
हाशिए की किकुड़ियाई अधनंगी ज़िन्दगी के सामने से
निकलता हुआ लौटता है लेखक
सही-साबुत
और कन्धों पर से नर्म-गर्म दुशाले को उतार, एहतियात से चपत
दुशालों की उस टेकरी पर लिटाते हुए
ख़ुद को ही कहता है मन-ही-मन हिन्दी का लेखक
कि वह अधपागल ‘निराला’ नहीं है बीते ज़माने का
और उसकी ताईद में बज उठती है सेल-फ़ोन की घण्टी
उसकी छाती पर
गरूर और ग्लानि के मिले-जुले अजीबोगरीब एक लम्हे की दलदल से
उसे उबारती हुई

सूर्यास्त की आभा भी जब अस्त हो रही होती है

सूर्यास्त की आभा भी जब अस्त हो रही होती है
नदी का जल-पृष्ठ निरंग हो धीरे-धीरे सँवलाने लगता है जब
देखता हूँ, नदी के पारतट के ऊपर के आकाश में
एक झुण्ड है पक्षियों का
धुएँ की लकीर-सा वह
एक नीड़मुखी खगयूथ है
वह जो गति-आकृति उर्मिल बदलती प्रतिपल
हो रही ओझल
सूर्यास्त की विपरीत दिशा में नभोधूम का विरल प्रवाह
वह अविरल
क्षितिज का वही तो सांध्य-रोमांच है
दिनान्त का अँकता सीमन्त वह जहाँ से
रात का सपना शुरू होता है
कौन हैं वे पक्षी
दूर इस अवार-तट से
पहचाने नहीं जाते
लेकिन जानता हूँ
शहर की रिहायशी कालोनियों में
बहुमंज़िली इमारतों की बाल्कनियों में
ग्रिलों-खिड़कियों की सलाखों के सँकरे आकाश-द्वारों से
घुसकर घोंसला बनाने वाली गौरैयाएँ नहीं हैं वे
जो सही-साँझ लौट आती हैं बसेरे में
ये वे पक्षी हैं जो
नगर और निर्जन के सीमान्त-वृक्ष पर गझिन
बसते हैं
नगर और निर्जन के दूसरे सीमान्त तक जाते हैं
दिनारम्भ में बड़ी भोर
खींचते रात के उजलाते नभ-पट पर
प्रात की रेखा ।

हाइकु

(1)
देवता हुए
सामंत सहायक
राजतंत्र में
(2)
मिटता नहीं
सिरजा जाता जिसे
एक बार
(3)
गाते न दिखा
सुना गया हमेशा
काला झींगुर
(4)
नाम दुलारी
दुखों की दुलारी है
जमादारिन
(5)
पनही नहीं
पाँव में, गले में
पगहा है भारी
(6)
मेघ बोझिल
मन भर मौसम
छूटा अकेला

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