ज्ञान प्रकाश पाण्डेय की रचनाएँ

अब तो सच बात बता दी जाये 

अब तो सच बात बता दी जाये,
वो रिदा क्यों न हटा दी जाये

आँखो को मुट्ठियों में जकड़े है,
अब अँधेरे को सजा दी जाये।

गर है तस्वीर मुकम्मल करनी,
उरियाँ ख़्वाबों को क़बा दी जाये।

सुर्खी बनने का मजा ही कुछ है,
अब तो शोलों को हवा दी जाये।

सब्ज़ मंज़र बदल भी सकते हैं,
क्यों न ये बात बता दी जाये।

जिनके आने से बरकतें आयें,
उन फ़कीरों को सदा दी जाये।

लिपट के धूप से सहमा हुआ समंदर है

लिपट के धूप से सहमा हुआ समंदर है,
अजब ख़मोशी है उतरा हुआ समंदर है।

बस एक लरजती जर्ज़र सी नाव है जिसमें,
दुबक के कोने में बैठा हुआ समंदर है।

लुटे हुए से किसी शह्र की तरह जख़्मी,
हरेक सिम्त किनारे पे बिखरा हुआ समंदर है।

किसी पहाड़ पे जैसे कि बर्फ़ जम जाए,
नदी की आँख में ठहरा हुआ समंदर है।

 मचल-मचल के ‘ज्ञान’ उठ रही हैं लहरें पर,
कई दिनो से कहीं खो गया समंदर है।

वही नस्ले-नौ सकपकाते हुए 

वही नस्ले-नौ सकपकाते हुए,
लजाते हुए कुछ छुपाते हुए।

वही रात-दिन की है मशरूफ़ियत,
वही दोस्त हैं रोते-गाते हुए।

अभी भी वही ऊँघते रास्ते,
वही राहरौ डगमगाते हुए।

किनारों में अब भी है आबे रवाँ,
समंदर वही सर उठाते हुए।

वही शोर आलूद अमराइयाँ,
वही बच्चे पत्थर उठाते हुए।

अभ भी मुसलसल चले जा रहे सब,
वही आबले झलमलाते हुए।

हैं अब भी वही चाय की चुस्कियाँ,
वही लोग, बातें बनाते हुए।

अभी भी वही खोई-खोई सी दुनिया,
वही लोग,सिगरिट जलाते हुए।

ख़्वाहिश तो थी कि टाल दूँ,टाले कहाँ गये

ख़्वाहिश तो थी कि टाल दूँ,टाले कहाँ गये
अब भी मैं सोचता हूँ उजाले कहाँ गये।

केवल समंदरों को दोष देके क्या मिला,
जितना खँगालना था खँगाले कहाँ गये।

जुल्मत के चश्मदीद गवाहों को क्या हुआ,
शब भर चिराग जागने वाले कहाँ गये।

मक़्सद अगर नहीं तो यहाँ क्या जिये कोई,
सीने के जख़्म पाँव के छाले कहाँ गये।

टपके हैं खून बन के ये आँखों से बारहा,
पहलू के दर्द ‘ज्ञान’ सम्हाले कहाँ गये।

यूँ ही न मेरे ख़्वाब का पैकर बदल गया

यूँ ही न मेरे ख़्वाब का पैकर बदल गया,
वो पुरतसन्नो शह्र का परतौ था छल गया।

ये शौके-शह्रगर्दी तो मुझमें न थी मगर,
अंदर था मेरे कौन जो इतना मचल गया।

पहले तो आईना ही मुझे खींचता रहा,
आँखें खुलीं तो क़ुर्ब का मंज़र बदल गया।

चेह्रा ये किसका है वो ख़दो-ख़ाल क्या हुए,
कोई तो आईना मेरे घर का बदल गया।

कैसे बतायें सुब्ह का चेह्रा था कैसा ‘ज्ञान’,
इतना सियाह था कि अँधेरा दहल गया।

रंग बदले है वक्त आने पर

रंग बदले है वक्त आने पर,
क्या भरोसा करूँ ज़माने पर।

कोई मरता है भूख से क्योंकर,
नाम लिक्खा है दाने-दाने पर।

अब ये चुप्पी ज़नाब तोड़ो भी,
आ गई है नदी मुहाने पर।

गर है हिम्मत तो जाके पूछो अब,
किसने पत्थर रखा दहाने पर।

प्रश्न मिट्टी के क्या उठे फिर तो,
चढ़ गई ज़र्दी आसमानों पर।

आईने भी दरक गये साहिब,
रू-ब-रू आईने के आने पर।

इधर-उधर यहाँ-वहाँ की बात बोलने लगे

इधर-उधर यहाँ-वहाँ की बात बोलने लगे,
क्या खुशनुमा फ़िज़ा थी आके जह्र घोलने लगे।

लहू-लहू सी ख़ौफ़-ख़ेज़ तुंदख़ू सी ले नज़र ,
कली-कली पे क्यों भला ये भौंरे डोलने लगे।

किसे पता कहाँ से कब फ़िदाइनी अटैक हो,
डरे-डरे से फूल सारे आँख खोलने लगे।

अभी तो ख़्वाब आँख की हैं ड्योढ़ी भी चढ़े नही,
अभी तो रात हँस रही क्यों मुर्गे बोलने लगे।

दरीचा-ए-उफ़ुक़ को कोई कर रहा सियाह गो,
निगह-निगह में लोग ‘ज्ञान’ सच टटोलने लगे।

हैं दिये इम्तहान पहले भी

हैं दिये इम्तहान पहले भी,
भूख थी मेहमान पहले भी।

इतनी खुशफ़हमियाँ नहीं पालो,
दे चुका है बयान पहले भी।

जख़्मख़ुर्दा लहू-लहू साँसें,
थी यही दास्तान पहले भी।

पहले भी कीमतें चुकाई हैं,
तल्ख़ थी ये ज़ुबान पहले भी।

मेरे मिट्टी के घर पे हाँ ! यूँ ही,
हँसते थे ये मकान पहले भी।

क्या यहाँ हो रहा नया साहिब,
था खफ़ा आसमान पहले भी।

अब भी पीछे उसी सराब के हूँ,
तिश्ना लब था ये ‘ज्ञान’ पहले भी।

जिंदगी तल्ख़तर हो गई

जिंदगी तल्ख़तर हो गई,
जेठ की दोपहर हो गई।

ख़्वाहिशें तो मुसलसल बढ़ीं,
पर खुशी मुख़्तसर हो गई।

इक जुलाहे के दर से लिपट,
मुफ़लिसी मोतबर हो गई।

हक-ब-जानिब थी जो रहगुज़र,
किस कदर पुरख़तर हो गई।

कोई चारा न जब रह गया,
पीर ही चारागर हो गई।

फिर चिरागों ने की साजिशे,
फिर हवा तल्खतर हो गई।

जिंदगी खूबसूरत लगी,
जब पसीने से तर हो गई।

मुस्कुराकर बा-अदब कहता है दर्पण प्यार से

मुस्कुराकर बा-अदब कहता है दर्पण प्यार से,
आप का चेह्रा अलग है आप के किरदार से।

होरी हल्कू रामधन अब सच बतायेंगे तुम्हें,
सच बज़ाहिर कब हुआ है टीभी या अख़बार से।

अच्छे दिन की चासनी अब कब तलक चाटें कहो,
सिउआ की विधवा यही है पूछती सरकार से।

धर्म शिक्षा-गृह चिकित्सा दोस्ती इंसानियत,
क्या नहीं इस दौर में वाबस्ता है व्यापार से।

इस बदलते वक्त में मग़रिब का है ये तोहफ़ा,
दौरे-हाज़िर में तसव्वुफ़ जुड़ गया व्यभिचार से।

ये सियासी लोग भी अब क्या बताऊँ दोस्तों,
पीठ में खंज़र घुसा देते हैं कितने प्यार से।

नून आटा दाल चावल उस पे शिक्षा औ’ दवा,
कड़कडाने लग गई हैं हड्डियाँ इस भार से।

क्या किसी बिल से मिला है क्या है मनरेगा से लाभ,
आओ चलकर पूछते हैं जोधा के परिवार से।

उस तरफ के लोग भी क्या हैं बिछड़कर ग़मज़दा,
बस यही इक प्रश्न करना है मुझे दीवार से।

क्या भला मिलता है घुट-घुट कर फ़ना होने मे ‘ज्ञान’,
इश्क की तासीर मर जाती क्यों इज़हार से।

गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं

गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं,
कबूतर स्वेत मारे जा रहे हैं।

मैं दुनिया की तरक्की क्या कहूँ अब
हया के पट उतारे जा रहे हैं।

यहाँ तो रेल की सी गति में हैं सब,
सुहाने दृश्य भागे जा रहे हैं।

निचोड़ा जा रहा है जुगुनुओं को,
नये सूरज निकाले जा रहे हैं।

यहाँ सुनता नहीं कोई किसी की,
न जाने क्यों पुकारे जा रहे हैं।

उन्हें आगाह करना चाहता हूँ,
जो छुप-छुप कर बताशे खा रहे हैं।

ज़रा वे मुड़ के पीछे भी निहारें,
जिन्हें है भ्रम कि आगे जा रहे हैं।

अजब आलम है यारों भुखमरी का,
कि अब पत्थर उबाले जा रहे हैं।

ये कैसी योजना है ‘ज्ञान’ आखिर,
घरों में बाज पाले जा रहे हैं

है टेंट खाली उदास जेबें कहाँ से लाए ये दाल-रोटी

है टेंट खाली उदास जेबें कहाँ से लाए ये दाल-रोटी,
अभी भी हल्कू के झोपड़े में खड़ी है बन के सवाल रोटी।

करूँगा क्या मैं ज़मीनो दौलत ये सीमो-ज़र ये तमाम दुनिया,
अगर हक़ीकत यही कि जग में है करती सब को निहाल रोटी।

उसे किसी का ये मशवरा कि अगर हुकूमत की ख्वेहिशें हों,
दो-चार भूखों के बीच जाकर दिखा-दिखा के उछाल रोटी।

किसे ख़बर है किसे गिरा दे किसे उठा दे सम्हाले किस को,
बताऊँ कैसे मैं कैसे-कैसे करे है दिन-दिन कमाल रोटी।

गया हुआ था वो चाँद पर,क्या उसे ख़बर है क्या हम पे गुजरी,
बसर-बसर के लिए यहाँ तो बनी हुई है बवाल रोटी।

कह्र ढाया है वो उड़ानो ने

कह्र ढाया है वो उड़ानो ने,
ख़ुदकुशी कर ली आसमानो ने।

तुम यक़ीं कर सकोगे बतलाऊँ,
धूप उगली है सायबानो ने।

घिघ्घियाँ बँध गईं शरारों की,
चुप्पियाँ तोड़ी ख़ाकदानो ने।

मेजबां यूँ न हो गए पत्थर,
गलतियाँ की हैं मेहमानों ने।

हर इदारे से बू सियासत की,
चैन लूटा है हुक्मरानो ने।

इधर जुगाड़ो उधर जुगाड़ो सरल नहीं है ये दाल-रोटी

इधर जुगाड़ो उधर जुगाड़ो सरल नहीं है ये दाल-रोटी,
लगा के मिस्रे परोस दो झट ग़ज़ल नहीं है ये दाल-रोटी।

लहू की बूँदें मिली हुई हैं मिला है इसमें पसीना अपना,
किसी ख़ुदा की इनायतों का सुफल नहीं है ये दाल-रोटी।

है गीता मेरी कुरान मेरा है भूख मेरी जुनून मेरा,
तेरे हरम की नज़ाकतों की नकल नहीं है ये दाल रोटी।

मचलती मौजों के बीच लड़ती सफ़ीनों का है अज़ाब ये तो,
ख़मोश झीलों में रश्क करता कवल नहीं है ये दाल रोटी।

कदम-कदम पर पहाड़ जैसी मुसीबतों का अज़ाब ये तो,
कोई शिगूफ़ा, या मसख़रों का चुहल नहीं है ये दाल- रोटी।

कहीं किरदार का झगड़ा कहीं दस्तार का झगड़ा

कहीं किरदार का झगड़ा कहीं दस्तार का झगड़ा,
कहीं सब खून के प्यासे कहीं है प्यार का झगड़ा।

कोई बेबाक बोले जा रहा सब कुछ बिना सोचे,
कोई खामोशियों से लड़ रहा इज़हार का झगड़ा।

यहाँ बे-लौस सूरज सा चमकता है अँधेरा भी,
यहाँ तो मुद्दतों से चल रहा प्रतिकार का झगड़ा।

लड़ो उससे कि जो पहचान सब की खा रहा दिन-दिन,
ये झगड़ा सब का है झगड़ा नहीं दो चार का झगड़ा।

इधर है अंधी गहराई उधर कातिल ऊँचाई है,
मुसलसल है इन्हीं मगरूरों से अधिकार का झगड़ा।

सभी को एक ही चिंता है मंजिल तक पहुँचने की,
जहाँ देखो वहीं पर चल रहा रफ्तार का झगड़ा।

शक्ति सारी खींच लेगा डर यही अध्यक्ष में

शक्ति सारी खींच लेगा डर यही अध्यक्ष में,
हर तरफ बाली कुशासन का यहाँ समकक्ष में।

भव्य भारत वर्ष में अब क्यों महाभारत न हो,
दृष्टिहीना कामनायें हों अगर प्रतिपक्ष में।

देश ये अभिशप्त है अब तो परीक्षित की तरह,
सब-के-सब कानून अब हैं तक्षकों के पक्ष में।

क्यों न कौरव दल निरंतर हो फलित-फूलित यहाँ,
मोह जब बढ़ने लगा है पार्थ के ही वक्ष में।

सब-के-सब ख़ुद को युधिष्ठिर कह रहे इस भीड़ में,
प्रश्न करने की न अब है शक्ति बूढ़े यक्ष में।

भीष्म द्रोंणाचार्य औ’ कृप की तरह पंडित जहाँ,
क्या कि मूल्यों का हरण हो चीर ऐसे कक्ष में।

चाँदनी ये आज-कल गहरी परेशानी में है

चाँदनी ये आज-कल गहरी परेशानी में है,
कुछ दिनो से रात क्यों सूरज की निगरानी में है?

रोज इक दरिया समंदर में उतर कर खो रहा,
हम समझते हैं कि सब उसकी निगहबानी में है।

दम – ब- दम बागी हवयें शोर बरपा कर रहीं,
एक ख़ामोशी मुसलसल झील के पानी में है।

फिर निचोड़ी जा रही है जुगनुओं की रोशनी,
मुझको हैरानी कि याँ’ कोई न हैरानी में है।

किसी भी पेड़ में साया नहीं है

किसी भी पेड़ में साया नहीं है,
खिज़ाँ का वक्त भी आया नहीं है।

अगर चाहो तो जंगल पार कर लो,
अँधेरा अब भी गहराया नहीं है।

बड़ा खुश हो रहा दो गाम चलकर,
अभी तक धूप में आया नहीं है।

लबों पे कोह लफ़्ज़ों के धरे हैं,
तख़ैयुल में प’ सरमाया नहीं है।

नदी की आँख में ये अश्क कैसा,
समुंदर ने तो धमकाया नहीं है।

हैं ख़तागर कि बेख़ता देखो

हैं ख़तागर कि बेख़ता देखो,
हम पे सादिर हुई सज़ा देखो ।

और क्या कर सकेगा कोई यहाँ,
हो रहे हैं सभी ज़ुदा देखो ।

सब अगर देखते हैं चुप रहकर,
तुम भी घर जाओ और मज़ा देखो ।

हम हरीफ़ों के शह्र में तनहा,
और हद में है ये खुदा देखो ।

हर तरफ़ है सुकूत का आलम,
हँस रही शह्र की हवा देखो ।

हैं उधर छटपटाती कंदीलें,
आँधियों की इधर वफ़ा देखो ।

सुग्गों की है लगी सभा भाई

सुग्गों की है लगी सभा भाई,
कर रही नीम उनकी अगुवाई।

छोटकी चाची बिलो रही माठा,
बज रही मथनी जैसे शहनाई।

जाँत चकरी की मीठी धुन सुन-सुन,
झूम उट्ठी हो जैसे अमराई।

धान काँड़े है सुब्हदम चाची,
गा-रही झूम-झूम पुरवाई।

लेके मेटी जो दूध की निकले,
गाय बब्बा को देख रम्भाई।

सानी-पानी में व्यस्त हैं भइया,
बैल ये द्वार की हैं रानाई।

लिट्टी-चोखे की गंध मत पूछो,
सुब्ह ख़ुद आप ही है बौराई।

बिट्टी बउआ को गोद में लेकर,
छोटकी चाची के घर घुमा लाई।

देख अम्मा को यूँ तके लेरुआ,
जैसे मेरा हो वो सगा भाई।

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