ज्ञान प्रकाश सिंह की रचनाएँ

तुषार कणिका

नव प्रभात का हुआ आगमन
है उपवन अंचल स्तंभित
पुष्प लताओं के झुरमुट में
छिपकर बैठी
हरित पत्र पर
बूँद ओस की
ज्योतित निर्मल
धवल स्फटिक
चित्ताकर्षक
स्पष्ट शुभ्र
पारदर्शक
सुष्मित सरला
तुषार कणिका।
जैसे कविता
अविदित पुस्तक
अज्ञात पृष्ट
अव्यक्त भाव
गंभीर गहन
नीरवता में
करती मौन
प्रतीक्षा उसकी
जो शब्दित भावों की रचना
नव निनाद से कर दे गुंजित
जड़ चेतन हो जाये झंकृत।

तुषार कणिका

नव प्रभात का हुआ आगमन
है उपवन अंचल स्तंभित
पुष्प लताओं के झुरमुट में
छिपकर बैठी
हरित पत्र पर
बूँद ओस की
ज्योतित निर्मल
धवल स्फटिक
चित्ताकर्षक
स्पष्ट शुभ्र
पारदर्शक
सुष्मित सरला
तुषार कणिका।
जैसे कविता
अविदित पुस्तक
अज्ञात पृष्ट
अव्यक्त भाव
गंभीर गहन
नीरवता में
करती मौन
प्रतीक्षा उसकी
जो शब्दित भावों की रचना
नव निनाद से कर दे गुंजित
जड़ चेतन हो जाये झंकृत।

जब तुम आये

धीरे से खोल कपाटों को, नीरवता से जब तुम आये,
चमकी हो चपला जैसे, चितवन में विद्युत भर लाये।
जब तुम आये,

जैसे रचना चित्र कल्पना, जैसे जटिल जाल स्मृति के
भाषा के अपठित भावों के, प्रश्न लिए पलकों पर आये।
जब तुम आये,

शांत सरोवर जल सम स्थिर, मौन गूढ़ परिवेश उमंगित,
नूतन कम्पित स्वर तरंग, सुस्मित अधरों पर ले आये।
जब तुम आये,

मन गति के आयाम सभी, हो गए मुक्त, बंधन विहीन,
रंजित सम्मोहित दृष्टिपात, मादक नयनों में भर लाये।
जब तुम आये…

मिलन-विरह

गहन निशा के मृदु अंचल में, किसी पथिक की स्वर लहरी सा,
तेरा अंचल पट लहराता ।

आँखों की गहरी अरुणाई और नींद से बोझिल पलकें
अलसाया सा गात तुम्हारा, क्या बतलातीं उलझी अलकें
और याद कर मिलन क्षणों को,
संध्या में रवि के ढलने पर, जलने वाले प्रथम दिये सा,
तेरा मुख रक्तिम हो उठता ।

तुम्हारी हाव भाव की रीति और मन में लिपटी इक आस
तुम्हारी दृष्टि गगन के पार, गीत में आतुरता का वास।
और सोच कर विरह क्षणों को,
किसी नदी के सूने तट पर, आकर टकराती तरंग सा,
तेरा रूप बिखरता जाता।

प्रकृति

रेल कोच के शयनयान में
वातायन के निकट सीट पर,
मै बैठा यों ही देख रहा था
परिमंडल के दृश्य मनोहर।

वर्षा ऋतु चरमोत्कर्ष पर
धारासार बरसता जलधर,
बागों खेतों में सुदूर तक
जल से पूरित धरती अंचल।

रूपक सम नीर सतह ज्योतित
घनघोर घटा छाई नभ में,
मेंड़ों का शिखर झलकता था
जल से आप्लावित खेतों में ।

चल रही ट्रेन धीरे धीरे
आता समीर वातायन से,
मिट्टी की सोंधी महक लिए
स्फूर्ति जगाता तन मन में।

डूबा था आगे रेल ट्रैक
परिवेश भयावह लगता था,
रुक गई ट्रेन धीमी होकर
आगे जाना प्रतिबंधित था।

सहसा वातायन से देखा
नारी चलती मेड़ शिखर पर,
पय-शोषित पट शुभ्र धवल
लय शोभित गति मंद चरण।

अपनी दोनों बाँह उठाए
पथ गामी संतुलन बनाए,
जैसे उड़े पखेरू कोई
अपने युगल पंख फैलाए।

वर्षा जनित धुँधलका छाया
आकृति रचना अस्पष्ट थी,
पर प्रतीत होती जैसे वह
सुघड़ मनोहर रूपवती थी।

वह आगे बढ़ती चली गई
होती गई दृष्टि से ओझल,
मै लगा सोचने गई कहाँ वह
और कहाँ से हुआ आगमन।

आया मन में सुविचार नवल
अवधारण करके वस्त्र धवल,
क्या जल वृष्टि निरखने आई
आभासित नारी प्रकृति स्वयं!

तरंगिणी 

निस्तब्ध निशा के अंचल में
तारा गण अंकित पट लिपटी,
युग तट बंधों के ओट छिपी
कलनाद किये बहती जाती।

कभी चक्र में, कभी वक्र में
लहराती मुड़ती बलखाती,
ऋजु रेखा में सरला बनकर
मंद मंद मुस्काती चलती।

साथ साथ में जलचर चलते
सैकत कण सहचर से चलते,
खंडित प्रस्तर करतल करते
तटिनी के संग बहते जाते।

सुगम सपाट धरा के ऊपर
मंद व्यवस्थित चरण बढ़ाती,
ढाल सतह पर संभल न पाती
लहराती द्रुत गति से जाती।

कभी सिमटती कभी फैलती
आकर निकट, दूर हट जाती,
तरुणी तरंगिणी मदमाती
आँख मिचौनी खेला करती।

विजन मध्य एकांत वासिनी
कभी चौंकती, फिर डर जाती,
सघन झाड़ियों के झुरमुट में
क्षीण रूप धर छिपकर चलती।

दुर्गम पथ पर चलते चलते
उसको जब थकान आ जाती,
सम्भव तो रुकना नहीं किन्तु
मध्यम गति से बहने लगती।

जैसे कुछ शांत समय मिलता
नाना विचार उर में उठते,
जो बाल सखाओं संग बीते
वे मनभावन दिन याद आते।

***

“मैं अल्प वयस की बाला थी
गिरि प्रांगण में घूमा करती,
चिंता रहित समय आनंदित
छपछप कर स्वछन्द विचरती।

भाँति भाँति के विटप वहाँ थे
कुछ छोटे थे, कुछ ऊँचे थे,
उन पर हरित लतायें लिपटीं
पवन वेग से झूला करतीं।

गिरि पर उगी वनस्पतियों में
गोह, महोख, नेवले रहते,
खरहे रहते , तीतर रहते
कछुए रहते, गिरगिट रहते।

काँटेदार झाड़ के झुरमुट
बहुतायत में उगे हुए थे,
सर्प और वृश्चिक जीवों के
शरण स्थली बने हुए थे।

शैल शिखर पर हिंसक पशु
गीदड़, हुँडार, लोमश रहते,
ऊपर आसमान में दिन भर
चील गिद्ध मंडराया करते।

बुलबुल, कोयल,चातक, मैना
मधुर स्वरों की रचना करते,
विजन पुष्प सुरभित आकर्षक
ऋतु वसंत का स्वागत करते।

हिरणों के दल गिरि के उपर
इधर उधर चरते रहते थे,
साथ साथ में चीतल सांभर
भय विहीन विचरण करते थे।

जब पर्वत तपने लगता था
ग्रीष्म काल की दोपहरी में,
तब सब बैठ जुगाली करते
पादप की शीतल छाया में।

अलसाए पशुओं के ऊपर
लघु खग निर्भय बैठा करते,
परजीवी कीटों को खाते
जो पशु के रोंमों में रहते।

वर्षा काल मेघ नभ छाते
अंचल दृश्य मनोहर लगते,
घन गर्जन के स्वर थापों पर
शिखी समूह थिरकने लगते।

शीतकाल की रजनी में जब
निर्जन हो जाता गिरि अंचल,
थलचर नभचर सब सो जाते
पर मैं चलती रहती अविरल।

मेरा अरि कोई वहाँ नहीं
मैं करती थी सबका स्वागत,
पर लगते सबसे आकर्षक
गिरिवासी पशुओं के शावक।

वहाँ प्रकृति के दृश्य अनोखे
वे सब चकित निहारा करते,
कभी उछलते, कभी कूदते
कभी कुलांचे भरने लगते।

उनके उछल कूद की क्रीड़ा
मैं अपलक देखा करती थी,
मेरे भी मन में जब भाता
दौड़ लगा खेला करती थी।

प्रातकाल में भुवन भाष्कर
जब हो करके रथ पर सवार,
निकला करते थे यात्रा पर
तब जागृत हो जाता भूधर।

कुछ खगगण अपने नीड़ों में
थे मधुर तान में गीत सुनाते,
कुछ बैठे तरु की डाली पर
अरुणोदय का स्वागत करते।

चौपाये भी तज कर निद्रा
अंगडाई लेकर उठ जाते,
उदरपूर्ति के अभिप्राय से
आहार ढूँढ़ने चल पड़ते।

वह दृश्य मुझे अच्छा लगता
प्राची नभ हो जाता लोहित,
मैं धारण करती स्वर्णिम पट
तज करके अपने श्वेत वस्त्र।

गिरि बहुधा निर्जन रहता था
पर यदा कदा संयासी आते,
कभी अकेले, कभी दलों में
आकर धुनी रमाया करते।

दुर्गम गिरि पर यात्रा करने
ट्रेकर यहाँ टोली में आते,
जग के कोलाहल से बचने
भ्रमण हेतु नव दम्पति आते।

मैं रहती हूँ गतिशील सदा
चलते चलते हूँ थक जाती,
मन करता है रुक जाने का
लेकिन मैं ठहर नहीं सकती।

तब हृदय व्यथित हो जाता है
व्याकुल हो सोचा करती हूँ,
मैं, काश, मानवी हो सकती
पर विवश स्वयं को पाती हूँ।

मेरी हमनामक कितनी ही
मानव बालायें हैं होतीं,
पर है ऐसा विधि का विधान
मैं नहीं मानवी बन सकती।

यदि किसी तरह संभव होता
मैं मानव बाला बन सकती,
वह स्थल अपने बचपन का
अवलोकन करने मैं जाती।

वह समय सुहाना बचपन का
जब भी स्मृति में आता है,
अंतस्तल हर्षित हो उठता
मन आभा से भर जाता है।

है नियम प्रकृति का परिवर्तन
यह सोच हृदय बहलाती हूँ,
मेरे जीवन का यही ध्येय
सब परहित अर्पित करती हूँ।“

***

विविध अनुभवों की स्मृतियाँ
निर्झरिणी के उर में आतीं
वह सबके प्रति समवृत्ति लिए
जीवन पथ पर बढ़ती जाती।

ये सड़कें

अट्ठाइस चक्के वाले ट्रक
चलते सड़कों के सीने पर
एक साथ बहुतेरे आते
हैं दहाड़ते
रौंदा करते
तब चिल्लाती हैं ये सड़कें
और कभी जब
अट्ठहास करते बुलडोजर
दौड़ लगाते उनके ऊपर
तब चीखा करती हैं सड़कें
कितना सहती हैं
ये सड़कें।
X X X
सड़क किनारे रहने वाले
एवं
यात्रा करने वाले
सड़ी गली मलयुक्त गन्दगी
करते रहते हैं सड़कों पर
और जानवर
करते गोबर
मैला भर देते हैं उन पर
जो पैदा करते हैं सड़ाँध
यह दुर्गन्धित कूड़ा कचरा
लाचार झेलती हैं सड़कें
पर चुप रहती हैं
ये सड़कें।
X X X

महुआ का तरु सड़क किनारे
टपकाता रस भरे फूल,
बिछ जाते पथ पर
श्वेत रंग,
कुछ पीत वर्ण
होकर विदीर्ण
उनको चुनने
सुबह सबेरे
माँ संग आई
छोटी बच्ची
महुआ बिनती दौड़ दौड़ कर
डलिया में रखती खुश होकर
तब मुस्कातीं हैं
ये सड़कें।
X X X
जाड़े का अरुणोदय
शीत चरम पर
धुंध सड़क पर
लड़कियाँ झुंड में
बतियाती हँसती
पढ़ने जातीं
कुछ साइकिल से
कुछ पैदल ही
कॉलेज ड्रेस पर
पहने स्वेटर
रंग विरंगे
छवि आकर्षक
सुषमा न्यारी
तब हर्षित होतीं
ये सड़कें।

एकाकी चिड़िया 

वह छोटी एकाकी चिड़िया
बिलकुल हलकी
दो अंगुल की
परम सुंदरी, पीत वर्ण की
मेरे उपवन में है रहती।
दिन में इधर उधर उड़ती है
संध्या को वापस आ जाती
आकर पहले नीबू द्रुम की
इस डाली से उस डाली पर
उड़ती रहती फुदक फुदक कर
आभासित होता देख उसे
वह नीचे जाने से पहले
कर रही आकलन आशंकित
संरक्षा और सुरक्षा का
जब सब कुछ पाती उचित रूप
और हो जाती संतुष्ट पूर्ण
तब पुष्प बिटप पर नीचे आती
रात्रि शयन को जगह ढूँढ़ती
और एकाएक किसी फूल के
पौधे में प्रवेश कर जाती ।
प्रथम बार जब देखा उसको
जाते एक घने पौधे में
सोचा अभी निकल आयेगी
कुछ चुगने वहाँ गई होगी
थोड़ी देर नहीं जब आई
तनिक निकट तब देखा जाकर
वह एकाकी, पंख पसारे
सोई थी पत्ते के ऊपर।

ऐसा क्यों होता है?

मान लिया दो स्तंभों पर
एक बाँस स्थापित करके
उस पर बोझा रख दें ‘मन’ भर
तब झुक जाता भारित होकर।
ठीक मध्य में झुकता ज्यादा,
युगल किनारे कम झुकता है;
लेकिन क्या यह भी मालूम है,
ऐसा क्यों होता है?
इसकी भौतिक थ्योरी है
जिसको कहते हैं ‘नमन घूर्ण’।
तदनुसार हैं गणना करते,
बाँस नहीं टूटे झुक करके,
अतः उसे हैं प्रबलित करते।
पर कभी कभी होंगे सुनते
लोगों को यह भी कहते
‘मन’ भारी है।
इसका क्या आशय है?
‘मन’ जो है सो भार युक्त है?
लेकिन भार नहीं दिखता है,
‘मन’ भी नहीं दिखाई देता,
तो इसकी क्या थ्योरी है!
इसकी गणना कैसे होगी!
प्रश्न जटिल है
लेकिन तनिक विचार कीजिये
‘मन’ तो भारी होता ही है
चाहे वह ‘मन’ हो
या यह ‘मन’ हो।
दोनों में केवल यह प्रभेद
वह भौतिक है, यह नैसर्गिक।

(‘नमन घूर्ण’ अर्थात बेंडिंग मोमेंट जिसकी थ्योरी का उपयोग स्ट्रक्चर की डिजाईन में किया जाता है।)

टैन्जेंट 

समानान्तर रेखाओं से तो
तिर्यक रेखायें अच्छी है
जो आपस में टकराती हैं
लड़ती हैं तथा झगड़ती हैं
और कभी टैन्जेंट हुईं तो
कोमलता से छूती हैं ।
समानान्तर रेखाओं का क्या
साथ साथ चलती अवश्य हैं
पर आपस में कभी नहीं मिलती
जैसे कि दो रेल पटरियाँ
रहती हैं वे साथ साथ
और बोझ उठातीं एक साथ
जब ट्रेन गुज़रती है उनपर
तो चिल्लातीं दोनों मिलकर
है एक अलग अस्तित्वहीन
रहना पड़ता है युगल रूप
फिर भी हैं कितनी एकाकी
आपस में कभी नहीं मिलतीं
यही नियति निर्धारित उनकी।
इसीलिए तो कहता हूँ
तिर्यक रेखायें अच्छी हैं
जो लड़ती और झगड़ती हैं
पर कोमलता से छूती हैं।

कच्ची उम्र के पक्के साथी

वह उम्र भले ही कच्ची थी, पर तब के साथी पक्के थे।
वह निश्छलता की दुनिया थी जिससे पटती दिल से पटती
वे हमको अच्छे लगते थे, हम उनको अच्छे लगते थे।
वह उम्र भले ही कच्ची थी, पर तब के साथी पक्के थे।
वह स्वार्थ रहित नाता होता, भोला होता भावुक होता
पाखण्ड झूठ माया फरेब से, मुक्त हमारे रिश्ते थे ।
वह उम्र भले ही कच्ची थी, पर तब के साथी पक्के थे।
अपवाद रूप से अगर कभी, रूठे भी तो क्या रूठे
दो चार घड़ी का किस्सा था, फिर ज्यों के त्यों हो जाते थे।
वह उम्र भले ही कच्ची थी, पर तब के साथी पक्के थे।
कुछ की थी आयु अधिक हमसे, कुछ समवय थे कुछ छोटे थे
पर उससे अंतर क्या पड़ता, जब ह्रदय हमारे मिलते थे।
वह उम्र भले ही कच्ची थी, पर तब के साथी पक्के थे।
यह याद हमारी पूँजी है, जिसको हम भूल नहीं सकते
हम में मौलिकता होती थी, ‘फेक’ नहीं हम होते थे।
वह उम्र भले ही कच्ची थी, पर तब के साथी पक्के थे।
वह स्वप्न सरीखी दुनिया थी, फिर भी संगीन हकीकत थी
अब वैसे लोग नहीं मिलते, जैसे की पहले होते थे।
वह उम्र भले ही कच्ची थी, पर तब के साथी पक्के थे।

नारी शक्ति 

बेड़ियाँ पिघल रहीं, प्रचंड नाद हो रहा
बंधन विमुक्त हो रहे, निनाद घोर हो रहा।
सामाजिक वर्जनाओं पर,रूढ़ियों ढकोसलों पर
कुत्सित मान्यताओं पर, प्रबल प्रहार हो रहा।
शहरों महानगरों में, कस्बों में गाँवों में
सड़कों पर राहों पर, चेतना प्रसार हो रहा।
मानवी प्रतिष्ठा का, जीवन स्वाधीनता का
नारी के प्रति जग, आभार ज्ञापन कर रहा।
स्त्री सजगता का, विजय का, सफलता का
नारी की शक्ति का, परचम लहरा रहा।

बी.एच.यू. की छात्राओं के प्रति 

वह कौन बैठा है वहाँ, बंशी बजाता चैन की
जल रहा उद्यान विद्या का, लेकिन उसे चिंता नहीं।
लाठी चार्ज करवाया, निहत्थी छात्राओं पर
तुम उस नीरो की बंशी तोड़ यदि देती तो बेहतर था।

उठाओ शस्त्र तुम अपने, ले लो कमान हाथों में
चलाकर तीर भीषणतम, मिला दो उसको मिटटी में।
जड़ों से नष्ट कर देना, पनपने फिर नहीं पाए
तुम उस हिटलर का सिंहासन, हिला देती तो बेहतर था।

बहुत आक्रोश है तुम में, इसे मत व्यर्थ जाने दो
पुकारो मत किसी को भी, किसी की राह मत देखो।
उस आततायी दुःशासन से, अकेले तुमको लड़ना है
तुम आगे बढ़ निरंकुश को, कुचल देती तो बेहतर था।

उत्पीड़न सहे अब तक, मगर आगे न सहना है
उसकी सैन्य रचना का, ये घेरा ध्वस्त करना है।
सुजनता छोड़ गर्वीले को, चकनाचूर कर दो तुम
नहीं कम हो किसी से तुम, दिखा देतीं तो बेहतर था।

(21सितम्बर 2017 को बी.एच.यू. की छात्रा के साथ बाइक सवारों की छेड़खानी के विरुद्ध बी.एच.यू. की छात्राओं के आन्दोलन के समय 23-9-17 को छात्राओं पर हुए लाठीचार्ज के बाद उग्र हुए आंदोलन पर काबू पाने के लिए पुलिस ने 35 राउंड से अधिक हवाई फायरिंग किया। सैकड़ों पुलिसवाले बीएचयू की सड़कों पर लाठी बरसाते दौड़ रहे थे। छात्रायें बचाओ बचाओ की गुहार लगा रहीं थीं लेकिन लाठी चलाने वाले आपा खो चुके थे।)

स्मॅाग

ये कैसी धुँध छाई, ये धुआँ कहाँ से आया?

मंत्री जी से जब पूछा, ये कैसी धुँध आई
बोले, लोकतान्त्रिक है, सब पर है छाई,
अमीर और ग़रीब में, फ़र्क नहीं करती
इसीलिए तो हमने एनसीआर में बुलाया।
ये कैसी धुँध छाई, ये धुआँ कहाँ से आया?

प्रकृति से जब पूछा,तो लाल करके चेहरा
क्रोध से वह बोली, कुछ हाथ नहीं मेरा,
अपना गिरेबाँ देखो, सब काम है तुम्हारा
क्यों मुझसे पूछते हो,ये कैसा धुआँ छाया।
ये कैसी धुँध छाई, ये धुआँ कहाँ से आया?

कुछ याद नहीं आती, है इंद्र धनुष रचना
नील गगन दिखना, है लगने लगा सपना,
जहरीली हवा फैली,प्रदूषण वितान ताना
था स्वच्छ वायुमण्डल, दूषित इसे बनाया।
ये कैसी धुँध छाई, ये धुआँ कहाँ से आया?

था पर्यावरण निर्मल,जोखिम में बदल डाला
पानी बनाया गंदला,अम्बर को किया धुँधला,
हम दोषी हैं प्रकृति के, यह काम है हमारा
आधुनिक अंधी दौड़ ने, इसे जटिल बनाया।
ये कैसी धुँध छाई, ये धुआँ कहाँ से आया?

कविता का फास्ट फूड

शीघ्रता की साधना, असिद्ध करती जा रही है,
धैर्य की अवधारणा अब लुप्त होती जा रही है।

विश्वअंतर्जाल रचना जब से हुई है अवतरित,
सूचना तकनीक तब से हो रही है विस्तारित।
विश्व होता जा रहा है विश्वव्यापी जाल शासित,
संबंधों की दृढ़ता को तय कर रहा है ‘लाइक’।
हृदयगत सम्वेदना अब दूर होती जा रही है,
धैर्य की अवधारणा अब लुप्त होती जा रही है।

सोशल मीडिया, अनसोशल होता जा रहा है,
उस पर अराजकता का राज होता जा रहा है।
सामाजिक संजाल से हो रहा जीवन प्रभावित,
लोग घटिया सोच वाले कर रहे हैं इसे दूषित।
जीवन से नैतिकता तिरोहित होती जा रही है,
धैर्य की अवधारणा अब लुप्त होती जा रही है।

ऊपर से आकर्षक लगता है सामाजिक नेट,
किन्तु इसकी भीतरी दशा की है उल्टी गति।
अज्ञानी भी धड़ल्ले से बहसबाजी करता है,
अपनी सड़ी गली सोच की, शेखी बघारता है।
शालीनता की सीमा अब नष्ट होती जा रही है,
धैर्य की अवधारणा अब लुप्त होती जा रही है।

साहित्य अधिक सबसे नेट पर हुआ प्रभावित,
चलताऊ लिखने वाला,बना आला साहित्यिक।
फास्ट फूड कविता का, नेट पर परोसता है,
बतौर महान कृति, कचरा पोस्ट करता है।
गंभीरता की महत्ता अब मंद होती जा रही है,
धैर्य की अवधारणा अब लुप्त होती जा रही है।
तथापि, इंटरनेट का पक्ष उज्जवल भी प्रचुर हैं,
पहले जो दुर्लभ था, मिलता एक क्लिक पर है।
अब विश्वअंतर्जाल की, अवहेलना सम्भव नहीं,
दोष मानसिकता का है,इंटरनेट का दोष नहीं।
सोच परिष्कृत करें जो विकृत होती जा रही है,
धैर्य की अवधारणा अब लुप्त होती जा रही है।

वासंती मौसम याद रहा 

वासंती मौसम याद रहा, पतझड़ का मौसम भूल गए
बाग़ों की बहारें याद रहीं, पत्तों का गिरना भूल गए।

शहर पुराना लोग नए थे, सतरंगी दुनिया क्या कहिये
वह बॉडी लैंग्वेज याद रही, अंदर की केमिस्ट्री भूल गए।

बलखाती ज़ुल्फों का चक्रव्यूह, अरमान भरा था दिलकश था
जाना तो उसमे याद रहा, आने का रास्ता भूल गए।

मादकता का वह आलम, हो गया निगाहों से ओझल
जो गीत वक़्त ने गाया था, उसका ही तरन्नुम भूल गए।

हमको अपनी ख़बर नहीं, क्या हाल सुनायें दुनिया की
आभासी दुनिया याद रही, पर असली दुनिया भूल गए।

निष्ठा प्रेम सच्चाई को, अब क्यों कर याद करे कोई
बेवक़्त कहानी लगती है, बेहतर है इनको भूल गए।

ज़िन्दगी

ज़िंदगी की उलझनों में यों न गुज़रा कीजिये,
चंद लम्हे लुत्फ़-ए-क़ुदरत-ए-नज़ारा लीजिये।

उन्हें भी साँस लेने को थोड़ी जगह तो दीजिये,
हसरत-ए-दिल का गिरीबाँ यों न मसला कीजिये।

इस भरी दुनिया में केवल ग़म ही ग़म नहीं है,
जिगर के आँसुओं से गुलशन को सींचा कीजिये।

सुना नहीं पाए ग़म-ए-दिल आरज़ू उनको अगर,
दिल की ख़्वाहिशों को हँस कर भुलाया कीजिये।

रातों को नींद नहीं आती दिल बेक़रार रहता है,
उजाले में बैठ कर कुछ लम्हे बिताया कीजिये।

ख़ामोश लम्हे

धुँधलके में लिपटी आई है शाम, इन्तिज़ार की बेचैनी छिपाए हुए,
हवाओं में तैरते एहसासों से, तमन्नाओं की लहरें बिखरती रहीं।

तन्हाई के लम्हे ख़ामोश थे,शाम-ए-ग़म की फितरत परेशान थी,
तस्कीने इज़्तिराब बेहासिल रहा, बेबसी गिर्दो पेश फिरती रही।

रंग ज्यों गाढ़ा होने लगा शाम का, त्यों गली में सन्नाटा छाने लगा,
फ़ज़ा में चुप्पियाँ गूँजती रहीं, आहटें ख़ौफ़ का साया बुनती रहीं।

आया खिड़की से एक आलस भरा, झोंका हवा का उदासी लिए,
अख़्तर शुमारी कट तो गई, रात भर चश्म-ए-नम भिगोती रही।

साया सा उभरा शब-ए-स्याह में, आरज़ूयें दिल की मचलने लगीं,
ख़ामोशी में अपनापन सा लगा, यादों की बरसात होती रही।

आँखें फेर सलाम कर लिया

तक़ाज़ा हसरतों का था, तमन्नाओं की बेकली,
बेख़ुदी में चलते चलते, आ गए उनकी गली,
अंदाज़-ए-रवैया कूचे ने बेज़ार कर दिया।
लोगों ने आँखें फेर कर सलाम कर लिया।

उनके कूचे का वहाँ, हमने मंज़र अजब देखा,
हवायें अजनबी सी थीं, फ़िज़ा बदली हुई देखा,
नज़रे इशारा बेरुख़ी का, बेमुरव्वत कर दिया।
लोगों ने आँखें फेर कर सलाम कर लिया।

सरीरत तो न थी कोई, उनके कूचे में हम जाते,
इतना ही इरादा था कि उनसे हाले दिल कहते,
पर सब ने हमें मुफ़्त में बदनाम कर दिया।
लोगों ने आँखें फेर कर सलाम कर लिया।

बेहतर तो यही होता कि उनसे दिल न लगता,
दिल को सुकून रहता, दिन चैन से गुज़रता,
पर दिल लगी ने,क्या करें, लाचार कर दिया।
लोगों ने आँखें फेर कर सलाम कर लिया।

ख़ुश रखने की कोशिश मैने बहुत की लेकिन

ख़ुश रखने की कोशिश मैने बहुत की लेकिन
ख़फ़ा हो जाते हैं लोग, कुछ बात ऐसी हो जाती।

भँवरा उदास है देखकर चमन का सूखा मंजर
बिगड़ता क्या बहारों का, अगर थोड़ा ठहर जाती।

कहते हैं दिल दुखाने को एक ही मुसीबत है काफ़ी
मगर यह भी तो कहते हैं, अकेले वह नहीं आती।

यक़ीनन दुश्वारियाँ बहुत हैं ज़माने की लेकिन
अगर कुछ मशविरे होते तो यह दुनिया संवर जाती।

मुश्किलें तमाम आती हैं, राह-ए-मंज़िल-ए-मक़सूद
मुश्किलें हैं तो मंज़िल है, वरना मंज़िल नहीं होती।

जनिया, घूम रही हो कहाँ (कजरी)

जनिया, घूम रही हो कहाँ कि पहिने पीत चुनरिया ना।
मनवा तड़प रहा है जैसे जल के बिना मछरिया ना।

सावन मास मेघ घिरि आये, रिम झिम परत फुहरिया,
नाले ताले सब उतराये, भर गई डगर डगरिया।
दसों दिशाएँ लोकित होतीं,जब जब बिजुरी चमके घन में,
जैसे पूर्ण चन्द्र में चमके, बाला तोर सजनिया ना।
जनिया, घूम रही हो कहाँ…

रात भये सखियाँ तरु नीचे, झूला झूलन आतीं,
मधुर कण्ठ से उच्च राग में, गीत कजरिया गातीं।
उनके स्वर लहरा लहरा कर, घर बाहर में यों छा जाते,
जैसे तेरा रूप छिटक कर, छाये भरी बजरिया ना।
जनिया, घूम रही हो कहाँ…

नभ में मेघ, ताल में पानी, खेतों में हरियाली छाई,
पर तेरे बिन सब कुछ मुझको, सूना सूना पड़े दिखाई।
तुम को छू कर आने वाली, मधुर सुवासित रूप गंध से,
सजनी तेरी याद दिलाये, शीतल मंद बयरिया ना।
जनिया, घूम रही हो कहाँ…

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