Poetry

ज्योत्स्ना शर्मा की रचनाएँ

दोहे

झूले, गीत, बहार सब, आम,नीम की छाँव।
हमसे सपनों में मिला, वो पहले का गाँव॥

सूरज की पहली किरन, पनघट उठता बोल।
छेड़ें बतियाँ रात की, सखियाँ करें किलोल॥

गगरी कंगन से कहे, अपने मन की बात।
रीती ही रस के बिना, बीत न जाए रात॥

अमराई बौरा गई, बहकी बहे बयार।
सरसों फूली सी फिरे, ज्यों नखरीली नार॥

कच्ची माटी, लीपना, तुलसी वन्दनवार।
सौंधी-सौंधी गंध से, महक उठे घर-द्वार॥

बेला भई विदाई की, घर-घर हुआ उदास।
बिटिया पी के घर चली, मन में लिए उजास॥

सोहर बन्ने गूँजते, आल्हा, होली गीत।
बजे चंग मस्ती भरे, कण-कण में संगीत॥

संध्या दीप जला गई, नभ भी हुआ विभोर।
उमग चली गौ वत्सला, अपने घर की ओर॥

बहकी-बहकी सी पवन, महकी-महकी रात।
नैनन-नैन निहारते, तनिक हुई ना बात॥

नींद खुली, अँखियाँ हुईं, रोने को मजबूर।
लेकर थैली, लाठियाँ, गाँव नशे में चूर॥

जाति-धर्म के नाम पर, बिखरा सकल समाज।
एक खेत की मेंड़ पर, चलें गोलियां आज॥

कैसे मैं धीरज धरूँ, दिखे न कोई रीत।
कैसे पाऊँगी वही, सावन, फागुन, गीत॥

दिए दिलासा दे रहे, रख मन में विश्वास।
हला! न हिम्मत हारिए, जलें भोर की आस॥

तम की कारा से निकल, किरण बनेगी धूप।
महकेगी पुष्पित धरा, दमकेगा फिर रूप॥

कुण्डलियाँ

कैसे-कैसे दे गई, दौलत दिल पर घाव,
रिश्तों से मृदुता गई, जीवन से रस भाव।
जीवन से रस भाव, कहें ऋतु कैसी आई,
स्वयं नीति गुमराह, भटकती है तरुणाई।
स्वारथ साधें आप, जतन कर जैसे-तैसे,
लोभ दिखाए खेल, देखिये कैसे-कैसे॥ 1

जीवन में उत्साह से, सदा रहे भरपूर
निर्मलता मन में रहे, रहें कलुष से दूर
रहें कलुष से दूर, दिलों के कँवल खिले से
हों खुशियों के हार, तार से तार मिले से
दिशा-दिशा हो धवल, धूप आशा की मन में
रहें सदा परिपूर्ण, उमंगित इस जीवन में॥ 2

दिनकर देता ताप जब, लेता नहीं विराम,
हरने को संताप, तब, आओ न घनश्याम।
आओ न घनश्याम, फूल, कलियाँ हर्षाएं,
सरसें मन अविराम, मगन हो झूमे गाएँ।
धरा धार ले धीर, गीत खुशियों के सुनकर,
कुछ तो कम हो पीर, लगे मुस्काने दिनकर॥ 3

दिन ने खोले नयन जब, बड़ा विकट था हाल,
पवन,पुष्प,तरु, ताल, भू, सबके सब बेहाल।
सबके सब बेहाल, कुपित कुछ लगते ज्यादा,
ले आँखों अंगार, खड़े थे सूरज दादा।
घोल रहा विष कौन .गरज कर जब वह बोले,
लज्जित मन हैं मौन, नयन जब दिन ने खोले॥ 4

जागेगा भारत अभी, पूरा है विश्वास,
नित्य सुबह सूरज कहे, रहना नहीं उदास।
रहना नहीं उदास, सृजन की बातें होंगी,
कर में कलम-किताब, सुलभ सौगातें होंगी
करे दीप उजियार, अँधेरा डर भागेगा,
बहुत सो लिया आज, सुनो भारत जागेगा॥ 5

सेदोका कविताएँ

1
उड़ो परिंदे!
पा लो ऊँचे शिखर
छू लो चाँद-सितारे,
अर्ज़ हमारी-
इतना याद रहे
बस मर्याद रहे!
2
जो तुम दोगे
वही मैं लौटाऊँगी
रो दूँगी या गाऊँगी,
तुम्हीं कहो न
बिन रस, गागर
कैसे छलकाऊँगी?
3
सज़ा दी मुझे
मेरा क्या था गुनाह
फिर मुझसे कहा
अरी कविता
गीत आशा के ही गा
तू भरना न आह!
4
आई जो भोर
बुझा दिए नभ ने
तारों के सारे दिए
संचित स्नेह
लुटाया धरा पर
किरणों से छूकर।
5
मन -देहरी
आहट सी होती है
देखूँ, कौन बोलें हैं?
आए हैं भाव
संग लिये कविता
मैंनें द्वार खोले हैं।
6
अकेली चली
हवा मन उदास
कितनी दुखी हुई
साथी जो बने
चन्दन औ’ सुमन
सुगंध सखी हुई।
7
मन से छुआ
अहसास से जाना
यूँ मैंने पहचाना
मिलोगे कभी
इसी आस जीकर
मुझको मिट जाना।
8
बूँद-बूँद को
समेट कर देखा
सागर मिल गया
मैं सींच कर
खिला रही कलियाँ
चमन खिल गया।
9
जीवन-रथ
विश्वास प्यार संग
चलते दो पहिये
समय -पथ
है सुगम, दुखों की
बात ही क्या कहिए।
10
मेरे मोहना
उस पार ले चल
चलूँगी सँभलके
दे ज्ञान दृष्टि
मिटे अज्ञान सारा
ऐसे मुझे मोह ना।
11
गीत बनेंगे
बस दो मीठे बोल,
सच्चे मीत बनेंगे
पथ में तेरे
उजियारे फैलाते
नन्हें दीप बनेंगे।

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