Poetry

ताराप्रकाश जोशी की रचनाएँ

मेरा वेतन

मेरा वेतन ऐसे रानी
जैसे गरम तवे पे पानी

एक कसैली कैंटीन से
थकन उदासी का नाता है
वेतन के दिन सा ही निश्चित
पहला बिल उसका आता है
हर उधार की रीत उम्र सी
जो पाई है सो लौटानी

दफ्तर से घर तक है फैले
कर्जदाताओं के गर्म तकाजे
ओछी फटी हुई चादर में
एक ढकु तो दूजी लाजे
कर्जा लेकर क़र्ज़ चुकाना
अंगारों से आग भुजानी

फीस,ड्रेस,कॉपिया,किताबें
आंगन में आवाजें अनगिन
जरूरतों से बोझिल उगता
जरूरतों में ढल जाता दिन
अस्पताल के किसी वार्ड सी
घर में सारी उम्र बितानी

अभी यह कविता अधूरी है

हिंदी में बोलूँ

हिंदी में बोलूँ
जो सोचूँ हिंदी में सोचूँ
जब बोलूँ हिंदी में बोलूँ

जन्म मिला हिंदी के घर में,
हिंदी दृश्य-अदृश्य दिखाए।
जैसे माँ अपने बच्चे को,
अग-जग की पहचान कराए।
ओझल-ओझल भीतर का सच,
जब खोलूँ हिंदी में खोलूँ।।

निपट मूढ़ हूँ पर हिंदी ने,
मुझसे नए गीत रचवाए।
जैसे स्वयं शारदा माता,
गूँगे से गायन करवाए।
आत्मा के आँसू का अमृत,
जब घोलूँ हिंदी में घोलूँ।।

शब्दों की दुनिया में मैंने,
हिंदी के बल अलख जगाए।
जैसे दीपशिखा के बिरवे
कोई ठंडी रात बिताए।
जो कुछ हूँ हिंदी से हूँ मैं,
जो हो लूँ हिंदी से हो लूँ।।

हिंदी सहज क्रांति की भाषा,
यह विप्लव की अकथ कहानी।
मैकाले पर भारतेंदु की
अमर विजय की अमिट निशानी।
शेष गुलामी के दाग़ों को,
फिर धो लूँ हिंदी से धो लूँ।।

हिंदी के घर फिर-फिर जन्मूँ
जन्मों का क्रम चलता जाए,
हिंदी का इतना ऋण मुझ पर
साँसों-साँसों चुकता जाए
जब जागूँ हिंदी में जागूँ
जब सो लूँ हिंदी में सो लूँ।।

बेटी की किलकारी

बेटी की किलकारी

कन्या भ्रूण अगर मारोगे
मां दुरगा का शाप लगेगा।
बेटी की किलकारी के बिन
आंगन-आंगन नहीं रहेगा।
जिस घर बेटी जन्म न लेती
वह घर सभ्य नहीं होता है।
बेटी के आरतिए के बिन
पावन यज्ञ नहीं होता है।
यज्ञ बिना बादल रूठेंगे
सूखेगी वरषा की रिमझिम।
बेटी की पायल के स्वर बिन
सावन-सावन नहीं रहेगा।
आंगन-आंगन नहीं रहेगा।

जिस घर बेटी जन्म न लेती
उस घर कलियां झर जाती है।
खुशबू निरवासित हो जाती
गोपी गीत नहीं गाती है।
गीत बिना बंशी चुप होगी
कान्हा नाच नहीं पाएगा।
बिन राधा के रास न होगा
मधुबन-मधुबन नहीं रहेगा।
आंगन-आंगन नहीं रहेगा।

जिस घर बेटी जन्म न लेती,
उस घर घड़े रीत जाते हैं।
अन्नपूरणा अन्न न देती
दुरभिक्षों के दिन आते हैं।
बिन बेटी के भोर अलूणी
थका-थका दिन सांझ बिहूणी।
बेटी बिना न रोटी होगी
प्राशन-प्राशन नहीं रहेगा
आंगन-आंगन नहीं रहेगा

जिस घर बेटी जन्म न लेती
उसको लक्षमी कभी न वरती।
भव सागर के भंवर जाल में
उसकी नौका कभी न तरती।
बेटी की आशीषों में ही
बैकुंठों का वासा होता।
बेटी के बिन किसी भाल का
चंदन-चंदन नहीं रहेगा।
आंगन-आंगन नहीं रहेगा।

जिस घर बेटी जन्म न लेती
वहां शारदा कभी न आती।
बेटी की तुतली बोली बिन
सारी कला विकल हो जाती।
बेटी ही सुलझा सकती है,
माता की उलझी पहेलियां।
बेटी के बिन मां की आंखों
अंजन-अंजन नहीं रहेगा।
आंगन-आंगन नहीं रहेगा।

जिस घर बेटी जन्म न लेगी
राखी का त्यौहार न होगा।
बिना रक्षाबंधन भैया का
ममतामय संसार न होगा।
भाषा का पहला स्वर बेटी
शब्द-शब्द में आखर बेटी।
बिन बेटी के जगत न होगा,
सजॅन, सजॅन नहीं रहेगा।
आंगन-आंगन नहीं रहेगा।

जिस घर बेटी जन्म न लेती
उसका निष्फल हर आयोजन।
सब रिश्ते नीरस हो जाते
अथॅहीन सारे संबोधन।
मिलना-जुलना आना-जाना
यह समाज का ताना-बाना।
बिन बेटी रुखे अभिवादन
वंदन-वंदन नहीं रहेगा।
आंगन-आंगन नहीं रहेगा।

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