तिलोक चंद ‘महरूम’की रचनाएँ

दस्त-ए-ख़िरद से पर्दा-कुशाई न हो सकी

दस्त-ए-ख़िरद से पर्दा-कुशाई न हो सकी
हुस्न-ए-अज़ल की जलवा-नुमाई न हो सकी

रंग-ए-बहार दे न सके ख़ार-ज़ार को
दस्त-ए-जुनूँ में आबला-साई न हो सकी

ऐ दिल तुझे इजाज़त-ए-फ़रियाद है मगर
रुसवाई है अगर शिनवाई न हो सकी

मंदर भी साफ़ हम ने किए मस्जिदें भी पाक
मुश्किल ये है के दिल की सफ़ाई न हो सकी

फ़िक्र-ए-मआश ओ इश्क़-ए-बुताँ याद-ए-रफ़्तगाँ
इन मुश्किलों से अहद-बरआई न हो सकी

ग़ाफ़िल न तुझ से ऐ ग़म-ए-उक़्बा थे हम मगर
दाम-ए-ग़म-ए-जहाँ से रिहाई न हो सकी

मुंकिर हज़ार बार ख़ुदा से हुआ बशर
इक बार भी बशर से ख़ुदाई न हो सकी

ख़ुद ज़िंदगी बुराई नहीं है तो और क्या
‘महरूम’ जब किसी से भलाई न हो सकी

फ़ित्ना-आरा शोरिश-ए-उम्मीद है मेरे लिए

फ़ित्ना-आरा शोरिश-ए-उम्मीद है मेरे लिए
ना-उम्मीदी राहत-ए-जावेद है मेरे लिए

देखता हूँ हर कहीं हुस्न-ए-अज़ल का इनइकास
ज़र्रा ज़र्रा ग़ैरत-ए-ख़ुर्शीद है मेरे लिए

साफ़ आता है नज़र अंजाम हर आग़ाज़ का
ज़िंदगानी मौत की तम्हीद है मेरे लिए

जाग उठती है तह-ए-दामान-ए-शब से सुब्ह-ए-नौ
मौत क्या है ज़ीस्त की तजदीद है मेरे लिए

हमारे वास्ते है एक जीना और मर जाना

हमारे वास्ते है एक जीना और मर जाना
के हम ने ज़िंदगी को जादा-ए-राह-ए-सफ़र जाना

यकायक मंज़िल-ए-आफ़ात-ए-आलम से गुज़र जाना
डरें क्यूँ मौत से जब है इसी का नाम मर जाना

तेरी नज़रों से गिर जाना तेरे दिल से उतर जाना
ये वो उफ़्ताद है जिस से बहुत अच्छा है मर जाना

जवाब-ए-अब्र-ए-नीसाँ तुझ को हम ने चश्म-ए-तर जाना
के हर इक क़तरा-ए-अश्क-ए-चकीदा को गोहर जाना

तलातुम आरज़ू में है न तूफ़ाँ जुस्तुजू में है
जवानी का गुज़र जाना है दरिया का उतर जाना

हम अपने रहज़न ओ रह-बर थे लेकिन सादा-लौही से
किसी को राह-ज़न समझे किसी को राह-बार जाना

मैं ऐसे राह-रौ की जुस्तुजू में मर मिटा जिस ने
तन-ए-ख़ाकी को राह-ए-इश्क़ में गर्द-ए-सफ़र जाना

लब-ए-बाम आए तुम और उन के चेहरे हो गए फीके
क़मर ने तुम को ख़ुर्शीद और सितारों ने क़मर जाना

न भूलेगा हमें ‘महरूम’ सुब्ह-ए-रोज़-ए-महशर तक
किसी का मौत के आग़ोश में वक़्त-ए-सहर जाना

हिज्राँ की शब जो दर्द के मारे उदास हैं

हिज्राँ की शब जो दर्द के मारे उदास हैं
उन की नज़र में चाँद सितारे उदास हैं

आँखें वो फिर गईं के ज़माना उलट गया
जीते थे जो नज़र के सहारे उदास हैं

क्या हीर अब कहीं है न राँझे का जाँ-नशीं
क्यूँ ऐ चनाब तेरे किनारे उदास हैं

बेहतर है हम भी चश्म-ए-जहाँ-बीं को मूँद लें
दुनिया के अब तमाम नज़ारे उदास हैं

‘महरूम’ क्या कलाम भी अपना फ़ना हुआ
क्यूँ हम को खो के दोस्त हमारे उदास हैं

होते हैं ख़ुश किसी की सितम-रानियों से हम

होते हैं ख़ुश किसी की सितम-रानियों से हम
वक़्फ़-ए-बला हैं अपनी ही नादानियों से हम

किस मुँह से जा के शिकवा-ए-जौर-ओ-जफ़ा करें
मरते हैं और उन की पशेमानियों से हम

मीरास-ए-दश्त-ओ-कोह में फ़रहाद ओ क़ैस की
उल्फ़त को पूछते हैं बयाबानियों से हम

घर बैठे सैर होती है अर्ज़ ओ समा की रोज़
महव-ए-सफ़र हैं तबआ की जुलानियों से हम

क्यूँकर बग़ैर जलवा-ए-हैरत तराज़-ए-हुस्न
पाएँ नजात दिल की परेशानियों से हम

ऐ बानी-ए-जफ़ा तेरा एहसाँ है इस में क्या
जीते हैं गर तो अपनी गिराँ-जानियों से हम

इस का गिला नहीं के दुआ बे-असर गई

इस का गिला नहीं के दुआ बे-असर गई
इक आह की थी वो भी कहीं जा के मर गई

ऐ हम-नफ़स न पूछ जवानी का माजरा
मौज-ए-नसीम थी इधर आई उधर गई

दाम-ए-ग़म-ए-हयात में उलझा गई उमीद
हम ये समझ रहे थे के एहसान कर गई

इस ज़िंदगी से हम को न दुनिया मिली न दीं
तक़दीर का मुशाहिदा करते गुज़र गई

अंजाम-ए-फ़स्ल-ए-गुल पे नज़र थी वगरना क्यूँ
गुलशन से आह भर के नसीम-ए-सहर गई

बस इतना होश था मुझे रोज़-ए-विदा-ए-दोस्त
वीराना था नज़र में जहाँ तक नज़र गई

हर मौज-ए-आब-ए-सिंध हुई वक़्फ़-ए-पेच-ओ-ताब
‘महरूम’ जब वतन में हमारी ख़बर गई.

कम न थी सहरा से कुछ भी ख़ाना-वीरानी मेरी

कम न थी सहरा से कुछ भी ख़ाना-वीरानी मेरी
मैं निकल आया कहाँ ऐ वाए नादानी मेरी

क्या बनाऊँ मैं किसी को रह-बर-ए-मुल्क-ए-अदम
ऐ ख़िज़्र ये सर ज़मीं है जानी-पहचानी मेरी

जान ओ दिल पर जितने सदमे हैं उसी के दम से हैं
ज़िंदगी है फ़िल-हक़ीक़त दुश्मन-ए-जानी मेरी

इब्तिदा-ए-इश्क़-ए-गेसू में न थीं ये उलझनें
बढ़ते बढ़ते बढ़ गई आख़िर परेशानी मेरी

दश्त-ए-हस्ती में रवाँ हूँ मुद्दआ कुछ भी नहीं
कब हुई मोहताज-ए-लैला क़ैस-सामानी मेरी

और तू वाक़िफ़ नहीं कोई दयार-ए-इश्क़ में
है जुनूँ शैदा मेरा वहशत है दीवानी मेरी

बाग़-ए-दुनिया में यूँही रो हँस के काटूँ चार दिन
ज़िंदगी है शबनम ओ गुल की तरह फ़ानी मेरी

बाद-ए-तर्क-ए-आरज़ू बैठा हूँ कैसा मुतमइन
हो गई आसाँ हर इक मुश्किल ब-आसानी मेरी

हाँ ख़ुदा लगती ज़रा कह दे तू ऐ हुस्न-ए-सनम
आशिक़ी औरों की अच्छी या के हैरानी मेरी

लख़्त-ए-दिल खाने को है ख़ून-ए-जिगर पीने को है
मेज़बान-ए-दहर ने की ख़ूब मेहमानी मेरी

नग़मा-ज़न सहरा में हो जिस तरह कोई अंदलीब
यूँ है ऐ ‘महरूम’ सरहद में ग़ज़ल-ख़्वानी मेरी

ख़ुदा से वक़्त-ए-दुआ हम सवाल कर बैठे

ख़ुदा से वक़्त-ए-दुआ हम सवाल कर बैठे
वो बुत भी दिल को ज़रा अब सँभाल कर बैठे

किया है आँख की गर्दिश से पीस कर सुरमा
वो बे-चले ही मुझे पाइमाल कर बैठे

तमाम उम्र परेशाँ रक्खा दम-ए-आख़िर
बला से मेरी परेशाँ वो बाल कर बैठे

चले हैं तूर को मूसा मगर हमें मतलब
के हम बुतों ही में ये देख भाल कर बैठे

रवाँ हैं अश्क किसी के फ़िराक़ में या रब
कोई न पुर्सिश-ए-वजह-ए-मलाल कर बैठे

बुरा हूँ उल्फ़त-ए-ख़ुबाँ का हम-नशीं हम तो
शबाब ही में बुरा अपना हाल कर बैठे

न इल्म है न ज़बाँ है तो किस लिए ‘महरूम’
तुम अपने आप को शाएर ख़याल कर बैठे

क्या सुनाएँ किसी को हाल अपना

क्या सुनाएँ किसी को हाल अपना
अपने दिल में रहे मलाल अपना

शर्म-सार-ए-जवाब हो न सका
बस-के ख़ुद्दार था सवाल अपना

किस ने देखा नहीं है बाद-ए-उरूज
साया-ए-चर्ख़ में ज़वाल अपना

हसरत-ए-दीद ले चले हम तो
आप देखा करें जमाल अपना

पेच-दर-पेच गेसू-ए-मुश्कीं
जा के उलझा कहाँ ख़याल अपना

दिल असीर-ए-बला-ए-ज़ुल्फ़-ए-दराज़
महव-ए-फ़रियाद बाल बाल अपना

मौत आई न इल्तिजाओं से
और जीना हुआ वबाल अपना

है ये पुर-दर्द दास्ताँ ‘महरूम’
क्या सुनाएँ किसी को हाल अपना

ये किस से आज बरहम हो गई है

ये किस से आज बरहम हो गई है
के ज़ुल्फ़-ए-यार पुर-ख़म हो गई है

टपक पड़ते हैं वक़्त-ए-सुब्ह आँसू
ये आदत मिस्ल-ए-शबनम हो गई है

ब-ज़ाहिर गरम है बाज़ार-ए-उल्फ़त
मगर जिंस-ए-वफ़ा कम हो गई है

ज़हे तासीर-ए-कू-ए-ख़ाक-ए-जानाँ
मेरे ज़ख़्मों पे मरहम हो गई है

बस ऐ दस्त-ए-अजल कुछ रहम भी कर
के दुनिया बज़्म-ए-मातम हो गई है

नहीं ख़ौफ़ शब-ए-हिज्राँ मुझे अब
मेरी ग़म-ख़्वार ओ हम-दम हो गई है

यही हालत है इक मुद्दत से ‘महरूम’
तबीअत ख़ू-गर-ए-ग़म हो गई है

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