तुफ़ैल चतुर्वेदी की रचनाएँ

जिस जगह पत्थर लगे थे रंग नीला कर दिया

जिस जगह पत्थर लगे थे रंग नीला कर दिया
अबकी रुत ने मेरा बासी जिस्म ताज़ा कर दिया

आइने में अपनी सूरत भी न पहचानी गयी
आँसुओं ने आँख का हर अक्स धुँधला कर दिया

उसकी ख़्वाहिश में तुम्हारा सर है, तुमको इल्म था
अपनी मंज़ूरी भी दे दी, तुमने ये क्या कर दिया

उसके वादे के इवज़ दे डाली अपनी जिन्दगी
एक सस्ती शय का ऊँचे भाव सौदा कर दिया

कल वो हँसता था मेरी हालत पे अब हँसता हूँ मैं
वक्त ने उस शख़्स का चेहरा भी सहरा कर दिया

था तो नामुमकिन तेरे बिन मेरी साँसों का सफर
फिर भी मैं ज़िन्दा हूँ मैंने तेरा कहना कह दिया

हम तो समझे थे कि अब अश्कों की किश्तें चुक गईं
रात इक तस्वीर ने फिर से तकाज़ा कर दिया

कोई वादा न देंगे दान में क्या

कोई वादा न देंगे दान में क्या
झूठ तक अब नहीं ज़बान में क्या

मेरी हालत पे आँख में आँसू,
दर्द दर१ आया कुछ चटान में क्या

क्यों झिझकता है बात कहने में
झूठ है कुछ तेरे बयान में क्या

सच अदालत में क्यों नहीं बोले
काँटे उग आये थे ज़बान में क्या

रात-दिन सुनता हूँ तेरी आहट
नक़्स२ पैदा हुआ है कान में क्या

मुझ पे तू ज़ुल्म क्यों नहीं करता
अब नहीं हूँ तेरी अमान३ में क्या

तू तो रहता है ध्यान में मेरे
मै भी रहता हूँ तेरे ध्यान में क्या

वही चेहरा नजर नहीं आता
धूल उड़ने लगी जहान में क्या

१- बस जाना २- दोष ३- पनाह, कृपा

किसी को अपना करीबी शुमार क्या करते

किसी को अपना करीबी शुमार क्या करते
वो झूठ बोलते थे, एतबार क्या करते

पलट के लौटने में पीठ पर लगा चाकू
वो गिर गया था तो फिर उस पे वार क्या करते

गुज़ारनी ही पड़ी साँसें पतझड़ों के बीच
जो तू नहीं था तो जाने-बहार क्या करते

दीये जलाना मुहब्बत के अपना मज़हब है
हम ऐसे लोग अँधेरे शुमार क्या करते

खयाल ही नहीं आया, है जख़्म-जख़्म बदन
जो चाहते थे तुझे खुद से प्यार क्या करते

मिज़ाज अपना है तूफ़ाँ को जीतना लड़कर
उतर गया था वो दरिया तो पार क्या करते

कुछ एक दिन में ग़ज़ल से लड़ा ही लीं आँखें
तमाम उम्र तेरा इंतजार क्या करते

ग़ज़ल के शेरों की क़ीमत हँसी से माँगते हैं

ग़ज़ल के शेरों की क़ीमत हँसी से माँगते हैं
वो खूँबहा[1] भी मेरा अब मुझी से माँगते हैं

इसीलिये तो कुचलती है रात-दिन दुनिया
हम अपना हक़ भी बड़ी आजिज़ी[2] से माँगते हैं

इन्हें सिखाओ न आदाबे-जिन्दगी यारो
ये मगफ़रत[3]भी इसी शायरी से माँगते हैं

बहुत संभल के फ़क़ीरों पे तब्सरा[4] करना
ये लोग पानी भी सूखी नदी से माँगते हैं

ये तेरी मर्ज़ी है हमसे न मिल, न दे दरशन
मगर ये सोच के हम तुझ सख़ी[5] से माँगते हैं

कभी ज़माना था उसकी तलब में रहते थे
और अब ये हाल है ख़ुद को उसी से माँगते हैं

रात जागी न कोई चाँद न तारा जागा

रात जागी न कोई चाँद न तारा जागा
उम्र भर साथ मैं अपने ही अकेला जागा

क़त्ल से पहले ज़बाँ काट दी उसने मेरी
मैं जो तड़पा तो न अपना न पराया जागा

भर गई सात चटक रंगों की लय कमरे में
गुदगुदाया उसे मैंने तो वो हँसता जागा

मैं ख़यालों से तेरे कब रहा ग़ाफ़िल जानाँ
शब में नींद आ भी गई तो तेरा सपना जागा

उसकी भी नींद उड़ी सो नहीं पाया वो भी
मैं वो सहरा हूँ कि जिसके लिये दरिया जागा

दिन को तो तय था मगर ख़्वाब में जागा शब को
यानी मैं जाग के हिस्से के अलावा जागा

फिर वो लौ देने लगे पाँव के छाले मेरे
फिर मेरे सर में तेरी खोज का फ़ित्ना जागा

बचे-बचे हुए फिरते हो क्यों उदासी से

बचे-बचे हुये फिरते हो क्यों उदासी से
मिला-जुला भी करो उम्र-भर के साथी से

ग़ज़ल की धूप कहाँ है, पनाह दे मुझको
गुजर रहा हूँ ख़यालों की सर्द घाटी से

पकड़ सका न मैं दामन, न राह रोक सका
गुज़र गया है तेरा ख़्वाब कितनी तेज़ी से

हवेलियों की निगाहों में आग तैरती है
सवाल पूछ रहा हूँ मैं एक खिड़की से

फ़ना के बाम पे जाकर तलाशे-हक़ होगी
दिखाई कुछ न दिया ज़िन्दगी की सीढ़ी से

हवा के रुख़ से अलग अपनी मंज़िलें मत ढ़ूँढ़
ये रंज़िशें तो मुनासिब नहीं हैं किश्ती से

चमक पे आँखों की तुमको “तुफ़ैल” हैरत क्यों?
दीये जले हैं ये इक उम्र खारे पानी से

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