Poetry

तेजेन्द्र शर्मा की रचनाएँ

टेम्स का पानी

टेम्स का पानी, नहीं है स्वर्ग का द्वार
यहां लगा है, एक विचित्र माया बाज़ार!

पानी है मटियाया, गोरे हैं लोगों के तन
माया के मक़डजाल में, नहीं दिखाई देता मन!

टेम्स कहां से आती है, कहां चली जाती है
ऐसे प्रश्न हमारे मन में नहीं जगा पाती है !

टेम्स बस है ! टेम्स अपनी जगह बरकरार है !
कहने को उसके आसपास कला और संस्कृति का संसार है !

टेम्स कभी खाड़ी है तो कभी सागर है
उसके प्रति लोगों के मन में, न श्रध्दा है न आदर है!

बाज़ार संस्कृति में नदियां, नदियां ही रह जाती हैं
बनती हैं व्यापार का माध्यम, मां नहीं बन पाती हैं

टेम्स दशकों, शताब्दियों तक करती है गंगा पर राज
फिर सिक़ुड़ जाती है, ढूंढती रह जाती है अपना ताज!

टेम्स दौलत है, प्रेम है गंगा; टेम्स ऐश्वर्य है भावना गंगा
टेम्स जीवन का प्रमाद है, मोक्ष की कामना है गंगा

जी लगाने के क्ई साधन हैं टेम्स नदी के आसपास
गंगा मैय्या में जी लगाता है, हमारा अपना विश्वास!

ये घर तुम्हारा है

जो तुम न मानो मुझे अपना, हक तुम्हारा है
यहां जो आ गया इक बार, बस हमारा है

कहां कहां के परिन्दे, बसे हैं आ के यहाँ
सभी का दर्द मेरा दर्द, बस ख़ुदारा है

नदी की धार बहे आगे, मुड क़े न देखे
न समझो इसको भंवर अब यही किनारा है

जो छोड़ आये बहुत प्यार है तुम्हें उससे
बहे बयार जो, समझो न तुम, शरारा है

यह घर तुम्हारा है इसको न कहो बेगाना
मुझे तुम्हारा, तुम्हें अब मेरा सहारा है

डरे सहमे बेजान चेहरे

अपने चारों ओर
निगाह दौड़ाता हूँ,
तो डरे, सहमे, बेजान
चेहरे पाता हूं

डूबे हैं गहरी सोच में
भयभीत मां, परेशान पिता
अपने ही बच्चों में देखते हैं
अपने ही संस्कारों की चिता

जब भाषा को दे दी विदाई
कहां से पायें संस्कार
अंग्रेज़ी भला कैसे ढोए
भारतीय संस्कृति का भार!

समस्या खडी है मुँह बाये
यहां रहें या वापिस गांव चले जायें?
तन यहां है, मन वहाँ
त्रिशंकु! अभिशप्त आत्माएँ!

संस्कारों के बीज बोने का
समय था जब,
लक्ष्मी उपार्जन के कार्यों में
व्यस्त रहे तब!

कहावत पुरानी है
बबूल और आम की
लक्ष्मी और सरस्वती की
सुबह और शाम की

सुविधाओं और संस्कृति की लडाई
सदियों से है चली आई
यदि पार पाना हो इसके,
बुध्दम् शरणम् गच्छामि!

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