त्रिजुगी कौशिक की रचनाएँ

मुनगे का पेड़ 

घर की बाड़ी में
मुनगे क एक पेड़ है
वह गाहे-बगाहे की साग
प्रसूता के लिए तो पकवान है
मकान बनाने के लिए उसे काटना था
पर किसी की हिम्मत नहीं
उसमें बसी हैं
माँ की स्मृतियाँ
जैसे नीम्बू के पेड़ में दीदी की
पिताजी की– तालाब में लगाए
बड़ में
नतमस्तक हो जाता है हर कोई
उसी तरह
नीम्बू मुनगे का यह पेड़ है
पहले हम खेतों को
पेड़ों की वज़ह से पहचानते थे
हमारा बचपन गुज़रता था
आम, इमली, अमरूद, जाम के पेड़ों में
अब जिस तरह कट रहे हैं पेड़
स्मृतियाँ कट रही हैं
बदलता जा रहा है गाँव
भूलता जा रहा है गाँव ।

झुर्रियाँ

माथे पर
झुर्रियाँ झलकने लगी हैं
ये चिन्ता की हैं
या उम्र की… पर
चेहरे पर प्रौढ़ता का अहसास कराती हैं
ये
हर बुजुर्ग के चहरे पर
बल खाते हुए देखी जा सकती हैं
यह सुखों का कटाव है
या दुखों का हिसाब कहा नहीं जा सकता
किसी बूढ़ी माँ के ललाट पर
संवेदना का स्वर उचारती
काव्यपंक्तियाँ ज़रूर दिखती हैं
बूढ़े बाप के फ़लक पर
ज़िन्दगी का जोड़-घटाव
ऋअण-धन का हो या
दुख-दर्दों का पड़ाव
पढ़ा जा सकता हि
झुर्रियाँ
जीवन-इतिहास की लिपिबद्ध कहानी हैं
क्या आपने कभी पढ़ने की कोशिश की है?

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