Poetry

फ़ज़ल हुसैन साबिर की रचनाएँ

है जो ख़ामोश बुत-ए-होश-रूबा मेरे बाद

है जो ख़ामोश बुत-ए-होश-रूबा मेरे बाद
गुल खिलाएगा कोई और नया मेरे बाद

तू जफ़ाओं से जो बदनाम किए जाता है
याद आएगी तुझे मेरी वफ़ा मेरे बाद

कोई शिकवा हो सितमगार तो ज़ाहिर कर दे
फिर न करना तू कभी कोई गिला मेरे बाद

इबरत-अंगेज़ है अफ़्साना मिरे मरने का
रूक गए हैं क़दम-ए-उम्र-ए-बक़ा मेरे बाद

ज़मज़में ख़ाना-ए-सय्याद के क्यूँ गूँजते हैं
क्या कोई ताज़ा गिरफ़्तार हुआ मेरे बाद

सर के बल इश्क़ की मंज़िल को किया तय मैं ने
नहीं मिलते जो निशान-ए-कफ़-ए-पा मेरे बाद

‘साबिर’-ए-ख़स्ता को हर हाल में या रब रख शाद
कहीं ऐसा न हो हो सब्र फ़ना मेरे बाद

इधर भी देख ज़रा बे-क़रार हम भी हैं

इधर भी देख ज़रा बे-क़रार हम भी हैं
तिरे फ़िदाई तिरे जाँ-निसार हम भी हैं

बुतो हक़ीर न समझो हमें ख़ुदा के लिए
ग़रीब बाँदा-ए-परवर-दिगार हम भी हैं

कहाँ की तौबा ये मौक़ा है फूल उड़ाने का
चमन है अब है साक़ी है यार हम भी हैं

मिसाल-ए-ग़ुंचा उधर ख़ंदा-ज़न है वो गुल-ए-तर
मिसाल-ए-अब्र इधर अश्क-बार हम भी है

जिगर ने दिल से कहा दर्द-ए-हिज्र-ए-जानाँ में
कि एक तू ही नहीं बे-क़रार हम भी हैं

मुदाम सामने ग़ैरों के बे-नक़ाब रहे
इसी पे कहते हो तुम पर्दा-दार हम भी हैं

हमें भी दीजिए अपनी गली में थोड़ी जगह
ग़रीब बल्कि ग़रीबुद-दयार हम भी हैं

शगुफ़्ता बाग़-ए-सुख़न है हमीं से ऐ ‘साबिर’
जहाँ में मिस्ल-ए-नसीम-ए-बहार हम भी हैं

ख़ाक में मुझ को मिरी जान में मिला रक्खा है

ख़ाक में मुझ को मिरी जान में मिला रक्खा है
क्या मैं आँसू हूँ जो नज़रों से गिरा रक्खा है

इक तुम्हीं को नहीं बेचैन बना रक्खा है
अर्श भी तो मिरे नालों से हिला रक्खा है

सोरिश-ए-हिज्र ने इक सीम-बदन के मुझ को
ऐसा फूँका है कि इक्सीर बना रक्खा है

इक परी-वश की इनायत ने ज़माने में मुझे
वक़्त का अपने सुलैमान बना रक्खा है

अपने साया से भड़क कर रहा उसे शोख़ ने यूँ
मिरे अल्लाह किसे साथ लगा रखा है

दिल तो देता हूँ मिरी जान मगर ग़म है यही
मेरे अरमानों ने घर इस में बना रक्खा है

दिल के तालिब जो हुआ करते हैं आशिक़ से हसीं
तो उन्हें हुस्न ने ये काम सिखा रक्खा है

सामने आते हुए किस लिए शरमाते हो
जब मिरी आँख में घर तुम ने बना रक्खा है

मुफ़्त दिल को मिरे ऐ बर्क़ वश उल्फ़त है तिरी
मुज़्तरिब सूरत-ए-सीमाब बना रक्खा है

तेरी दुज़-दीदा निगाहें ये पता देती हैं
कि इन्हीं चोरों ने दिल मेरा चुरा रक्खा हे

माल चोरी का नहीं जब तो बता दो मुझ को
तुम ने किस चीज़ को मुट्ठी में दबा रक्खा है

तुम ने क्यूँ दिल में जगह दी है बुतों को ‘साबिर’
तुम ने क्यूँ काबा को बुत-ख़ाना बना रक्खा है

तेरी तस्वीर को तस्कीन-ए-जिगर समझे हैं

तेरी तस्वीर को तस्कीन-ए-जिगर समझे हैं
तेरे दीदार को हम ज़ौक़-ए-नज़र समझे हैं

क़हर की आँखों से तुम ने हमें जब भी देखा
हम इसे ऐन मोहब्बत की नज़र समझे हैं

है यही उन का समझना तो ख़ुदा हाफ़िज़ है
तालिब-ए-ख़ैर को वो बानी-ए-शर समझे हैं

उन की मानिंद कोई साहब-ए-इदराक कहाँ
जो फ़रिश्ते नहीं समझे वो बशर समझे हैं

अपनी आँखों में जगह देते हैं मुझ को ‘साबिर’
मेरे अहबाब मुझे कोहल-ए-बसर समझे हैं

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