Poetry

बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’की रचनाएँ

मुरली राजत अधर पर

मुरली राजत अधर पर उर विलसत बनमाल।
आय सोई मो मन बसौ सदा रंगीले लाल॥
सीस मुकुट कर मैं लकुट कटि तट पट है पीत।
जमुना तीर तमाल तर गो लै गावत गीत॥
वृज सुकुमार कुमारिका कालिन्दी के तीर।
गल बाँही दीन्हे दोऊ हँसत हरत भवपीर॥

लसत ललित सारी हिये

लसत ललित सारी हिये मंजुल माल अमंद।
जयति सदा श्री राधिका सह माधव वृज चन्द॥
सह माधव वृज चन्द सदा विहरत वृज माहीं।
कालिन्दी के कूल सूल भव रहत न जाहीं॥
बद्री नारायन भोरहि उठि दोउ पागे रस।
दोउ मुख ऊपर छुटे केश नैनन मैं आलस॥

दोऊ गल बाहीं दिये

दोऊ गल बाहीं दिये ठाढ़े जमुना तीर।
मंगलमय प्रातहि उठे राधा श्री बलबीर॥
राधा श्री बलबीर दोऊ दुहुँ रस अनुरागे।
झँपत पलक द्रिग अरुन भये घूमत निशि जागे॥
बद्री नारायन छुटि कच शुभ राजत सोऊ।
चुटकी दै जमुहात खरे अरसाने दोऊ॥

लाल लली तन हेरि कै

लाल लली तन हेरि कै महा प्रमोदित होत।
करि चकोर चख लखत मुख मंगल चंद उदोत॥
मंगल चन्द उदोत राहु सम केश रहे सजि।
मृग सम जुग द्रिग देखि दुःख काको न जात भजि॥
बद्री नारायन प्रमुदित ह्वै वारयो तन मन।
भाज्यो मन्मथ लाजि विलोकत लाल लली तन॥

प्रातहि उठि दोऊ

प्रातहि उठि दोऊ राधिका कृष्ण सोके।
तर सुभग लता के तीर मैं भानु जाके॥
हरि मुरलि बजावैं राधिका द्रिग नचावैं।
बहु भावैं दिखावैं कोटि कामैं लजावैं॥
हरि प्रिय दिशि जोहैं देखि कै चित्त मोहैं।
कुटिल जुगल भौंहें सीस पै बिन्दु सोहैं॥
अलकावलि काली चीकनी घूँघुराली।
जग मैं अस को है देखि कै जो न मोहै॥

मंगल प्रातहि उठे

मंगल प्रातहिं उठे दोऊ कुंजनि तैं आवत।
मंगल तान रसाल सुमंगल वेनु बजावत॥
मंगलमय अनुराग भरी हरि वचन बतावत।
मंगल प्यारी विहँसि श्याम को चित्त चुरावत॥
मंगल गलबाहीं दिये दोउ दुहून लखि मोहते।
बद्री नारायन जू खरे मंगलमय छवि जोहते॥

मंगल मय हरि सिर ऊपर

मंगलमय हरि सिर ऊपर शुभ मुकुट विराजत।
मंगल प्यारी मुख ऊपर बिन्दुली छबि छाजत॥
इत मंगल मुरलिका सहित धुनि सुन्दर बाजत।
उत प्यारी पग नूपुर धुनि सुनि सारस लाजत॥
दोऊ निज द्रिग सरन सों हँसि हँसि दोउन मारहीं।
बद्रीनारायन जू नवल छवि लखि तन मन धन वारहीं॥

मंगल राधा कृष्ण नाम

मंगल राधा कृष्ण नाम शुचि सरस सुहावन।
मंगलमय अनुराग जुगल मन मोह बढ़ावन॥
मंगल गावनि भाव सुमंगल बेनु बजावन।
मंगल प्यारी मोद विहँसि मुख चंद दुरावन॥
मंगलमय प्रातहि उठि दोऊ कुंजनितें गृह आवईं।
बद्रीनरायन जू तहाँ मंगल पाठ सुनावईं॥

वृखभानुजा माधव सुप्रातहि

वृखभानुजा माधव सुप्रातहिं भानुजा तट पै खरे।
दोऊ दुहूँ मुख चन्द निरखत चखनि जुग आनन्द भरे॥
मन दिये विनती करत माधव मिलन हित ठाढ़े अरे।
बद्री नरायन जू निहारत मन निछावर हित धरे॥

कभौ निकुंज सून मैं

कभौ निकुंज सून मैं प्रसून लाय लाय कै।
विशाल माल बाल को पिन्हावते बनाय कै॥
भले बनी ठनी प्रिया सुश्याम संग राजहीं।
प्रभा निहारि हारि हारि काम बाम लाजहीं॥

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