बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ की रचनाएँ

दुर्दशा दत्तापुर

श्रीपति कृपा प्रभाव, सुखी बहु दिवस निरन्तर।
निरत बिबिध व्यापार, होय गुरु काजनि तत्पर॥१॥

बहु नगरनि धन, जन कृत्रिम सोभा परिपूरित।
बहु ग्रामनि सुख समृद्धि जहाँ निवसति नित॥२॥

रम्यस्थल बहु युक्त लदे फल फूलन सों बन।
ताल नदी नारे जित सोहत, अति मोहत मन॥३॥

शैल अनेक शृंग कन्दरा दरी खोहन मय।
सजित सुडौल परे पाहन चट्टान समुच्चय॥४॥

बहत नदी हहरात जहाँ, नारे कलरव करि।
निदरत जिनहिं नीरझर शीतल स्वच्छ नीर झरि॥५॥

सघन लता द्रुम सों अधित्यका जिनकी सोहत।
किलकारत वानर लंगूर जित, नित मन मोहत॥६॥

सुमन सौरभित पर जहँ जुरि मधुकर गुंजारत।
लदे पक्क नाना प्रकार फल नवल निहारत॥७॥

बर विहंग अबली जहँ भाँति भाँति की आवति।
करि भोजन आतृप्त मनोहर बोल सुनावति॥८॥

कोऊ तराने गावत, कोउ गिटगिरी भरैं जहँ।
कोऊ अलापत राग, कोऊ हरनाम रटैं तहँ॥९॥

धन्यवाद जगदीस देन हित परम प्रेम युत।
प्रति कुंजनि कलरवित होत यों उत्सव अदभुत ॥१०॥

जाके दुर्गम कानन बाघ सिंह जब गरजत।
भागत डरि मृग माल, पथिक जन को जिय लरजत॥११॥

कूकन लगत मयूर जानि घन की धुनि हर्षित।
होत सिकारी जन को मन सहसा आकर्षित॥१२॥

हरी भरी घासन सों अधित्यका छबि छाई।
बहु गुणदायक औषधीन संकुल उपलाई॥१३॥

कबहुँ काज के व्याज, काज अनुरोध कबहुँ तहँ।
कबहुँ मनोरंजन हित जात भ्रमत निवसत जहँ॥१४॥

कबहुँ नगर अरु कबहुँ ग्राम, बन कै पहार पर।
आवश्यक जब जहाँ, जहाँ को कै जब अवसर॥१५॥

अथवा जब नगरन सौं ऊबत जी, तब गाँवन।
गाँवन सों बन शैल नगर हित मन बहलावन॥१६॥

निवसत, पै सब ठौर रहनि निज रही सदा यह।
नित्य कृत्य अरु काम काज सों बच्यो समय, वह॥१७॥

बीतत नित क्रीड़ा कौतुक, आमोद प्रमोदनि।
यथा समय अरु ठौर एक उनमें प्रधान बनि॥१८॥

औरन की सुधि सहज भुलावत हिय हुलसावत।
सब जग चिन्ता चूर मूर करि दूर बहावत॥१९॥

मन बहलावनि विशद बतकही होत परस्पर।
जब कबहूँ मिलि सुजन सुहृद सहचर अरु अनुचर॥२०॥

समालोचना आनन्द प्रद समय ठांव की।
होत जबै, सुधि आवति तब प्रिय वही गाँव की॥२१॥

जहँ बीते दिन अपने बहुधा बालकपन के।
जहँ के सहज सबै विनोद हे मोहन मन के॥२२॥

यह ग्राम प्रेमघन जी के पूर्वजों का निवासस्थान था और प्रेमघन जी भी इसी ग्राम में १९१२ बैक्रमीय में उत्पन्न हुए थे। इस ग्राम की प्राचीन विभूति तथा आधुनिक दशा का इसमें यथार्थ चित्रण है।

दर्शनाभिलाषा 

यों रहि रहि मन माहिं यदपि सुधि वाकी आवै।
अरु तिहि निरखन हित चित चंचल ह्वै ललचावै॥६९॥

तऊ बहु दिवस लौं नहिं आयो ऐसो अवसर।
तिहि लखि भूले भायन पुनि करि सकिय नवल तर॥७०॥

प्रति वत्सर तिहिं लाँघत आवत जात सदा हीं।
यदपि तऊँ नहिं पहुँचत, पहुँचि निकट तिहि पाहीं॥७१॥

रेल राँड़ पर चढ़त होत सहजहिं पर बस नर।
सौ सौ सांसत सहत तऊ नहिं सकत कछू कर॥७२॥

ठेल दियो इत रेल आय वे मेल विधानन।
हरि प्राचीन प्रथान पथिक पथ के सामानन॥७३॥

कियो दूर थल निकट, निकट अति दूर बनायो।
आस पास को हेल मेल यह रेल नसायो॥७४॥

जो चाहत जित जान, उतै ही यह पहुँचावत।
बचे बीच के गाम ठाम को नाम भुलावत॥७५॥

आलस और असुविधा की तो रेल पेल करि।
निज तजि गति नहिं रेल और राखी पौरुष हरि॥७६॥

तिहि तजि पाँचहु परग चलन लागत पहार सम।
नगरे तर थल गमन लगत अतिशय अब दुर्गम॥७७॥

इस्टेशन से केवल द्वै ही कोस दूर पर।
बसत ग्राम, पै यापैं चढ़ि लागत अति दुस्तर॥७८॥

यों बहु दिन पर जन्म भूमि अवलोकन के हित।
कियो सकल अनुकूल सफ़र सामान सुसज्जित॥७९॥

पहुँचे जहँ तहँ प्रतिवत्सर बहु बार जात है।
रहन सहन छूटे हूँ जेहि लखि नहिं अघात है॥८०॥

काम काज, गृह अवलोकन, कै स्वजन मिलन हित।
ब्याह बरातन हूँ मैं जाय रहे बहु दिन जित॥८१॥

यदपि गए जै बार हीन छबि होत अधिकतर।
लखि ता कहँ अति होत सोच आवत हियरो भर॥८२॥

पै यहि बार निहार दशा उजड़ी सी वाकी।
कहि न जाय कछु विकल होय ऐसी मति थाकी॥८३॥

द्वार

हाय यहै वह द्वार दिवस निसि भीर भरी जित।
भाँति भाँति के मनुजन की नित रहति इकतृत॥१११॥

एक एक से गुनी, सूर, पंडित, विरक्त जन।
अतिथि, सुहृद, सेवक समूह संग अमित प्रजागन॥११२॥

जहाँ मत्त मातंग नदत झूमत निसि वासर।
धूरि उड़ावत पवन, वही, विधि, वही धरा पर॥११३॥

जहँ चंचल तुरंग नरतत मन मुग्ध बनावत।
जमत, उड़त, ऐंड़त, उछरत पैंजनी बजावत॥११४॥

जहँ योधागन दिखरावत निज कृपा कुशलता।
अस्त्र शस्त्र अरु शारीरिक बहु भाँति प्रबलता॥११५॥

चटकत चटकी डाँड़ कहूँ कोउ भरत पैतरे।
लरत लराई को’ऊ एक एकन सों अभिरे॥११६॥

होत निसाने बाजी कहुँ लै तुपक गुलेलन।
कोऊ सांग बरछीन साधि हँसि करत कुलेलन॥११७॥

करत केलि तहँ नकुल ससक साही अरु मूषक।
वहै रम्य थल हाय आज लखि परत भयानक॥११८॥

नित जा पैं प्रहरी गन गाजत रहे निरन्तर।
वह फाटक सुविशाल सयन करि रह्यो भूमि पर॥११९॥

चौक

जिन बैठकन सहन मैं प्रातःकाल जुरे जन।
रहत प्रनाम सलाम करत हित सावधान मन॥161॥

रजनी संध्या समय जुरत जहँ सभा सुहावनि।
बिविध रीति समयानुसार चित चतुर लुभावनि॥162॥

कथा, बारता, रागरंग, लीला, कौतुक मय।
मन बहलावन काम काज हित सहित सदामय॥163॥

जगमगात जहँ दीपक अवल रहत निसि सुन्दर।
चहल पहल जित मची रहत नित नवल निरन्तर॥164॥

कास तहाँ अरु घास जमी ढूहन पर लखियत।
चरत अजामिल पात इतै सों उत अब घूमत॥165॥

मोदीखाना

यह भण्डार भवन जो अन्न भरो गरुआतो।
जहँ समूह नर नारिन को निस दिवस दिखातो॥203॥

आगन्तुकन सेवकन हित सीधन जहँ तौलत।
थकित रहत मोदी अबो सो सीध न बोलत॥204॥

मनुजन की को कहै मूँसहूँ तहँ न दिखाते।
तिनको बिलन भुजंग बसे इत उत चकराते॥205

सिपाहियों की रहनि

जहँ मध्यान समय दीने चौकन महँ चरबन।
चाभि चाभि पीयत सिखरन पुनि ह्वै प्रसन्न मन॥253॥

खात लगाय पान सुरती कोउ पीवत हुक्का।
विविध बतकही करत किते करि धक्का-मुक्का॥254॥

मांजत कोउ तरवार, कोऊ लै पोछत म्यानहिं।
कोऊ ढाल गैंड़े की फुलिया मलि चमकावहिं॥255॥

कोउ धोवत बन्दूक, बन्द बाँधत खुसियाली।
कोउ माजत बरछीन सांग उर बेधन वाली॥256॥

कौउ कटार माजत, कोउ जुगल तमंचे साजत।
कोउ ढालत गोली, कोउ बुंदवन बैठि बनावत॥257॥

कोउ बर्रोही खूनि खानि कै बरत पलीते।
कोउ सुखाय काटत, मुट्ठा बाधत निज रीते॥258॥

भरत तोसदानन कोउ, सिंगरा भरत बरूदहिं।
कोउ रंजक झुरवावहिं खोली झारहिं पोछहिं॥259॥

सिंगरा साजि परतले पेटी कोऊ साफ़ करि।
टाँगत निज-निज खूँटिन पर निज हथियारन धरि॥260॥

गुलटा कोऊ बनावहिं कोउ गुलेल सुधारहिं।
ढोल कसहिं कोउ बैठि, चिकारे कोऊ मिलावहिं॥261॥

ठीक साज कै मिले युवक रामायन गावत।
मजीरा डण्डताल करताल बजावत॥262॥

प्रेम भरे त्यों वृद्ध भक्त कोउ अर्थ करैं तहँ।
जब वे गहैं बिराम, राम रस यों बरसैं जहँ॥263॥

कहूँ वृद्ध कोउ बीर युद्ध की कथा पुरानी।
अपनी करनी सहित युवन सों कहहिं बखानी॥264॥

असि, गोली, बरछीन छाप दिखरावैं निज तन।
लखि कै साँचे साटिक-फिटिक सराहैं सब जन॥265॥

वृद्ध बीर इक रह्यो सुभाव सरल तिन माहीं।
जाढिग हम सब बालक गन मिलि निज प्रति जाहीं॥266॥

बीर कहानी जो कहि हम सबके मन मोहै।
भारी भारी घाव जासु तन पैं बहु सोहै॥267॥

पूछयो हम इक दिवस “कहा ये तुमरे तन पर”।
हँसि बोल्यो निर्दन्त “सबै ये गहने सुन्दर”॥268॥

जे गहने तुम पहिनत ये बालक नारिन हित।
अहैं बने नहिं पुरषन पैं ये सजत कदाचित॥269॥

पुरषन की शोभा हथियारन हीं सों होती।
कै तिनके घायन सों पहिर न हीरा मोती॥270॥

बोले हम यों भयो चींथरा बदन तुम्हारो।
नेकहु लगत न नीक भयंकर परम न कारो॥271॥

कह्यो वृद्ध हँसि तुम अबोध शिशु जानत नाहीं।
होत भयंकर पुरुष, नारि रमनीय सदाहीं॥272॥

कोमल, स्वच्छ, सुडौल सुघर तन सुमुखि सराही।
बाँके, टेढ़े, चपल, पुष्ट, साहसी सिपाही॥273॥

होत न जानत जे मरिबे जीबे की कछु भय।
अभिमानी, स्वतन्त्र, खल अरि नासन मैं निर्दय॥274॥

सदा न्याय रत, निबल दीन गो द्विज हितकारी।
निज धन धर्म्म भूमि रच्छक आसृत भय हारी॥275॥

कुरुख नजर जे इन्द्रहु की न सकत सहि सपने।
तृन सम समुझैं अरि सन्मुख लखि आवत अपने॥276॥

पुनि अपने बहु बार लरन की कथा कहानी।
बूढ़ बाघ सों डपटि-डपटि कैं बोलत बानी॥277॥

रहत पहर दिन जबै जानि संध्या को आगम।
सायं कृत्य हेतु तैयारी होत यथा क्रम॥278॥

धोइ भंग कोऊ कूंड़ी सोंटा सों रगड़त।
कोउ अफीम की गोली लै पाप नी सों निगलत॥279॥

कोउ हुक्का अरु कोऊ भरि गाँजा पीयत।
कोऊ सुरती खात बनै कोउ सुंघनी सूँघत॥280॥

कोउ लै डोरी लोटा निकरत नदी ओर कहँ।
कोऊ लै गुलेल, गुलटा बहु भरि थैली महँ॥281॥

कोऊ लिये बंदूक जात जंगल महँ आतुर।
मारत खोजि सिकार सिकारी जे अति चातुर॥282॥

कोऊ फँसावत मीन नदी तट बंसी साधे।
भक्त लोग जहँ बैठे रहत ईस आराधे॥283॥

संध्या समय लोग पहुँचत निज-निज डेरन पर।
निज निज रुचि अनुसार वस्तु लीने निज-निज कर॥284॥

कोउ खरहा कोउ साही मारे अरु निकिआये।
कोउ कपोत, कोउ हारिल, पिंडुक, तीतर लाये॥285॥

कोउ तलही, मुर्गाबी, कोऊ कराकुल, मारे।
काटि, छाँटि, पर, चर्म, अस्थि, लै दूर पवारे॥286॥

कोउ भाजी जंगली, कोऊ काछिन तैं पाये।
बहुतेरे पलास के पत्रन तोरि लिआये॥287॥

बिरचत पतरी अरु दोने अपने कर सुन्दर।
कोऊ मसाले पीसत, कोउ चटनी ह्वै ततपर॥288॥

कोउ सीधा नवहड़ ल्यावत मोदी खाने सन।
खरे जितै रुक्का लीने बहु आगन्तुक जन॥289॥

जोरत कोउ अहरा, कोऊ पिसान लै सानत।
कोऊ रसोई बनवत अरु कोऊ बनवावत॥290॥

दगत जबै इक ओरहिं सों चूल्हे सब केरे।
जानि परत जनु उतरी फौज इतैं कहुँ नेरे॥291॥

आज तहाँ नहिं कोऊ कारो कोहा लखियत।
नाहिं कोउ साज समाज, जाहि निरखत मन बिसरत॥292॥

बटत बुतात, जहाँ रुक्के, साँझहि सो पहरे।
अतिहि जतन सों चारहुँ दिसि दुहरे अरु तिहरे॥293॥

जाँचत जमादाद दारोगा जिन कहँ उठि निसि।
रत पलीता रहत तुपक दारन को दिसि दिसि॥294॥

घूमत जोधा गन जहँ पहरन पर जिसि चटकत।
आवत हरिकारन हूँ को जगदिसि पग थहरत॥295॥

रामलीला

होत रामलीला हित बहु भांतिन तैयारी।
बिधिवत लीला साज सबै भाँतित हिय हारी॥327॥

बनत सुनहरी पन्नी सों लंका बिशाल अति।
जगमगात जगमगा नगनि सों त्यों छबि छाजति॥328॥

होत नृत्य आरम्भ द्वै घरी दिवस रहत जित।
दशमुख को दरबार लगत निश्चर दल शोभित॥329॥

जहँ पर जैसो उचित साज तैसोई तहाँ पर।
देखि होत मन मुग्ध मानवन को विशेषतर॥330॥

जानि एक जन कृत आयोजन यों विशाल अति।
गंवई की लीला जो बहु नगरीन लजावति॥331॥

होत हीनन के आगे सों सिच्छा जारी।
आवत दूर-दूर सों सिच्छक गुनी सिंगारी॥332॥

ग्रामटिका बनिजात नगर वह उभय मास लौं।
भाँति भाँति जन भोर भार अरु चहल पहल सों॥333॥

बनत अयोध्या और जनकपुर शोभा भारी।
मोहित होत मनुज मन लखि लीला फुलवारी॥334॥

चलत सखिन को झुंड किये सिंगार मनोहर।
झनकारत नूपुर किंकिन सिय संग सुमुखि बर॥335॥

रंग भूमि की शोभा तो बरनी नहिं जाई.
होत बड़े ही ठाट बाट सों सबै लराई॥336॥

घूमत कहुँ काली कराल बदना मुँह बाये।
झुण्ड डाकिनी और साकिनी संग लगाये॥337॥

बिहँसत शिव इत उत उठाय सिर जटा बढ़ाए.
निश्चर बानर युद्ध लखत मन मोद मढ़ाए॥338॥

बड़े बड़े योधा दुहुँ ओर बने कपि निश्चर।
भिरत परस्पर लरत महा करि बाद परस्पर॥339॥

मनहुँ असम्भव अँगरेजी के राज लराई.
जानि लड़ाके लोग युद्ध झूठे में आई॥340॥

कसम निकारत मन की निज करतब दिखरावत।
भूले युद्ध नवाबी के पुनि याद करावत॥341॥

छूटत गोले और धमाके आतशबाजी.
चिघ्घारत डरपत मतंग बाजी गन भाजी॥342॥

दूर दूर सों दर्शक आवत निरखि सराहत।
डेरे साधू सन्त डारि रामायन गावत॥343॥

यदपि लखी बहु नगर रामलीला हम भारी।
लगी नहीं पै कोऊ हमैं बाके सम प्यारी॥344॥

को जानै याको ममत्व निज वस्तुहि कारन।
कै शिशुपन के देखे जे विनोद मन भावन॥345॥

कौवा नारी

“कौवा नारी” घाट नदी “मझुई” को सुन्दर।
सहित सुभग तरु बृन्दन के जो रह्यो मनोहर॥442॥

रह्यो हम सबन को जो भली विहार स्थल वर।
भयो अधिक छबि हीन थोरे ही दिवस अनन्तर॥443॥

वह सेमर सुविशाल लाल फूलन सों सोहत।
सह बट बिटप महान घनी छाहन मन मोहत॥444॥

भाँति भाँति द्विज वृन्द जहाँ कलरव करि बोलैं।
शाखन पैं जिनकी शाखामृग माल कलोलैं॥445॥

जिनकी छाया अति बसन्त बासर मैं प्यारी।
पास ग्राम के आय न्हाय सेवत नर नारी॥446॥

कोऊ सुखावत केश ओट तरु जाय अकेली।
निज मुख चन्द छिपाय अलक अबली अलबेली॥447॥

करति उपस्थित ग्रहन परब अवगाहन के हित।
कारन जो नव रसिक युवक जन दान देन चित॥448॥

बहु बालिका जहाँ जुरि गोटी गोट उछालति।
चकित मृगी-सी कोऊ नवेली देखत भालति॥449॥

संध्या समय जहाँ बहुधा हम सब जुरि जाते।
भाँति भाँति की केलि करत आनन्द मनाते॥450॥

छनत भंग कहु रंग-रंग के खेल होत कहुँ।
कोऊ अन्हात पै हाहा ठीठी होत रहत चहुँ॥451॥

होली के दिन जित अन्हात हम सब मिलि इक संग।
खेद होत तहँ को लखि आज रंग बहु बेढंग॥452॥

बालविनोद

कैसे प्यारे रहे दिवस वे बालक पन के.
जल्दी ही बीते जे हे अति मोहन मन के॥471॥

जाते जामैं सबै समय आनन्द मनावत।
नित निष्कपट विनोद खेल अरु कूद मचावत॥472॥

कष्ट एक पढ़िबे ही मैं जब मानत हो मन।
भय को भाव दिखात कछू निज सिक्षक ही सन॥473॥

बीति जात पढ़िबे को समय मिलत छुट्टी जब।
सीमा हरख उछाह की न रहि जात फेरि तब॥474॥

होत सबै बालक गन एकहि ठौर एकत्रित।
जस जहँ को अवसर चाह्यो कै जित सबको चित॥475॥

फिर तो बस आनन्द उदधि उमगात छनहिं महँ।
नव विनोद के नित्य नए ही ठाट जमत तहँ॥476॥

कबहुँ स्वजन शिशु त्यों कबहूँ सेवक अरु परजन।
के बालक मिलि होत यथोचित गोल संगठन॥477॥

मचत कबहुँ झावरि कबहुँ तुतु लूम लूल भल।
कबहुँ गेंद खेलत कूरी कूदत कबहूँ दल॥478॥

कबहुँ लच्छ बेधत अनेक भाँतिन सों सब मिलि।
कबहुँ करत जल केलि कूदि सरितन तालन हिलि॥479॥

बन्द राम लीला जब होति सबै बालक गन।
करत खेल आरम्भ सोई अतिसय मनरंजन॥480॥

राम लच्छिमन बनत कोउ हनुमान बाल गन।
जामवान अंगद सुग्रीव तथा कोउ रावन॥481॥

कुम्भकरन, घननाद, कोउ खर दूषन आदिक।
बनत, होत लीला सब यों क्रम सों न्यूनाधिक॥482॥

कभी और मैं होति, लराई मैं पै नाहीं।
होति, नित्य जामैं अनेक घायल ह्वै जाहीं॥483॥

पै न कहत कोउ निज घर इत की सत्य कहानी।
सदा खेल की दुर्घटना यों रहत छिपानी॥484॥

कटत धान अरु दायँ जात जब फरवारन महँ।
त्यों पयाल को गाँज लगत ऊँचे-ऊँचे तहँ॥485॥

तब तिन पैं चढ़ि कूदत हम सब ह्वै मन प्रमुदित।
औरहु खेल अनेक भाँति के होत नए नित॥486॥

जात हिंगाए खेत जबै हेंगन चढ़ि हम सब।
खात चोट गिरि पै हटको मानत कोउ को कब॥487॥

नई तिहाई के अँखुआ खेतन ज्यों ऊगत।
खात चना के साग सिबारन में शिशु घूमत॥488॥

मटरन की फलियाँ कोउ चुनत बूट कोउ चाभैं।
ऊमी भूनि चबात कोउ गुनि अतिसै लाभैं॥489॥

होरहा कोऊ जलाय खात कच्चा रस पीवत।
चुहत ईख कोऊ छीलि गंडेरी के रस चूसत॥490॥

चलत कुल्हार जबै कोल्हुन पर चढ़त धाय कोउ।
कातरि के तर गिरत बैल चौंकत उछरत दोउ॥491॥

चोट खाय कोउ रोवत दूजो चढ़त धाय कै
टिकुरी छटकत परत सीस पर तब ठठाय कै॥492॥

हँसत, अन्य, शिशु, सबै मजूरे सोर मचावत।
समाचार ये देवे हित इत उत वे धावत॥493॥

तऊ न होत बिराम विनोद तहाँ लगि तहँ पर।
जब लगि रच्छक प्यादा पहुँचत कै कोउ गुरु वर॥494॥

वसन्त विहार

ऋतु बसन्त मैं पत्र पुष्प के विविध खिलौने।
आभूषण त्यों रचत छरी अरु छत्र बिछौने॥
भाँति भाँति के फल चुनि सब मिलि खात प्रहर्षित।
नव कुसुमित पल्लवित बनन बागन बिहरत नित॥
कोऊ काले भौंरन ही हेरैं दौरावैं।
पकरैं भाँति भाँति तितली कोउ ल्याय सजावैं॥
ग्रीषम मैं जब चलैं बवण्डर भारी भारी।
दौरैं हम सब ताके संग बजावत तारी॥
पकरत फनगे मुकुलित मंदारन सों आनत।
ताकी कटि मैं कसि कसि डोरी बिधि सों बाँधत॥
ताहि उड़ावत कोउ मदार फल कोऊ ल्यावैं।
गेंद खेल खेलैं तिहिसों सब मिलि हरखावैं॥

मछरि मराव

नीच जाति के बालक खेतन मैं पहरा धरि।
मारत मछरी सहरी अरु सौरी गगरिन भरि॥
युव जन छीका और जाल लीने दल के दल।
मत्स मारिबे चलत नदी तट अति गति चंचल॥
पौला सब के पगन सीस घोघी कै छतरी।
लेकर लाठी चलैं मेंड़ बाटैं सब पतरी॥

समय परिवर्तन

सो सब सपने की सम्पति सम अब न लखाहीं।
कहूँ कछू हू वा साँचे सुख की परछाहीं॥
अब नहिं बरसागम मैं वैसी आँधी आवैं।
नहिं घन अठवारन लौं वैसी झरी लगावैं॥
नहिं वैसो जाड़ा बसन्त नहिं ग्रीसम हूँ तस।
आवत मनहिं लुभावत हरखावत आगे कस॥
नहिं वैसे लखि परत शस्य लहरत खेतन मैं।
नहिं बन मैं वह शोभा, नहिं विनोद जन मन मैं॥
अद्भुत उलट फेर दिखरायो समय बदलि रंग।
मनहुँ देसहू वृद्ध भयो निज बृद्ध पने संग॥
ताहू मैं यह गाँव की परत लखि अति दुर्गति।
तासु निवासी जन की सब भाँतिन सों अवनति॥
अपनेहीं घर रह्यो जासु उन्नति को कारन।
ताही के अनुरूप कियो छबि या मैं धारन॥

अवनति कारण 

रह्यो एक घर जब लौं सुख समृद्धि लखाई.
उन्नति ही सब रीति निरन्तर परी लखाई॥557॥

गयो एक सों तीन जबै घर अलग-अलग बन।
ठाट बाट नित बढ़त रह्यो परिपूरित धन जन॥558॥

छूटेव प्रथम निवास पितामह मम कोइत सों।
विवस अनेक प्रकार भार व्यापार अमित सों॥559॥

तऊ लगोई रह्यो सहज सम्बन्ध यहाँ को।
हम सब सों बहु बतसर लौं पूरब वत हो जो॥560॥

आधे दिवस बरस के बीतत याही थल पर।
नित्य नवल आनन्द सहित पन प्रथम अधिक तर॥561॥

क्रम सों छूटत, टूट्यो सब सम्बन्ध यहाँ को।
बीसन बरसन सों न लख्यों अब अहै कहाँ को॥562॥

बचे दोय घर जे तिनकी है अकथ कहानी।
समझत मन मुरझात, जात अधिकात गलानी॥563॥

इक घर नास्यो अमित व्यैयिता अरु ऐय्यासी.
दूजो कलह अदालत को उठ सत्यानासी॥564॥

भए एक के चार-चार घर अलग-अलग जब।
भरे परस्पर कलह द्वेष तब कुशल होत कब॥565॥

गए दीन बनि सबै मिटी या थल की शोभा।
जाहि एक दिन लखत कौन को नहिं मन लोभा॥566॥

तऊ स्वजन वे धन्य अजहुँ जे बसे अहैं इत।
साधारनहुँ दसा मैं सेवत जन्म भूमि नित॥567॥

पूरब उन्नत दशा न इत की दृग जिन देखी।
तासों होत न उन्हें खेद वसि इतै बिसेखी॥568॥

ग्राम नाम अरु चिह्न बनाए अजहुँ यहाँ पर।
करि स्वतन्त्र जीविका रहत सन्तुष्ट सदा घर॥569॥

पूजत भूले भटके, भूखे आगन्तुक जन।
मुष्टि अन्न दै तोषत अजहूँ वे भिक्षुक गन॥570॥

जहाँ आय जन भाँति-भाँति सत्कारहिं पावत।
श्री समृद्धि लखि जहँ की जन मन मोद बढ़ावत॥571॥

बड़े बड़े श्रीमान् महाजन आस पास के.
तालुकदार अनेक आश्रित रूप जुरे जे॥572॥

रहत जहाँ, तहँ आज की लखे दीन दसा यह।
होत जौन मन व्यथा कौन विधि जाय कही वह॥573॥

जाकी शोभा मनभावनि अति रही सदाहीं।
जाहि लखत मन तृप्त होत ही कबहूँ नाहीं॥574॥

आज तहाँ कोऊ विधि सों नहि रमत नेक मन।
हठ बस बसत जनात कल्प के सम बीतत छन॥575॥

आय गई दुर्दसा अवसि या रुचिर गाँव की।
दुखी निवासी सबै, छीन छबि भई ठाँव की॥576॥

जे तजिया कहँ गयेअनत वे अजहुँ सुखी सब।
ईस कृपा उन पर वैसी ही है जैसी तब॥577॥

कारन याको कहा समझ मैं कछू न आवत।
बहु विचार कीनेपर मन यह बात बतावत॥578॥

जब लौं अगले लोग रहे सद्धर्म्य परायन।
न्याय नीति रत साँचे करत प्रजा परिपालन॥579॥

तब लौं सुख समुद्र उमड्यो इत रहत निरन्तर।
उत्तरोत्तर उन्नति की लहरात ही लहर॥580॥

भए स्वार्थी जब सों पिछले जन अधिकारी।
भरे ईर्षा, द्वेष, अनीति निरत, अविचारी॥581॥

करन लगे जब सों अन्याय सहित धन अरजन।
भूमि धर्म्म, करि कलह, स्वजन परजन कहँ पेरन॥582॥

होन तबहिं सो लगी दीन यह दसा भयावनि।
देखे पूरब दसा लोग मन भय उपजावनि॥583॥

पै जब करत विचार दीठ दौराय दूर लौ।
अन्य ठौर प्रख्यात रहे जे इत वेऊ त्यों॥584॥

बिदित बंश के रहे बड़े जन जे बहुतेरे।
श्री समृद्धि अधिकार सहित या देशन हेरे॥585॥

पता चलत उनको नहिं गए विलाय कबैधों।
थोरे ही दिन बीच कुसुम खसि कुसुमाकर लौं॥586॥

राजा तालुकदार जिमीदार हू महाजन।
राजकुमार, सुभट औरो दूजे छत्रीगन॥587॥

कहाँ गए जे गर्वित रहे मानधन जन पैं।
गनत न औरहिं रहे माल अपने भुज बल तैं॥588॥

किते वंश सों हीन छीन अधिकार किते ह्वै।
किते दीन बनि गए भूमि कर औरन के दै॥589॥

जे नछत्र अवली सम अम्बर अवध विराजत।
रहे सरद रजनी साही मैं शुभ छबि छाजत॥590॥

ऊषा अँगरेजी मैं कहुँ-कहुँ कोउ जे दरसैं।
हीन प्रभा ह्वै अतिसय नहिं ते त्यों हिय हरसैं॥591॥

भयो इलाका कोउ को कोरट के अधीन सब।
बंक तसीलत कितौ, महाजन कितौ कोऊ अब॥592॥

कोऊ मनीजर सरकारी रखि काम चलावत।
पाय आप तनखाह कोऊ विधि समय बितावत॥593॥

कैदी के सम रहत सदा आधीन और के.
घूमत लुंडा बने शाह शतरंज तौर के॥594॥

कहुँ कहुँ कोउ जे सबही विधि सम्पन्न दिखाते।
नहिं तेऊ पूरब प्रभाव को लेस लखाते॥595॥

पिता पितामह जैसे उनके परत लखाई.
जैसी उनमें रही बड़ाई अरु मनुसाई॥596॥

सों अब सपनेहुं नहिं लखात कहुंधौ केहि कारण।
पलटी समय संग सब देश दशा साधारण॥597॥

जैसे ऋतु के बदलत लहत जगत औरै रंग।
बदलत दृश्य दिखात रंगथल ज्यों विचित्र ढंग॥598॥

त्यों रजनी अरु दिवस सरिस अद्भुत परिवर्तन।
चहुँ ओरन लखि जात न कछु कहि समुझि परत मन॥599॥

रह्यो जहाँ लगि बच्यो अवध को साही सासन।
रही बीरता झलक अजब दिखरात चहूँकन॥600॥

रहे मान, मर्यादा दर्प, तेज मनुसाई.
इतै आत्मा रच्छा चिन्ता बल करन लराई॥601॥

सहज साज सामान शान शौकत दिखरावन।
बने बड़े जन पास भेद सूचक साधारण॥602॥

शान्त राज अँगरेजी ज्यों-ज्यों फैलत आयो।
सबै पुरानो रंग बदलि औरै ढंग ल्यायो॥603॥

ऊँच नीच सम भए, बीर कादर दोऊ सम।
बड़े भए छोटे, छोटे बढ़ि लागे उभरन॥604॥

लगीं बकरियाँ बाघन सों मसखरी मचावन।
धक्का मारि मतंगहि लागीं खरी खिझावन॥605॥

रही बीरता ऐड़ इतै जो सहज सुहाई.
जेहि एकहिं गुन सों पायो यह देस बड़ाई॥606॥

ताके जात रही नहिं इत शोभा कछु बाकी।
वीर जाति बिन मान बनी मूरति करुना की॥607॥

जिन बीरन कहँ निज ढिग राखन हेतु अनेकन।
नित ललचाने रहत इतै के संभावित जन॥608॥

भाँति भाँति मनुहार सहित सत्कार रहत जे.
आज न पूँछत कोऊ तिन्हैं बिन काज फिरत वे॥609॥

रहे वीर योाा ते आज किसान गए बनि।
लेत उसास उदास सर्प जैसे खोयो मनि॥610॥

रहे चलावत जे तलवार तुपक ऐंड़ाने।
आजु चलावहिं ते कुदारि फरसा विलखाने॥611॥

जे छाँटत अरि मुण्ड समर मह पैठि सिंह सम।
कड़वी बालत बैठि खेत काटत बनि बे दम॥612॥

रहत मान अभिमान भरे सजि अस्त्र शस्त्र जे.
सस्य भार सिर धरे लाज सों दबे जात वे॥613॥

भेद न कछू लखात बिप्र छत्री सूदन महँ।
समहिं बृति, सम वेष समहिं, अधिकार सबन कहँ॥614॥

चारहुँ बरन खेतिहर बने खेत नहिं आँटत।
द्विज गन उपज्यो अन्न अधिक हरवाहन बाँटत॥615॥

करत खुसामद तिनकी पै न लहत हरवाहे।
मिलेहु न मन दै करत काज अब वे चित चाहे॥616॥

करत सबै कृषिकर्म न पै हल जोतत ये सब।
बिना जुताई नीकी अन्न भला उपजत कब॥617॥

सम लगान, ब्यय अधिक, आय कम सदा लहत जे.
दीन हीन ताही सों नित प्रति बने जात ये॥618॥

नहिं इनके तन रुधिर मास नहिं बसन समुज्ज्वल।
नहिं इनकी नारिन तन भूषण हाय आजकल॥619॥

सूखे वे मुख कमल, केश रुखे जिन केरे।
वेश मलीन, छीन तन, छबि हत जात न हेरे॥620॥

दुर्बल, रोगी, नंग धिड़ंगे जिनके शिशु गन।
दीन दृश्य दिखराय हृदय पिघलावत पाहन॥621॥

नहिं कोउ सिर टेढ़ी पाग लखात सुहाई.
बध्यों फांड? नहिं काह को अब परत लखाई॥622॥

नहिं मिरजई कसी धोती दिखरात कोऊ तन।
नहिं ऐड़ानी चाल गर्व गरुवानी चितवन॥623॥

नहिं परतले परी असि चलत कोऊ के खटकत।
कमर कटार तमंचे नहिं बरछी कर चमकत॥624॥

लाठी हूँ नहिं आज लखात लिए कोऊ कर।
बेंत सुटकुनी लै घूमत कोउ बिरले ही नर॥625॥

पढ़ि पढ़ि किते पाठशालन मैं विद्या थोड़ी।
परम परागत उद्यम सों सहसा मुख मोड़ी॥626॥

ढूँढत फिरत नौकरी जो नहिं कोउ विधि पावत।
खेती हू करि सकत न, दुख सों जनम वितावत॥627॥

चलै कुदारी तिहि कर किमि जोकलम चलायो।
उठै बसूला, घन तिन सों किमि जिन पढ़ि पायो॥628॥

अँगरेजी पढ़ि राजनीति यूरप आजादी।
सीखे, हिन्द में बसि, निरख्यो अपनी बरबादी॥629॥

करि भोजन मैं कमी किते अँगरेजी बानों।
बनवत पै नहिं बनत कैसहूँ ढंग विरानो॥630॥

आय स्वल्प, अति खरचीली वह चलन चलै किमि।
टिटुई ऊँटन को बोझा बहि सकत नहीं जिमि॥631॥

खोय धर्म्म धन किते बने नटुआ सम नाचत।
कर्ज लेन के हेतु द्वार द्वारहिं जे जाँचत॥632॥

उद्यम हीन सबै नर घूमत अति अकुलाने।
आधि व्याधि सों व्यथित, छुधित बिलपत बौराने॥633॥

मरता का नहिं करता की सच करत कहावत।
बहु प्रकार अकरम करता विचार न ल्यावत॥634॥

ईस दया तजि और भास जिनको कछु नाहीं।
सोई दया उपजावै अधिकारिन मन माहीं॥635॥

बेगि सुधारैं इनकी दशा सत्य उन्नति करि।
शुद्ध न्याय संग वेई सदा सद्धर्म्म हिये धरि॥636॥

होय देश यह पुनरपि सुख पूरति पूरब वत।
भारत के सब अन्य प्रदेसन पाहिं समुन्नत॥637॥

भजन

एक समय सूसा के मन्दिर नोकराज महाराज सिधारे।
शेक हेंड कै तुरत सूस जी इजी चेर पर लै बैठारे॥
आइस मिश्रित सोडा वाटर भरि टमलर दै चुरुट निकारे।
सुलगायो धँसि मैच बिहसि कहि इक प्याली टी पीअहु प्यारे॥
ब्रेक फास्ट पुनि टिफ़िन खाय अरु डिनर चाभि श्रम सकल बिसारे।
आज भये कृत कृत्य देखि प्रभु तुमहिं भाग निज गुनि बहु भारे॥

पद

नीको काव कहो मैं तोकों
अस मन आवत चार तमाचे इन गालन पै ठोंकों॥
कथा बार्ता दिल्लगी के प्रचारी।
सबै शास्त्र तत्वज्ञ औ चित्त हारी॥
अचारी अहैं याचते अन्न कन्नः।
स वै पातु यूष्मान पड़क्का प्रपन्ना॥
रामदीन सुतो जातः गौरी नक्षत्र सूचकः।
तस्य पुत्रो अभूत धीमान् ज्वालादत्तेति जारजः॥
देवप्रभाकर प्रखर पण्डित हैं महान।
त्यों पùनाभ हैं पाठक बुद्धिमान्॥
करते सदैव संकर्षण हैं विचार।
ह्वैं हैं परास्त ये दोऊ भट किस प्रकार॥
श्रीराम राम भज लो श्रीराम राम।
विश्वेश्वरार्चन करो उठि सुबह शाम॥
श्रीमन् महेन्द्र को करो झुकि कै प्रणाम।
शिवदत्त निर्मल करो तब और काम॥
माया की उलझन लगी संता पड़ा बेहाल।
सटा छटा पण्डित कै कतहूँ काट न लीन्यो गाल॥

राग इमन

मरम को जानत मनवां मन की॥टेक॥
चन्द अमन्द चरन दिलखलावत, चयलित
लोचन चारू चलावत, रहतन बुधि बावरी बनावत
सुध न धाम का मनकी।

चित चोरे पर नहीं निहारै।
जानि जदपि तौ हूँ दृढ़ धारै,
मन पीपी तेहि नाहिं विसारै,
जपत जाप ना मनकी।
वह इत भूले हू नहिं आवै
औरन संग रहि नहिं छवि भावै
कोऊ जाय न हाय छुड़ावै
संगति इनकें मनकी।
श्री बदरी नारायन गायो,
यह अविवेक रूप संग छायो,
विधि छल-छल की चाल चलाए
वामन की बामन की।

ठुमरी

भरथ दास दिलदार यार भी हैं दीन्हेंन धोखा बार बार।
और न सो तुम सटत रोज हम कासी नाथ पर नहीं प्यार।

खिमटा-गौरी राग

खलीला जी छांड़ दो तिरक्कुनी मोरी।
नहिं हम माधो साहु न पन्ना ना हम भारथ दास।
रामदास ना दुरगा हम बस जाओ न आओ पास।
बकरी-सी दाढ़ी और सूरत तापैं रहे इठलाय।
हमसे सीधे से रहिए नहिं जै हौ तमाचे खाय॥

भैरव राग

कहाँ गई घर वाली तेरी, कहाँ गई घर वाली,
मेरे सुख की देने वाली।
जब लगि रही निरादर कीनो नित उठि दीन्यो गाली।
निकल गई वह फतहूपुरतुम रोवो जइस डफाली।
डोलत भरतदास के पीछे लीन्हे सूरत काली।
तेल हाथ लै घूमत खोजत कहूँ अखाड़ा खाली॥

मुलायम कजली

बान्हे गले असाठा पाठा घूमः हमारी गलियाँ रामा।
अखड़ लोगे देखैं उलट तमासा रे हरी।
गोरी चिट्टी सूरत कैसी बांह मुलायम मूरत रामा।
हरे देख लख्ल्यः नितम्ब जे सब उर बतासा रे हरी।
हमैं छोड़ि कै जालिउ काहे कासी रे हरी।
होकर खासी दासी करना तौ भी यह बदमासी रामा।
पहिले भी साया कै करवाना हाँसी रे हरी॥
हम पर आप उदासी, छाई तू वाटिउ भगवासी रामा।
करि औरे सारन से लासा लासी रे हरी॥
लाज सरम सब नासी, घूमी तोहरे पीछे संगें कासी रामा।
हरे होइ गइली अब तो जानी संन्यासी रे हरी॥
छोड़ः आस अकासी भोजन मिली सदा और बासी रामा।
आखिर होबिउ जान खानगी खासी रे हरी॥
हम मिरजापुर बासी पहिराईला बुरी निकासी रामा।
खिउयाईला रोजै माल मवासी रे हरी।
बामन बाग विलासी गावै अलगी अलग लवासी भा।
हरि दवसल जालिउ केहुर करत कबासी रे हरी।

चिरंजीवी वासुदेव के प्रथम पुत्र जन्मोत्सव दिन लिखित-सोहर

हे सब सखियाँ सहेली रे बेगि चलि आवहु रे।
(मोरी सखियाँ)
मोरे घरे आनन्द बधैया रे सबै मिलि गावहु रे॥टेक॥
आजु भए विधि दिहिन होरिला जनम भये रे।
भरि भरि कोछवाँ लै आओ, मोहरिया लुटावहु रे।
सब मिलि सैयाँ के लिआवो रे, बेगि धरि ल्यावहु रे।
जाचक करहिं निहाल, कसकिया मिटावहु रे।
वेगि बोलाओ ना ढाडीनियाँ रे, नचाओ ना अगनवाँ रे।
वेगि बधैया कै बाजनवां रे, दुवरवां बजावहु रे।
गौरी गनेस के मनाओ बलकवा मोर जी अहिरे।
सब मिल देहु असीस आनन्द बढ़ावहु रे॥

पुरोहित पत्र 

 (जो श्री जगन्नाथ धाम में लिखा था)

मिरज़ापुर गिरजा निकट, सुरसरि सरिता तीर।
तहँ कटरा बृजराज मैं इक आनन्द कुटीर॥

सुचि सरजूपारीण कुल उपाध्याय द्विजराज।
श्री शीतल परसाद चौधरी सहित सकल सुख साज॥

निवसत सम्मानित तनय तासु गुरुचरण लाल।
मूर्ति धर्म्म रिषि कल्प जस फैल्यो जासु विशाल॥

बदरीनारायन तनय तासु प्रेमघन नाम।
लिख्यो पुरोहित पत्र यह देय समय पर काम॥

आयो दर्शन काज हित जगन्नाथ के धाम।
श्री चैतन्य पुजारि को मानन्यो पंडा अत्र॥

तिहि प्रमाण के हेतु यह लिख्यो पुरोहित पत्र।

मुरली राजत अधर पर

मुरली राजत अधर पर उर विलसत बनमाल।
आय सोई मो मन बसौ सदा रंगीले लाल॥
सीस मुकुट कर मैं लकुट कटि तट पट है पीत।
जमुना तीर तमाल तर गो लै गावत गीत॥
वृज सुकुमार कुमारिका कालिन्दी के तीर।
गल बाँही दीन्हे दोऊ हँसत हरत भवपीर॥

लाल लली तन हेरि कै 

लाल लली तन हेरि कै महा प्रमोदित होत।
करि चकोर चख लखत मुख मंगल चंद उदोत॥
मंगल चन्द उदोत राहु सम केश रहे सजि।
मृग सम जुग द्रिग देखि दुःख काको न जात भजि॥
बद्री नारायन प्रमुदित ह्वै वारयो तन मन।
भाज्यो मन्मथ लाजि विलोकत लाल लली तन॥

मंगल मय हरि सिर ऊपर

मंगलमय हरि सिर ऊपर शुभ मुकुट विराजत।
मंगल प्यारी मुख ऊपर बिन्दुली छबि छाजत॥
इत मंगल मुरलिका सहित धुनि सुन्दर बाजत।
उत प्यारी पग नूपुर धुनि सुनि सारस लाजत॥
दोऊ निज द्रिग सरन सों हँसि हँसि दोउन मारहीं।
बद्रीनारायन जू नवल छवि लखि तन मन धन वारहीं॥

कभौ निकुंज सून मैं

कभौ निकुंज सून मैं प्रसून लाय लाय कै।
विशाल माल बाल को पिन्हावते बनाय कै॥
भले बनी ठनी प्रिया सुश्याम संग राजहीं।
प्रभा निहारि हारि हारि काम बाम लाजहीं॥

इत सोहत मोरन की कँलगी

इत सोहत मोरन की कँलगी कटि के तट पीत पटा फहरैं।
उत ओढ़नी बैजनी है सिर पै मुख पै नथ के मुक्ता थहरैं॥
बनकुंज मैं बद्रीनरायन जू कर मेलि दोऊ करतैं टहरैं।
निति ऐसे सनेह सों राधिका श्याम हमारे हिये मैं सदा बिहरैं॥

कालिन्दी के तीर

कालिन्दी के तीर, यहि विधि लीला नवल नव।
राधा श्री बलबीर, वृन्दावन मैं करत निति॥
मंगल राधा श्याम, मंगल मैं वृन्दाविपिन।
मंगल कुंज मुदाम, मंगल बद्रीनाथ द्विज॥
मंजुल मंगल मूल, जुगल सुमंगल पाठ यह।
पढ़त रहत नहिं सूल, जुगल जलज पद अलि बनत॥

वर्षा बहार

जब बर्षा आरम्भ होय अति धूम धाम सों ।
बरषै सिगरी निसि जल कर आरम्भ शाम सों ।।

उठैं भोर अन्दोर सोर दादुर सुनि हम सब ।
बदली जग की दसा लखैं आवैं बाहर जब ।।

किए हहास बहत जल चारहुँ दिसि सों आवै ।
गिरि खन्दक मैं भरि तिहि को तब नदी सिधावै ।।

भरैं लबालब जब खन्दक अतिशय मन मोहैं ।
बँसवारी के थान बोरि नव छबि लहि सोहैं ।।

धानी सारी पर जनु पट्टा सेत लगायो ।
रव दादुर पायल ध्वनि जाके मध्य सुनायो ।।

श्याम घटा ओढ़नी मनहुँ ऊपर दरसाती ।
ओढ़े बरसा बधू चंचला मिसि मुसकाती ।।

भाँति-भाँति जल जन्तु फिरत अरु तैरत भीतर ।
भाँति-भाँति कृमि कीट पतंगे दौरत जल पर ।।

मकरी और छबुन्दे, तेलिन, झींगुर, झिल्ली ।
चींटे, माटे, रीवें, भौंरे, फनगे, चिल्ली ।।

जनु हिमसागर पर दौरत घोड़े अरु मेढ़े ।
सर्राटे सों सीधे अरु कोऊ ह्वै टेढ़े ।।

बिल में जल के गए ऊबि उठि निकरे व्याकुल ।
अहि, वृश्चिक, मूषक, साही, विषखोपरे बाहुल ।।

लाठी लै-लै तिनहिं लोग दौरावत मारत ।
किते निसाने बाजी करत गुलेलहि धारत ।।

कोउ सुधारत छप्पर औ खपरैलहिं भीजत ।
भरो भवन जल जानि किते जन जलहि उलीचत ।।

लै कितने फरसा कुदाल छिति खोदि बहावैं ।
बाढ़ेव जल आँगन सों, नाली को चौड़ावैं ।।

लै किसान हल जोतहिं खेतहिं, लेव लग्यो गुनि ।
बोवत कोउ हिंगावत बाँधत मेड़ कोउ पुनि ।।

अधर

मन्द महा मधु माधुरी कन्द,
नवात न वात की आवै विचार मैं।
ईख न लोची नहीं सरदा,
नहिं जामुन सेब कै तूत हजार मैं॥
चूसि लह्यो रसना घन प्रेम,
जो वा मधुराधर के सुधासार मैं।
सो रस के रस को नहिं लेसहु,
पाइए आम अँगूर अनार मैं॥

कूचये दिलदार से बादे सवा आने लगी

कूचये दिलदार से बादे सवा आने लगी।
जुल्फ मुश्की रुख प बल खा-खा के लहराने लगी॥टेक॥
देख कर दर पर खड़ा मुझ नातवां को वह परी।
खींच कर तेगे़ अदा बतर्ह झुँझलाने लगी॥
जुल्फ़ मुश्की मार की बढ़-बढ़ के अब तो पैर तक।
नातवां नाकाम उश्शाकों को उलझाने लगी॥
देखकर कातिल को आते हाथ में खंजर लिए.
खौफ से मरकत मेरी बेतर्ह थर्राने लगी॥
हो नहीं सकती गुज़र मेहफिल में अब तो आपके.
बदजुबानी गालियाँ साहेब ये सुनवाने लगी॥
देख कर चश्मे ग़िजाला यार की बेताब हो।
बीच गुलशन के कली नरगिस की मुरझाने लगी॥
जा रहा है सैर गुलशन के लिए वह सर्वकद।
शोखिये पाजे़ब की याँ तक सदा आने लगी॥
चश्म गिरियाँ की झड़ी मय की लगाए देख कर।
हँस के बिजली वह परी पैकरभी कड़काने लगी॥1॥

अजब दिलरुबा नन्द फ़रज़न्द जू है 

अजब दिलरुबा नन्द फ़रज़न्द जू है।
इक आलम को जिसकी पड़ी जुस्तजू है॥
तेरी ख़ाके पा से रहे मुझको उलफ़त,
यही दिल की हसरत यही आरजू है।
सिफ़त का तेरी किस तरह से बयाँ हो,
कब इसमें किसे ताक़ते गुफ्तगू है॥
तुझे भूल कर गै़र को जिसने चाहा,
उसीकी मिली ख़ाक में आबरू है॥
जहाँ की हवा वा हवस में जो घूमा,
उड़ाता फिरा ख़ाक वह कू ब कू है॥
ज़मीनो फ़लक काह से कोह में भी,
जो देखा तो हर जाय मौजूद तू है॥
जिधर गौर करता हूँ होता हूँ हैरां,
अजब तेरी सनअत अयाँ चार सू है॥
कहाँ रुतबये युसूफ़ो हूरो ग़िलमां,
शहनशाह खूबां फ़कत एक तू है॥
गिलो आब से आब गुल कब ये पाते,
ये तेरी ही रंगत ये तेरी ही बू है।
महो मेहर अनवर सितरों में प्यारी,
तुम्हारी ही जल्वागिरी चार सू है।
तुही जल्वागर दैरदिल में है सब के.
अवस सब यह रोज़ा नमाज़ो वज्र है॥
बरसता रहे अब्र रहमत तुम्हारा।
यही “अब्र” की एक ही आरजू है॥
किया इश्क जुल्फ़े दुतां चाहता है।
बला क्यांे यह सर पै लिया चाहता है॥
हुआ दिल यह तुझ पर फ़िदा चाहता है॥
सरासर ख़ता बस किया चाहता है॥
कहाँ तू उसे बेवफ़ा चाहता है।
अरे दिल तू यह क्या किया चाहता है॥
नक़ाब उसके रुख से हटा चाहता है।
खि़ज़िल माह कामिल हुआ चाहता है॥
व फ़ज़ले ख़ुदा अब मेरे दौर दिल में।
किया घर व बुत महेलक़ा चाहता है।
हँसा गुल जो शाखे़े शजर में तो समझो।
कि अब यह ज़मीं पर गिरा चाहता है॥
बिछा गाल के तिल पै है दाम गेसू।
मेरा तायरे दिल फँसा चाहता है॥
यह शाने खु़दा है कि वह बुत भी बोला।
मेरा बख़्ते खु़फ़्ता जगा चाहता है॥
मेरे लग के सीने से वह हँस के बोला।
बता तू क्या इसके सिवा चाहता है॥
सुना रोज़ करते थे जिसकी कहानी।
वही आज मुझसे मिला चाहता है॥
ज़रा इक नज़र देख दे तू इधर भी।
यही दिल किया इल्तिजा चाहता है॥
बरसता रहे “अब्र” बाराने रहमत।
यही अब्र देने दुआ चाहता है॥10॥

क्या सोहै सीस पर तेरे दुपट्टा धानी 

क्या सोहै सीस पर तेरे दुपट्टा धानी,
मन मेरा मस्त हो गया दिल जानी॥
मुख पर क्या सोहैं छुटी लटैं लटकाली,
आशिको के दिल डसने को नागिन पाली,
चमकीली चौंकाली आलशी घुँघराली,
हैं कहीं डंक बिच्छू से जहराली,
देती हैं पेंच ये आपस में उल्झानी,
मन मेरा मस्त हो…दिलजानी॥14॥

दोनों यह चश्म नरगिसी तेरे मतवारे,
मृग मीन खंज अरविंद लजाने हारे,
क्या सजे संग सुरमे के ये रत्नारे,
दिल दीवाना करते हैंनैन तुमारे,
चुभ जाती चितवन यह प्यारी अलसानी,
मन मेरा मस्त हो…दिलजानी॥

क्या कहूँ चाँदसे मुखड़े की छबि तेरे,
पाता हूँ नहीं मिसाल जगत में हेरे,
गुल दोपहरी लखि मधुर अधर मुरझेरे,
दाने अनार दाँतों को देख गिरे रे,
खुश अंग-अंग दुति दामिन देखि लजानी,
मन मेरा मस्त हो…दिलजानी॥15॥

शोभा सब संचि विरंचि मनोहरताई,
साँचे में ढाल ये कारीगरी, दिखाई,
एक अचरज की पुतली-सी तुम्हेंबनाई
चातुरी आपनी लाज लपेट छिपाई,
निरखत बद्री नारायन से सैलानी,
मन मेरा मस्त हो…दिलजानी॥

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