बेहज़ाद लखनवी की रचनाएँ

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए
मंज़िल के लिए दो-गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए

ऐ दिल की ख़लिश चल यूँ ही सही चलता तो हूँ उनकी महफ़िल में
उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग मे महफ़िल आ जाए

ऐ रहबर-ए-कामिल चल देखो तय्यार तो हूँ पर याद रहे
उस वक़्त मुझे भटका देना जब सामने मंज़िल आ जाए

हाँ याद मुझे तुम कर लेना आवाज़ मुझे तुम दे लेना
उस राह-ए-मोहब्बत में कोई दर-पेश जो मुश्किल आ जाए

अब क्यूँ ढूँडूँ वो चश्म-ए-करम होने दे सितम बाला-ए-सितम
मैं चाहता हूँ ऐ जज़्बा-ए-ग़म मुश्किल पस-ए-मुश्किल आ जाए

क्या ये भी मैं बतला दूँ तू कौन है मैं क्या हूँ

क्या ये भी मैं बतला दूँ तू कौन है मैं क्या हूँ
तू जान-ए-तमाशा है मैं महव-ए-तमाशा हूँ

तू बाइस-ए-हस्ती है मैं हासिल-ए-हस्ती हूँ
तू ख़ालिक़-उल्फ़त है और मैं तिरा बंदा हूँ

जब तक न मिला था तू ऐ फ़ित्ना-ए-दो-आलम
जब दर्द से ग़ाफ़िल था अब दर्द की दुनिया हूूँ

कुछ फ़र्क़ नहीं तुझ में और मुझ में कोई लेकिन
तू और किसी का है बेदर्द मैं तेरा हूँ

मुद्दत हुई खो बैठा सरमाया-ए-तस्कीं मैं
अब तो तिरी फ़ुर्क़त में दिन रात तड़पता हूँ

अरमान नहीं कोई गो दिल में मिरे लेकिन
अल्लाह री मजबूरी मजबूर-ए-तमन्ना हूँ

‘बहज़ाद’-ए-हज़ीं मुझ पर इक कैफ़ सा तारी है
अब ये मिरा आलम है हँसता हूँ न रोता हूँ

लब पे है फ़रियाद अश्कों की रवानी हो चुकी

लब पे है फ़रियाद अश्कों की रवानी हो चुकी
इक कहानी छिड़ रही है इक कहानी हो चुकी

मेहर के पर्दे में पूरी दिल-सितानी हो चुकी
बंदा-परवर रहम कीजिए मेहरबानी हो चुकी

मेरा दिल ताका गया और ओ जफ़ा के वास्ते
जब कि पूरे रंग पर उन की जवानी हो चुकी

जाइए भी क्यूँ मुझे झूठी तशफ़्फ़ी दीजिए
आप से और मेरे दिल की तर्जुमानी हो चुकी

आ गया ऐ सुनने वाले अब मुझे पास-ए-वफ़ा
अब बयाँ रूदाद-ए-दिल मेरी ज़बानी हो चुकी

आख़िरी आँसू मिरी चश्म-ए-अलम से गिर चुका
सुनने वालो ख़त्म अब मेरी कहानी हो चुकी

हम भी तंग आ ही गए आख़िर नियाज़-ओ-नाज़ से
हाँ ख़ुशा क़िस्मत कि उन की मेहरबानी हो चुकी

सुनने वाले सूरत-ए-तस्वीर बैठे हैं तमाम
हज़रत-ए-‘बहज़ाद’ बस जादू-बयानी हो चुकी

तुम्हारे हुस्न की तस्ख़ीर आम होती है

तुम्हारे हुस्न की तस्ख़ीर आम होती है
कि इक निगाह में दुनिया तमाम होती है

जहाँ पे जल्वा-ए-जानाँ है अंजुमन-आरा
वहाँ निगाह की मंज़िल तमाम होती है

वही ख़लिश वही सोज़िश वही तपिश वही दर्द
हमें सहर भी ब-अंदाज़-ए-शाम होती है

निगाह-ए-हुस्न मुबारक तुझे दर-अंदाज़ी
कभी कभी मिरी महफ़िल भी आम होती है

ज़हे नसीब में क़ुर्बान अपनी क़िस्मत के
तिरे लिए मिरी दुनिया तमाम होती है

नमाज़-ए-इश्क़ का है इंहिसार अश्कों तक
ये बे-नियाज़-ए-सुजूद-ओ-क़याम होती है

तिरी निगाह के क़ुर्बान तिरी निगाह की टीस
ये ना-तमाम ही रह कर तमाम होती है

वहाँ पे चल मुझे ले कर मिरे समंद-ए-ख़याल
जहाँ निगाह की मस्ती हराम होती है

किसी के ज़िक्र से ‘बहज़ाद’ मुब्तिला अब तक
जिगर में इक ख़लिश-ए-ना-तमाम होती है

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे
वर्ना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे

ऐ देखने वालो मुझे हँस हँस के न देखो
तुम को भी मोहब्बत कहीं मुझ-सा न बना दे

मैं ढूँढ़ रहा हूँ मिरी वो शम्अ कहाँ है
जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे

आख़िर कोई सूरत भी तो हो ख़ाना-ए-दिल की
काबा नहीं बनता है तो बुत-ख़ाना बना दे

‘बहज़ाद’ हर इक गाम पे इक सज्दा-ए-मस्ती
हर ज़र्रे को संग-ए-दर-ए-जानाना बना दे

 

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