भामोहन अवधिया ‘स्वर्ण सहोदर’ की रचनाएँ

हम वीर बने 

हम वीर बनें, सरदार बनें,
हम साहस के अवतार बनें।
तैरें निज उठी उमंगो पर,
सागर की तीव्र तरंगों पर।
अपने दम पर, अपने बल पर,
चाहें तो चढ़ें हिमालय पर।
हम खुद अपने आधार बनें,
उन्नति के जिम्मेदार बनें।
कठिनाई से रण ठना रहे,
आफत का कुहरा घना रहे।
पर सदा हौसला बना रहे,
सीना आगे को तना रहे।
हम प्रण के पालनहार बनें,
अपनी धुन के रखवार बनें।
निज जन्म भूमि का क्लेश हरें,
जैसे हो, सुखी स्वदेश करें।
जननी पर नित बलिहार रहें,
मर मिटने को तैयार रहें।
हम माँ के राजकुमार बनें,
जननी के उर के हार बनें।

बंदूक चली

बंदूक चली, बंदूक चली!
चल गई सनासन, सन-सन-सन,
चल गई दनादन, दन-दन-दन।
जाने किस पर, किस जगह चली,
बंदूक चली, बंदूक चली!
धड़-धड़ धड़ाम आई आवाज,
मानो कि भरभरा गिरी गाज
गूँजा स्वर घर-घर, गली-गली
बंदूक चली, बंदूक चली!
लड़की भड़की, लड़का भड़का,
दादी का दिल धड़-धड़ धड़का।
सहमी बेचारी रामकली,
बंदूक चली, बंदूक चली!

-साभार: बाल साहित्य समीक्षा, 1980 स्वर्ण सहोदर विशेषांक, सं. ‘राष्ट्रबंधु’

लड़ीं बिलैया

शंकर के आँगन में आकर,
खों-खों करके कूद-फाँद कर।
आपस में दो लड़ीं बिलैयाँ,
बंधी थान पर भड़की गैया
भौंकी कुतिया, चौंकी बिटिया,
औंध गए हैं लोटे-लुटिया!
चूँ-चूँ करती चली छछुंदर,
चूहे छिपे बिलों के अंदर!
हिलीं कुंडियाँ डिगे किवाड़े,
गई चिंदिया उड़ पिछवाड़े।

नटखट हम हाँ नटखट हम

नटखट हम हाँ, नटखट हम, करने निकले खटपट हम।
आ गए लड़के पा गए हम, बंदर देख लुभा गए हम।
बंदर को बिचकाएँ हम, बंदर दौड़ा भागे हम।
बच गए लड़के, बच गए हम!

बर्र का छत्ता पा गए हम, बांस उठाकर आ गए हम।
छत्ते लगे गिराने हम, ऊधम लगे मचाने हम।
छत्ता छूटा बर्र उड़े, आ लड़कों पर टूट पड़े।
झटपट हटकर छिप गए हम, बच गए लड़के बच गए हम!

बिच्छू एक पकड़ लाए, उसे छिपाकर ले आए।
सबक जाँचने भिड़े गुरु, हमने नाटक किया शुरू।
खोला बिच्छू चुपके से, बैठे पीछे दुबके से।
बच गए गुरु जी खिसके हम, पिट गए लड़के बच गए हम!

बुढ़िया निकली पहुँचे हम, लगे चिढ़ाने जम जम जम।
बुढ़िया खीजे डरे न हम, ऊधम करना करें न कम।
बुढ़िया आई नाकों दम, लगी पीटने धम-धम-धम।
जान बचाकर भाग गए हम, पिट गए लड़के, बच गए हम।

तन कर बैठो 

जब बैठो, तब तनकर बैठो,
कभी न कुबड़े बनकर बैठो।
काम करो या ठाले बैठो
मगर न ढीले-ढाले बैठो।
सारा बदन सँभाले बैठो,
कूबड़ नहीं निकाले बैठो।
जब बैठो तब तनकर बैठो,
कभी न ढीले बनकर बैठो।
सीधे बैठो सादे बैठो,
मगर न आलस लादे बैठो।
गर्दन, रीढ़ तनाए बैठो,
कभी न कमर नवाए बैठो।
जब बैठो तब तनकर बैठो,
कभी न बूढ़े बनकर बैठो।

गेंदा के फूल

फूल खिले हैं गेंदा के,
गेंदा के हाँ गेंदा के!

बड़े फबीले, बड़े छबीले,
नरम नरम, सुंदर गुच्छीले।
पीले-पीले, लाल-लाल,
फूल खिले हैं डाल-डाल।

कई तितलियाँ उड़ती हैं,
इधर-उधर को मुड़ती हैं।
पंख हिलाती, पंख मिलाती,
सब की सब फुर्ती दिखलाती।

फूलों से ये बार-बार,
हिलमिल करती लाड प्यार।
भौंरे आते कई-कई
लिये उमंगें नई-नई!

गुनगुन गाते, खुशी मनाते,
फूलों से फूलों पर जाते।
रस चखते हैं चाह, चाह,
बड़ा मज़ा है वाह-वाह!

-साभार: बालसखा, अक्तूबर 1940, पृ. 424

चिड़ियाँ बोलें

चिड़ियाँ चह-चूँ चह-चूँ बोलें,
घुलमिल करती खूब किलोलें!

जागें तड़के छोड़ बसेरा,
फेरा देवें हुआ सवेरा।
हँस-हँस चहक-चहक मुँह खोलें,
चिड़ियाँ चह-चूँ, चह-चूँ बोलें!

फुर फुर-फुर फुर उड़ें चहकती,
घर-घर, छत-छत फिरें लहकती।
रुनझुन, फुदक फुदक कर डोलें,
चिड़ियाँ चह-चूँ, चह-चूँ बोलें!

हिल-मिल, घूम-घूम सब आवें,
खिल-खिल, झूम-झूम सब गावें।
बोलों में मिसरी-सी घोलें,
चिड़ियाँ चह-चूँ, चह-चूँ बोलें!

छेड़ें कभी बैठ कर तानें,
भर लें फर-फर कभी उड़ानें!
अपना जोर हवा में तोलें,
चिड़ियाँ चह-चूँ, चह-चूँ बोलें!

-साभार: वीणा के गीत, सं. राष्ट्रबंधु, 1967

बादल आए 

सब आसमान में हैं छाए,
बादल आए, बादल आए!

घर-घर, घर-घर, घर-घहर-घहर
सब तेज हवा में लहर-लहर,
सब हहर-हहर, सब भहर-भहर
कुछ झट-झट-झट, कुछ ठहर-ठहर,
सब के सब सिर पर मँडराए
बादल आए, बादल आए!

आपस में सब के सब लड़-लड़
करते भड़ भड़, होते धड़-धड़
पानी बरसाते पड़ पड़-पड़
बूँदें टपकाते झड़ झड़-झड़
धाए झल्लाए, खिसयाए
ये मतवाले बादल आए!

करते घम-घम, करते घम-घम
बिजली चमकाते चम-चम-चम,
हल्ला गुहार करते कड़-कड़
कुछ गाज़ गिराते तड़ तड़ तड़,
करतूत अनोखी अपनाए
ये मनमौजी बादल आए!

नहलाते सबको हर-हर-हर
करते जलती धरती को तर,
उफनाते ताल, नदी, नाले
न्यारे-न्यारे, काले-काले
सातों समुद्र भर भर लाए
ये उमड़-घुमड़, बादल आए!

जानवरों का मेला 

शोर मचा अलबेला है,
जानवरों का मेला है!

वन का बाघ दहाड़ता,
हाथी खड़ा चिंघाड़ता।
गधा जोर से रेंकता,
कूकूर ‘भों-भों’ भौंकता।
बड़े मजे की बेला है,
जानवरों का मेला है।

गैा बँधी रँभाती है,
बकरी तो मिमियाती है।
घोड़ा हिनहिनाए कैसा,
डोंय-डोंय डुंडके भैंसा।
बढ़िया रेलम-रेला है,
जानवरों का मेला है!

कुहरा छाया

कुहरा छाया, कुहरा छाया,
घिर आया घना अँधेरा है!
कुहरे का घर-घर डेरा है,
घर, बस्ती, पेड़, पहाड़ नदी-
सबको कुहरे ने घेरा है!
है अजब धुआँ-सा मँडराया,
कुहरा छाया, कुहरा छाया।
हम नजर बहुत दौड़ाते हैं,
लख नहीं दूर तक पाते हैं।
कुहरे के सागर में देखो,
सब-के-सब डूब नहाते हैं।
क्या दृश्य अनोखा दिखलाया,
कुहरा छाया, कुहरा छाया!

धुँधला, धुँधला सब ओर घिरा,
इकदम कुहरा दिख रहा निरा।
मानो, कुहरे का एकछत्र,
भूमंडल पर हो राज फिरा!
पग-पग पर है इसकी माया,
कुहरा छाया, कुहरा छाया!

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