Poetry

भारतभूषण पंत की रचनाएँ

कब तलक चलना है यूँ ही हम-सफ़र से बात कर

कब तलक चलना है यूँ ही हम-सफ़र से बात कर
मंज़िलें कब तक मिलेंगी रहगुज़र से बात कर।

तुझ को मिल जाएगा तेरे सब सवालों का जवाब
कश्तियाँ क्यूँ डूब जाती हैं भँवर से बात कर।

कब तलक छुपता रहेगा यूँ ही अपने-आप से
आइने के रू-ब-रू आ अपने डर से बात कर।

बढ़ चुकी हैं अब तिरी फ़िक्र-ओ-नज़र की वुसअतें
जुगनुओं को छोड़ अब शम्स ओ क़मर से बात कर।

इस तरह तो और भी तेरी घुटन बढ़ जाएगी
हम-नवा कोई नहीं तो बाम-ओ-दर से बात कर।

दर्द क्या है ये समझना है तो अपने दिल से पूछ
आँसुओं की बात है तो चश्म-ए-तर से बात कर।

हर सफ़र मंज़र से पस-ए-मंज़र तलक तो कर लिया
देखना क्या चाहती है अब नज़र से बात कर।

धूप कैसे साए में तब्दील होती है यहाँ
इस हुनर को सीखना है तो शजर से बात कर।

ज़ख़्म पोशीदा रहा तो दर्द बढ़ता जाएगा
बे-तकल्लुफ़ हो के अपने चारा-गर से बात कर।

एक नए साँचे में ढल जाता हूँ मैं

एक नए साँचे में ढल जाता हूँ मैं
क़तरा क़तरा रोज़ पिघल जाता हूँ मैं।

जब से वो इक सूरज मुझ में डूबा है
ख़ुद को भी छू लूँ तो जल जाता हूँ मैं।

आईना भी हैरानी में डूबा है
इतना कैसे रोज़ बदल जाता हूँ मैं।

मीठी मीठी बातों में मालूम नहीं
जाने कितना ज़हर उगल जाता हूँ मैं।

अब ठोकर खाने का मुझ को ख़ौफ़ नहीं
गिरता हूँ तो और सँभल जाता हूँ मैं।

अक्सर अब अपना पीछा करते करते
ख़ुद से कितनी दूर निकल जाता हूँ मैं।

इश्क़ का रोग तो विर्से में मिला था मुझको

इश्क़ का रोग तो विर्से में मिला था मुझको
दिल धड़कता हुआ सीने में मिला था मुझ को।

हाँ ये काफ़िर उसी हुजरे में मिला था मुझको
एक मोमिन जहाँ सज्दे में मिला था मुझको।

उस को भी मेरी तरह अपनी वफ़ा पर था यक़ीं
वो भी शायद इसी धोके में मिला था मुझको।

उस ने ही बज़्म के आदाब सिखाए थे मुझे
वो जो इक शख़्स अकेले में मिला था मुझको।

मंज़िल-ए-होश पे इक मैं ही नहीं था तन्हा
याँ तो हर शख़्स ही नश्शे में मिला था मुझको।

ये भी इक ऐब था मेरी ही नज़र का शायद
रोज़ कुछ फ़र्क़ सा चेहरे में मिला था मुझको।

ऐसे हालात में क्या उस से गिला करता मैं
रात सूरज भी अँधेरे में मिला था मुझको।

मैं अगर डूब न जाता तो वहाँ क्या करता
इक समुंदर था जो क़तरे में मिला था मुझको।

रूह की प्यास बुझाना कोई आसान न था
साफ़ पानी बड़े गहरे में मिला था मुझको।

सच तो ये है कि यहाँ कोई भी मंज़िल ही न थी
वो भी रस्ता था जो रस्ते में मिला था मुझको।

इक गर्दिश-ए-मुदाम भी तक़दीर में रही

इक गर्दिश-ए-मुदाम भी तक़दीर में रही
गर्द-ए-सफ़र भी पाँव की ज़ंजीर में रही।

ख़्वाबों के इंतिख़ाब में क्या चूक हो गई
हर बार इक शिकस्तगी ताबीर में रही।

रंगों का ताल-मेल बहुत ख़ूब था मगर
फिर भी कोई कमी तिरी तस्वीर में रही।

चारागरों से दर्द का दरमाँ न हो सका
अल्लाह जाने क्या कमी तदबीर में रही।

कुछ देर तक तो ज़ख़्म से उलझी रही दवा
कुछ देर तक तो दर्द की तासीर में रही।

क़ातिल ने सारे दाग़ तो पानी से धो दिए
ताज़ा लहू की बू जो थी शमशीर में रही।

शोला-बयानी गो मिरा तर्ज़-ए-सुख़न नहीं
इक आँच सी म

आब की तासीर में हूँ प्यास की शिद्दत में हूँ

 आब की तासीर में हूँ प्यास की शिद्दत में हूँ
अब्र का साया हूँ लेकिन दश्त की वुसअत में हूँ।

यूँ तो अपना लग रहा है जिस्म का ये घर मुझे
रूह लेकिन कह रही है देख मैं ग़ुर्बत में हूँ।

और तो अपनी ख़बर है सब मुझे इस के सिवा
कौन हूँ क्यूँ हूँ कहाँ हूँ और किस हालत में हूँ।

याद भी आता नहीं कुछ भूलता भी कुछ नहीं
या बहुत मसरूफ़ हूँ मैं या बहुत फ़ुर्सत में हूँ।

मैं हुआ बेदार तो हर शख़्स ये कहने लगा
नींद में हूँ ख़्वाब में हूँ या किसी ग़फ़लत में हूँ।

ज़िंदगी ने क्या दिया था मौत ने क्या ले लिया
ख़ाक से पैदा हुआ था ख़ाक की सोहबत में हूँ।

गर मिरी तहरीर में रही।

अंधेरा मिटता नहीं है मिटाना पड़ता है

अंधेरा मिटता नहीं है मिटाना पड़ता है
बुझे चराग़ को फिर से जलाना पड़ता है।

ये और बात है घबरा रहा है दिल वर्ना
ग़मों का बोझ तो सब को उठाना पड़ता है।

कभी कभी तो इन अश्कों की आबरू के लिए
न चाहते हुए भी मुस्कुराना पड़ता है।

अब अपनी बात को कहना बहुत ही मुश्किल है
हर एक बात को कितना घुमाना पड़ता है।

वगर्ना गुफ़्तुगू करती नहीं ये ख़ामोशी
हर इक सदा को हमें चुप कराना पड़ता है।

अब अपने पास तो हम ख़ुद को भी नहीं मिलते
हमें भी ख़ुद से बहुत दूर जाना पड़ता है।

इक ऐसा वक़्त भी आता है ज़िंदगी में कभी
जब अपने साए से पीछा छुड़ाना पड़ता है।

बस एक झूट कभी आइने से बोला था
अब अपने आप से चेहरा छुपाना पड़ता है।

हमारे हाल पे अब छोड़ दे हमें दुनिया
ये बार बार हमें क्यूँ बताना पड़ता है।

आईने से पर्दा कर के देखा जाए

आईने से पर्दा कर के देखा जाए
ख़ुद को इतना तन्हा कर के देखा जाए।

हम भी तो देखें हम कितने सच्चे हैं
ख़ुद से भी इक वअ’दा कर के देखा जाए।

दीवारों को छोटा करना मुश्किल है
अपने क़द को ऊँचा कर के देखा जाए।

रातों में इक सूरज भी दिख जाएगा
हर मंज़र को उल्टा कर के देखा जाए।

दरिया ने भी तरसाया है प्यासों को
दरिया को भी प्यासा कर के देखा जाए।

अब आँखों से और न देखा जाएगा
अब आँखों को अंधा कर के देखा जाए।

ये सपने तो बिल्कुल सच्चे लगते हैं
इन सपनों को सच्चा कर के देखा जाए।

घर से निकल कर जाता हूँ मैं रोज़ कहाँ
इक दिन अपना पीछा कर के देखा जाए।

 

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