Poetry

भारतरत्न भार्गव की रचनाएँ

छतरी

वह बैठी दुबकी कोने में पैबन्द लगी
काली सी बूढ़ी याद पिता की
टूटी छतरी।

डर लगता छूते झरझरा कर गिर पड़ने का
पुराने पलस्तर का
मन की दीवारों को करके नंगा।

यादें खुलकर नुकीले तारों सी
सीने में उतर जा सकतीं
हो सकता मर्माहत
किसी उखड़ी याद के पैनेपन से
अकारण ही अनायास।

इतिहास है छोटा इस याद का
छतरी भर।

चिपट गई थी कैशौर्य में
हौल खाए बच्चे की तरह
शव को मुखाग्नि देने के बाद।

कभी यह याद चलती थी साथ-साथ
धूप में छाँव में
भाव में अभाव में
देती थी सब
देती ही होगी सब कुछ
जो नहीं मिलता कहीं कभी भी
छतरी के अलावा।

अब नहीं देती कुछ भी
सुख-दुःख
करुणा-शोक
अन्धेरा-आलोक
धिक्कार-स्वीकार
प्यार-वितृष्णा
यह पैबन्द लगी याद।

फिर भी बैठक के कोने में
दुबकी-सी रहती है
पिता की याद
ज़रूरी से सामान के साथ
टूटी छतरी।

कचरा बीनते रामधुन

सूरज ने अलसाई चदरिया उतार दी
खिड़की दरवाज़ों के पर्दे सरकाए. फिर
झाँका शीशे से। बाहर आकाश थिर।
ओस स्नात दूर्वादल। मैंने भी आँख मली।

पास कहीं शँखों और घण्टों की ध्वनि गुंजित।
शब्दों में अनबोली कामना थी मुखरित।
भावों का सौदा यह। घृत-दीपक आरती।
चन्दन की झाड़न पथ मन के बुहारती।

चिमटे-सी अँगुलियाँ। कचरे के ढ़ेर पर
बीन रही ज़िन्दगी। दुर्गन्धित चिन्दियाँ
कूकर या शूकर या गाय या मुर्गियाँ।
प्राण और पेट का रिश्ता है विग्रहकर।

मन्दिर में शंख और कचरे में ज़िन्दगी।
आत्मा और देह की तुष्टि हेतु बन्दगी।
पहले में स्वर्ग काम्य, दूजे में नंगा दर्द।
रिश्ता क्या खोजना ! प्रश्न हैं सभी व्यर्थ।

मैंने फिर घबराकर खिड़की के पर्दों को
डाल दिया सोच पर। क्यों बूझूँ अर्थों को।

लाजवन्ती

कैसे पहुँच गया
लाजवन्ती के युवा पौधों के बीच
पता नहीं।

फूल ये गुलाब से सलोने
पर चौकन्ने
रोम-रोम सजी प्रतीक्षित मुखश्री
देखती रहीं कौतुकी दृष्टि
छू भर दिया अनछुए कपोलों को

सहमी फिर लजा गई
सखियों के आँचल में
लुक-छिप जाने को आकुल-व्याकुल

चित्ताकर्षक भंगिमा
अनुभव था नया-नया
विस्मृतियों को ताज़ा करते
मुड़ने लगे पाँव अनायास फिर
काँटों कँकरों भरी पगडण्डियों की ओर !

लौटते देख मुझे
आहिस्ता से खोली पलकें
उठी गरदन, कँपकँपाए ओठ
पढ़कर मेरी आँखें निस्पृह, निर्विकार
बोली धीमे चुपके से —
रूको, फिर नहीं छुओगे मुझे

!

बोनसाई

स्वच्छन्द गर्वोन्नत क़द्दावर पेड़ों की सन्तानें
किस प्रलोभन से
सुसज्जित कक्षों की शोभा बढ़ातीं
किसका अहम् करते हैं तुष्ट
ये बोनसाई

अपनी शाखों पत्तियों जड़ों को
काट दिए जाने पर
क़ैद हो जाती छोटे से प्याले में
क़द्दावर पेड़ों की आधुनिक सन्तानें

मरती नहीं कभी भी
सीख रही हैं
हाथ – पाँव – मुण्ड काट दिए जाने पर भी
जीवित रहने की कला
ये बोनसाई सन्तानें !

राख और आग

बिसरी – बिखरी पगडण्डियों को
सँवारने – बुहारने वाले
लहुलुहान ज़िद्दी हाथों को पढ़कर
कोई भी समझ सकता था
कँटीली झाड़ियों और पथरीली ज़मीन की वह दुनिया
ओझल क्यों रही राख की चादर में लिपटी।

यहीं से उड़ान भरते हैं वे दृष्टिकल्प
जिनकी सुकुमार आँखों के लिए
तितलियों के पंखों से निर्मित है रंगपरी
दृष्ट हैं निर्जन बस्तियाँ
अलंकृत हतोपलब्धियाँ।
आँखों के अन्दर की आँखों से
फूटते उजाले ने परोस दिया
अर्थ गर्भित शून्य।
यहीं कहीं, हाँ यहीं कहीं होगा
पूर्वजों के नामालूम ख़जाने का
अघोषित रहस्य
पुराणों और इतिहास के ताबूतों से
फूटती चिंगारियाँ रात के अन्धेरे में।

सिरे खो गए हैं और गाँठे अबूझ
फिर से शुरू करनी होगी
राख और आग की परिक्रमा
परिभाषित करना नए सिरे से आग को।
कहाँ है वह ओझा
जो राख को
आग बनाने का मन्त्र जानता है !

 

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