Poetry

भारतेन्दु मिश्र की रचनाएँ

गुजरिया

रह-रह घबराता है अब मोरा जिया
चलो चलें गोदना गोदाएँ पिया।

हाथों मे हाथ लिए
मेले मे साथ चलें
मैं सब कुछ हार चुकी
तुम सब कुछ जीत चुके
तुम्ही कहो जादू ये कौन सा किया।

दाहिनी कलाई पर
नाम मै लिखाऊँगी
गाँव की गुजरिया हूँ
भूल नही पाऊँगी
लुका-छिपी मे अब तक बहुत कछ हुआ।

हँसते हो-गाते हो
सपनों में आते हो
धान जब लगाते हो
तुम बहुत सुहाते हो
आँखों मे चाहत का रंग भर दिया।

मेरा घर-आँगन

पूर्वमुखी मेरा घर-आँगन भीज रहा है
पच्छिम से कुछ ऐसे बादल आए हैं ।

इनमें पानी नहीं
सिर्फ तेज़ाब भरा है
रूप-रंग ये कैसा जीवन में उतरा है
आज कँटीले झाड़ यहाँ अँकुराए हैं ।

पीली होकर घास
यहाँ हरियाती है
बीमारों की संख्या बढ़ती जाती है
थोथे गर्जन और धुएँ के साए हैं ।

अब तो सभी
हवा में बातें करते हैं
व्याकुल हुए किसान
भूख से मरते हैं
मोबाइल वो लिए हुए मुँह बाए हैं ।

बैलगाड़ी

यह समय की बैलगाड़ी
सो रहा है मस्त गाड़ीवान
पीकर आज ताड़ी ।

राह के अभ्यस्त
दोनों बैल आगे बढ़ रहे हैं
वृक्ष पर बैठे परिन्दे
ग़र्म ख़बरें पढ़ रहे हैं

रात भर जलकर बुझी है
लालटेन टँगी पिछाड़ी ।

कौन जाने किस दिशा में
जा रहे हैं इस तरह हम
जिधर दिखता हरा चारा
उधर मुड़ता प्रगति का क्रम

बज रही हैं घंटियाँ भी
कंठ मे बाँधी अगाड़ी ।

देखते सुनते समझते
कह नहीं पाते मगर कुछ
सह रहे हैं एक दिग्भ्रम
भूख प्यास थकान सब कुछ

इस समय का गीत गाता
एक चरवाहा अनाड़ी।

बरगद

मैं घना छतनार बरगद हूँ
जड़ें फैली हैं अतल-पाताल तक।

अनगिनत आए पखेरू
थके माँदे द्वार पर
उड़ गए अपनी दिशाओं में
सभी विश्राम कर
मैं अडिग-निश्चल-अकम्पित हूँ
जूझकर लौटे कई भूचाल तक।

जन्म से ही ग्रीष्म वर्षा शीत का
अभ्यास है
गाँव पूरा जानता
इस देह का इतिहास है
तोड़ते पल्लव, जटायें काटते
नोचते हैं लोग मेरी खाल तक।

अँगुलियों से फूटकर
मेरी जड़ें बढ़ती रहीं
फुनगियाँ आकाश की
ऊँचाइयाँ चढ़ती रहीं
मैं अमिट अक्षर सनातन हूँ
शरण हूँ मैं
लय विलय के काल तक।

घमासान हो रहा

आसमान लाल-लाल हो रहा
धरती पर घमासान हो रहा।

हरियाली खोई है
नदी कहीं सोई है
फसलों पर फिर किसान रो रहा।

सुख की आशाओं पर
खंडित सीमाओं पर
सिपाही लहूलुहान सो रहा।

चिनगी के बीज लिए
विदेशी तमीज लिए
परदेसी यहाँ धान बो रहा।

रामलखन

युवा कवि रामलखन के असामयिक निधन पर शोकगीत

तिकड़म की दुनिया मे रहकर
बहुत जी गए रामलखन
बड़े-बड़ों के बीच
छुपे-रुस्तम निकले तुम रामलखन।

अपनी शर्तो पर जीने का हस्र
यही सब होना था
घरवालों को बीच राह मे
छोड़ गए तुम रामलखन।

कविता छूटी दुनिया छूटी
सारे सपने छूट गए
सच्चाई का कच्चा साँचा
छोड़ गये तुम रामलखन।

कल जिसको उँगली पकड़ाई
वह मासूम हथेली थी
बस उस पर उँगली का छापा
छोड़ गए तुम रामलखन।

मदारी की लड़की

मदारी की लड़की
सपनों की किरचों पर
नाच रही लड़की ।

अपने ही
झोंक रहे चूल्हे की आग में
रोटी-पानी ही तो है इसके
भाग में
संबंधों के अलाव ताप
रही लड़की ।

ड्योढ़ी की
सीमाएँ लाँघ नहीं पाई है
आज भी मदारी से बहुत मार
खाई है
तने हुए तारों पर काँप
रही लड़की ।

तुलसी के
चौरे पर आरती सजाए है
अपनी उलझी लट को फिर फिर
सुलझाए है
बचपन से रामायन बाँच
रही लड़की ।

तुम्ही त्रिलोचन

जैसे तुमने देखा था नगई को बटते
शब्दों की रस्सियाँ बटी हैं ,देखा मैंने
जिनमे कितनी अर्थमयी किरणें लिपटी हैं
रस्सी में हैं तीन लरें व्यंजना सरीखी
साधे हो सत-रज तम को तुम एक साथ ही
चम्पा, भोरई, फेरू सबको लिए साथ हो
घिसते रहे अमोला बरसों और बजाते रहे पिपिहरी
तोल न पाता हूँ भाषा की लहरें जिन पर तुम चलते थे
सहज भाव से कह सकता हूँ कविता लिखना
रस्सी बटना है किसान की तीन पलों में
रस्सी में हैं सन के विरल तन्तु लय -सम्वेदन के
उलझे-सुलझे, बैठे-ठाढ़े जगा रहे हो, सिखा रहे हो
करती है सच्ची कविता ही दुख का मोचन
लोचन उघाड़ने वाले हो, बस, तुम्ही त्रिलोचन ।

 

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