Poetry

भावना सक्सैना की रचनाएँ

मन जीवन

देह और मन का संघर्ष है बरसों से
कि दोनों ही अकसर साथ नहीं होते
देह जीती है अपने वर और श्राप
कभी समतल धरती पर तो कभी
उबड़-खाबड़ घने गहरे जंगल में
और मन बुनता है घोंसला आकाश में
वो जीता है अकसर कल में
सपनों में, पुरानी डायरियों के पन्नों में
और कभी बैठ जाता है
दहकते ज्वालामुखी के मुहाने पर
फूंकता है उसमें शीतलता
कभी शांत हो जाती है ज्वाला
तो कभी राख हो जाता है मन।
जहाँ देह होती है
अकसर मन नहीं होता
यह जानते हुए कि
कहीं होकर भी न होना
समय को खो देना है
मन बैठा रहता है
ऊँचे वृक्ष की फुंगी पर
वृक्ष के फलों से सरोकार नहीं
वह देखता है दूर तलक
सपने सुनहरे नए कल के।
देह जब अर्जित कर रही होती है
अपने अनुभव और ज़ख्म सुख के
मन गुनगुनाता है
गीत किसी और क्षण के
किंतु श्रापित है मन
युगो-युगों से फिर-फिर
वही दोहराता आया है
उम्र भर देह से रहकर जुदा
देह के बाद न रह पाया है
लाता है नियति एक ही
चलती नहीं किसी की जिसपर
मन जो रहता नहीं देह का होकर
खत्म हो जाता है देह संग जलकर।
फिर भी मन असीम अनंत
नन्हीं चिड़िया-सा संभालो इसे
कि जब टूटता है मन
देह में प्राण रहें न रहें
रह जाता नहीं उसमें जीवन।

पुरानी चीज़ें

मोह नहीं है
फिर भी छूटती नहीं
पुरानी चीज़ें।
चांदी की एक बाली
जो अम्मा ने बनवाई थी
कर्णछेदन पर
हल्दी तेल उसके
धुल गए कब से
लेकिन सिमटी है
उसमें एक तरल मुस्कान
पहला साहस
दर्द में न रोने का।
दराज़ के कागजों में छिपा
सागर तट का धुंधला-सा चित्र
जिसमें माता पिता
के संग मुस्कुराते चेहरे
अतीत को ज़िंदा रखे हैं;
ज़रूरी है वह
दिल के सागर में
छिपी यादों की तरह।
पाठशाला का चित्र
जिसमें जड़े चेहरे
बदल गए बरसों पहले
पर उसमेँ मैं ख़ुद को
अभी भी पहचान लेती हूँ
और उसे देख नए हो जाते हैं
कितने ही संकल्प
जो अभी पूरे नहीं हुए।
वो किस्से कहानियाँ
जो कहीं लिखे नहीं
पर मोती से टंके हैं
दिल के दामन पर।
एक नामालूम-सा बूंदा
जो अनमोल है
कि उसे ले आया था
आठ साल का एक बालक
पिकनिक के लिए दिए
मामूली से खर्चे से
अपनी माँ के लिए
कहता है कहानी
एक बालक के बड़े होने की।
बालिश्त भर का एक स्वेटर
जिसमें माँ की उँगलियों ने
बुने थे स्नेह के तार
अभी तक उसकी
नरमी में महकता है प्यार;
कुछ खिलौने
जिनसे कोई खेलता नहीं
लेकिन बीता कल
मुस्कुराता है उनमें।
एक ख़त पुराना
नए रिश्तों की
जिसने नींव धरी
जिसके विश्वास में
महकता है आज
और धो देता है
यदा कदा उपजी काई
जिस पर फिसल के
रिश्ते टूट जाते हैं।
इन सब में
और ऐसी कईं और
कोनों में सहेजी हुई
निशानियों में है मौजूद
मेरा ज़रा ज़रा-सा वजूद
इनसे जुदा जो होने नहीँ देता
इनके होने से मेरा होना है।
लेकर साथ तो
कुछ भी है जाना नहीं
ज़िंदा रहने को
पर ये ज़रूरी हैँ
सांसों की तरह।

छलना

चला था घर से जब
आँख में आस थी, उम्मीद थी
उमंग थी,
बेहतर बन जाने की।
दिए थे सपने
जिसने,
दिखता था उस जैसा
मधुर कंठ था मीठे बोल
और आश्वासन था
उसका भारतीय मूल-
” देखो मैं हूँ पी आई ओ*
संग मेरे तुम हो लो,
उभरो दलदल से,
जीवन अपना बदलो।
इतनी मेहनत पर
डॉलर बहुत पाओगे
य़हाँ रहोगे, जीवन भर
बस यूँ ही रह जाओगे।

दूर देश है एक
वहाँ तुम जैसे ही बसते हैं
आवश्यकता हीरे की तुमसे
वहाँ भारतवासी पुजते हैं।
कर मुझ पर विश्वास
देख मैं तुझ जैसा ही तो हूँ
मेरे दादा इसी देश के
फिर तो भाई तेरा हूँ।
पासपोर्ट, वीज़ा, परमिट,
सब काग़ज़ मैं कर दूँगा
चल तू मेरे साथ,
तेरी मैं जेबें ही भर दूँगा”

और पड़ोसी भी था कहता-
मत घबरा,
खुला एक दफ्तर है रहता
मदद करेगा वह भी
देशवासी हैं अपने ही वे
संग होंगे
कठिनाई
जो हुई कभी।

और यही कुछ आश्वासन ले
चला, पाँव पसारा…
माँ की आँख भरी जलधारा
पिता कि कोर भी नम थीं
दूर कष्ट पर उनके होंगे
यही आस क्या कम थी।

कौतुक रस्ते भर भी देखे
देख-देख भरमाया।
मध्य रात्रि उतरा विमान
तब
गहन अँधेरा पाया।
क्या था वह संकेत कहीं
उस आसन्न तिमिर का
जीवन पथ की राहों में
पड़ने वाले कहर का।
होना था जो शुरु
सिलसिला
चिर अनंत श्रम का…
अंतडियाँ जब शोर मचाती
सूखी रोटी पाता
हाड़ तोड़ मेहनत भी करता
डालर एक न पाता,

सब कुछ जमा है खाते में,
पी आई ओ कहता जाता।
इतना जाहिल भी तो न था
सोच-सोच रह जाता
अगूंठा, हस्ताक्षर कहीं ना,
खुला गया कहाँ यह खाता।
कार्यपत्र की मांग करी जब
पासपोर्ट भी गंवाया
मजदूरी की मांग करी तो
जा थाने पहुँचाया
उससे ही कुछ और वहाँ थे
फिर भी तो विरुद्ध
एक आस छोटी-सी ही तो थी
जीवन बना क्यूँ युद्ध।

गिरते पड़ते ढूँढ ढांढ कर
दफ्तर तो जा पाया
पर दमड़ी तो पास नहीं
फिर हमदम कोई न पाया
जो मालिक
संभ्रांत नागरिक,
उसे सही ही पाया
जो भूखा…
मत लालच कर
उसको यह समझाया

सकुचा सहमा,
मिला मुझे जब
अश्रुसिक्त चेहरा था बस वह
लिए कईं सवाल-
घर जाकर कह दूँ कैसे मैं
बैरंग लौट चला आया हूँ
कैसे जानूँ किस गलती की
आज सज़ा पाया हूँ?
उस छले हुए की
दशा देख
यह सोच-सोच रह जाती
छले गए जो सदी से पहले**
उन-सा ही है
या बदतर है
उनके दुश्मन दूर देश के
अब अपने घर के हैं।
स्वार्थ सिद्धि को ले आते हैं
बहलाकर फुसलाकर
अपने सपने पूरे करने
चिराग और का जलाकर।

मैं-सत्य

क्या कहा-
पहचाना नहीं!
अरे सत्य हूँ मैं…
युगों युगों से चला आया।
हाँ अब थक-सा गया हूँ,
जीवित रहने की तलाश में
आश्रय को ही भटकता,
हैरान…
हर कपट निरखता।

आहत तो हूँ, उसी दिन से
जब मारा गया
अश्वत्थामा गज
और असत्य से उलझा
भटकता है नर
कपटमय आचरण पर
कोढ़ का श्राप लिए।

गाँधी से मिला मान,
गौरव पाया…
रहूँ कहाँ…
जब गाँधी भी
वर्ष में एक बार आया।
कलपती होगी वह आत्मा
जब पुष्पहार पहनाते,
तस्वीर उतरवाने को…
एक और रपट बनाने को…
बह जाते हैं लाखों,
गाँधी चौक धुलवाने को,
पहले से ही साबुत
चश्मा जुड़वाने को
और बिलखते रह जाते हैं
सैकड़ों भूखे
एक टुकड़ा रोटी खाने को।

चलता हूँ फिर भी
पाँव काँधों पर उठाए।
झुकी रीढ़ लिए
चला आया हूँ
आशावान…
कि कहीं कोई बिठाकर…
फिर सहला देगा,
और उस बौछार से नम
काट लूँगा मैं
एक और सदी।

मैं रहूँगा सदा
बचपन में, पर्वत में, बादल में,
टपकते पुआली छप्पर में,
महल न मिले न सही
बस यूँ ही…
काट लूँगा मैं
एक और सदी।

जीवन

कल काटे छाँटे वृक्ष की
नग्न शाख़ पर उतर आया चाँद
सहलाता हुआ सा
पत्रहीन अकेलेपन को
सींचता चाँदनी से…

तुम जीवन हो
फिर हरे भरे होंगे
कल, कल-कल स्वर
भर देंगे जीवन,
जीवन के आँगन में।

कुछ पत्र पुष्प छंट जाने से
जीवन का सार नहीं चुकता
जीवन मन का वह साहस है
जो कभी कहीं नहीं रुकता

दिल मन तो नहीं

जो दिल है
वो मन तो नहीं!
कि उड़ा करता है मन
पाखी-सा अलमस्त
चंचल निश्छल
पल में घूम आता है
कितनी सदियाँ,
पर्वतों से वादियों में
दौड़ता मचल-मचल
कभी गहरे नापता है
बीहड़ जंगल।
और दिल?
एक कब्रगाह है दिल
कि उसमें दफन हैं
दर्द के असंख्य पल
यादों की कब्रों पर
रोज़ डलता है
आंसुओं का नमक
यादें फिर भी गलती नहीं
हाँ इतना तो है
कि ये कब्रगाह है
शीशे का इक ताजमहल।
कि दर्द की मज़ारें भी
हुआ करती कोमल।
या फिर जो है ये दिल
है शमशान कोई
जिसमें सुलगते रहते हैं
ख्वाब कई रात और दिन
लौ ऊंची किया करते
अमरज्योति की मानिंद
के जलते भी हैं
सुलगते भी हैं
और आगे बढ़ने की
राह दिखाते भी हैं।
कि रूह है मन
तो रूह का लिबास है दिल

दिल मन तो नहीं

जो दिल है
वो मन तो नहीं!
कि उड़ा करता है मन
पाखी-सा अलमस्त
चंचल निश्छल
पल में घूम आता है
कितनी सदियाँ,
पर्वतों से वादियों में
दौड़ता मचल-मचल
कभी गहरे नापता है
बीहड़ जंगल।
और दिल?
एक कब्रगाह है दिल
कि उसमें दफन हैं
दर्द के असंख्य पल
यादों की कब्रों पर
रोज़ डलता है
आंसुओं का नमक
यादें फिर भी गलती नहीं
हाँ इतना तो है
कि ये कब्रगाह है
शीशे का इक ताजमहल।
कि दर्द की मज़ारें भी
हुआ करती कोमल।
या फिर जो है ये दिल
है शमशान कोई
जिसमें सुलगते रहते हैं
ख्वाब कई रात और दिन
लौ ऊंची किया करते
अमरज्योति की मानिंद
के जलते भी हैं
सुलगते भी हैं
और आगे बढ़ने की
राह दिखाते भी हैं।
कि रूह है मन
तो रूह का लिबास है दिल

जान पाए क्या अपना मन?

टुकड़े टुकड़े बेचा जीवन
बेच दिया सारा ही मन
मुस्कानें तो बेची ही थी
बेच दिए सब दर्द गहन।
सायों में लिपटे कुछ पल थे
गुँथी हुई पीड़ा थी सघन
खुले आम नीलाम किये सब
बाज़ार धर दिया देह कफ़न।
नग्न आत्मा ले फिरते अब
किससे क्या पा जाओगे
जीवन बीता अर्थहीन सा
जान पाए क्या अपना मन

माँ का आँचल

नेह की बारिश बहुत थी
माँ तेरा आंचल नहीं था।
दूर थी माँ जब पुकारा
मुझको तेरा बल नहीं था
मचलती ठुनकती रूठती हंसती
दुलार भरी बाहों में पलती
दीखती थी सारी सखियाँ
माँ मुझे सम्बल नहीं थाय़

कर दिया तुमने अलग जब
ममता कि यूँ न कुछ कमी थी
अश्रुओं की थी नमी,
स्नेह की पाती कईं थीं
माँ मेरी यूँ तो कईं थी
एक तेरा आँचल नहीं था।

मजबूर कितनी तुम थी उस दिन
कितने तेरे अश्रु गिरे थे
छोड़ आई थी मुड़े बिन
मैं समझ पाती हूँ अब
तिनके-सी तब सागर में थी
कश्ती जिसे साहिल नहीं था।

फ़र्ज़ क़र्ज़ अब चुक गए सब
चुक गया बचपन बेचारा
चुक गए सूखे से कुछ क्षण
आयेंगे न अब दोबारा
सालता है अब तलक
वो पल जो मेरा कल नहीं थ।

सब तो न किताबें कहती हैं

इतिहास गवाह तो होता है घटनाओं का
लेकिन सारा कब कलम लिखा करती हैं?
जो उत्कीर्ण पाषाणों में, सब तो न किताबें कहती हैं,
सत्ताएं सारी ही स्वविवेक से, पक्षपात करती हैं।

किसके लहू से रंगी शिला, किसका कैसे मोल हुआ
अव्यक्त मूक कितनी बातें, धरती में सोया करती हैं
निज स्वार्थ लिए कोई, जब देश का सौदा करता है
उठा घात अपनों की, धरती भी रोया करती है।

मीरजाफर- सा कायर जब घोड़े बदला करता है
दो सौ सालों तक धरती, बोझा ढोया करती है
ऐसा बोझा इतिहास रचे, सच्चे नायक खो जाते
मिथ्या कृतियां सूरमाओं की सत्ता नकारा करती हैं।

आज़ादी का श्रेय अहिंसा लेती जब-जब
साहसी वीरों के बलिदान हवि होते हैं
नमन योग्य जिनके चरणों की धूलि
स्मृतियां भी उनकी खो जाया करती हैं।

कुटिल कलम इतिहास कलम करती जब
खून के आंसू पत्थर भी रोया करते हैं
लिखने वाले लिख तो देते हैं निराधार
युगों युगों पीढ़ियां, भ्रमित हुआ करती हैं।

वह हिन्दी है, हिन्दी रहने दो!

अर्धशती भी पार नहीं है,
कितना बदल गए हैं कब से!
वह तो सदियों चल आई है,
तो भी बदली नहीं बहुत है।
क्यों फिर उसकी सिलवट तुमको
भाषा अलग नई लगती है?

दूर देश जब पहुँचे तुम तो,
साड़ी धोती छूट गयी सब।
वह भू के कोने-कोने में,
अब भी अपने ही वसनों में!
व्यसन रहें कितने भी तुम में,
तो भी जुड़े हुए हो जड़ से!
उसने कुछ अपनाए तो
नाम नया क्यूँ दे डाला है?

घर की देहरी जब छोड़ी उसने,
सकुचाई कुछ शरमाई थी
लेकर मुट्ठी में साहस बस,
सागर पार चली आई थी।
कईं माह की यात्रा दुष्कर
कष्ट कठिन से कठिन भयंकर!
ला छोड़ा बीहड़ में, फिर भी
देख उजाड़ न घबराई थी।

रीत पुरानी सीख सुहानी,
अपनाकर बस,
हाथ बढ़ाया, गले लगाया।
कठिन तपस्या, कड़ी साधना
हिंदी ने घर यहाँ बनाया।
सुगृहिणी-सा जोड़-जोड़ कर
कुशल एक संतुलन बनाया।

जरा रूप रंग बदल गया है,
पहनावा कहीं उधार लिया है,
पर हिन्दी है,
सरनामी, बात फ़िजी की, नैताली,
कहते तुम जिसको,
वह हिन्दी है!

रची बसी है दिलों में कितने,
कितने नित अपनाते हैं।
कितने इसके ही कारण से
रोजी रोटी पा जाते हैं।
देश में हो, विदेश रहो या,
इसे कमान लिए रहने दो,
मत रेल चलाओ एक्सप्रेस कोई,
अलग अलग मत बाँटो गुट में,
एक कमान में रहने दो।

तब होगी वह आगे सबसे
विश्व फ़लक पर लहराएगी,
होगी सबसे अधिक ज़ुबान पर
विश्व भाषा कहाएगी।
परिवर्तन तो नियम पुराना
कुछ परिवर्तन हो जाने दो,
कहो नई मत भाषा उसको,
हिंदी है,
हिंदी रहने दो!

शब्द

शब्द
अपने आप में
होते नहीं काबिज़,
सूखे बीजों की मानिंद
बस धारे रहते हैं सत्व…
उभरते पनपते हैं अर्थों में
बन जाते हैं छाँवदार बरगद
या सुंदर कँटीले कैक्टस,
उड़ेला जाता है जब उनमें
तरल भावों का जल।

न काँटे होते हैं शब्दों में
और ना ही होते हैं पंख
ग्राह्यता हो जो मन मृदा की
पड़कर उसके आँचल में
बींधने या अँकुआने लगते हैं।

शब्द हास के
बन जाते हैं नश्तर, और
नेहभरे शब्द छनक जाते हैं
गर्म तवे पर गिरी बूंदों से
मृदा मन की हो जो विषाक्त।

कहने-सुनने के बीच पसरी
सूखी, सीली हवा का फासला
पहुँचाता है प्राणवायु
जिसमें हरहराने लगते हैं
शब्दों में बसे अर्थ।
प्रेम की व्यंजना में
बन जाते हैं पुष्प, तो
राग-विराग में गीत के स्वर
और वेदना में विगलित हो
रहते पीड़ादायक मौन।

शब्द प्रश्न भी होते हैं
हो जाते हैं उत्तर भी
मुखर भी और मौन भी
गिरें मौन की खाई में
तो उकेरते हैं संभावनाएँ।

अनंत संभावनाओं को
भर झोली में, शब्द
विचरते हैं ब्रह्मांड में
खोजते हैं अपने होने के
मायने और अर्थ।

क्योंकि शब्द
अपने आप में कुछ नहीं होते।

शब्द

शब्द
अपने आप में
होते नहीं काबिज़,
सूखे बीजों की मानिंद
बस धारे रहते हैं सत्व…
उभरते पनपते हैं अर्थों में
बन जाते हैं छाँवदार बरगद
या सुंदर कँटीले कैक्टस,
उड़ेला जाता है जब उनमें
तरल भावों का जल।

न काँटे होते हैं शब्दों में
और ना ही होते हैं पंख
ग्राह्यता हो जो मन मृदा की
पड़कर उसके आँचल में
बींधने या अँकुआने लगते हैं।

शब्द हास के
बन जाते हैं नश्तर, और
नेहभरे शब्द छनक जाते हैं
गर्म तवे पर गिरी बूंदों से
मृदा मन की हो जो विषाक्त।

कहने-सुनने के बीच पसरी
सूखी, सीली हवा का फासला
पहुँचाता है प्राणवायु
जिसमें हरहराने लगते हैं
शब्दों में बसे अर्थ।
प्रेम की व्यंजना में
बन जाते हैं पुष्प, तो
राग-विराग में गीत के स्वर
और वेदना में विगलित हो
रहते पीड़ादायक मौन।

शब्द प्रश्न भी होते हैं
हो जाते हैं उत्तर भी
मुखर भी और मौन भी
गिरें मौन की खाई में
तो उकेरते हैं संभावनाएँ।

अनंत संभावनाओं को
भर झोली में, शब्द
विचरते हैं ब्रह्मांड में
खोजते हैं अपने होने के
मायने और अर्थ।

क्योंकि शब्द
अपने आप में कुछ नहीं

लुप्तप्रा

बस कुछ ही बरसों बाद
याद की जाएगी
औरतों की वह जमात
जो सुबह से शाम
कर देती थीं
बिना कुछ करे…
जो नौकरी नहीं करती थीं
लेकिन मुँह अँधेरे
आँगन बुहारती थीं
घर को संवारती थीं।
जिनके घर में रखा मंदिर
महकने लगता था
हर सुबह ताज़े फूलों से
दीपक की लौ संग
स्फुरित होता था आशीर्वाद
और हर भोग के बाद
बँटता था प्रसाद।
बच्चों के स्कूल से लौटने पर
सेंकती थी गर्म रोटियाँ
और शाम के नाश्ते को
रखती थी तैयार
देसी घी के लड्डू-मठरियाँ।
जाड़ों की धूप में वे
सलाइयों पर बुनती थीं प्यार।
जिनके बने मीठे नमकीन
पूरन-पोली और रंगोली
सजाते थे त्योहार
जिनके आँगन और छज्जे
पुकारते थे सूर्य को
कि सुखाने होते थे
उनमें फैले पापड़-अचार
वहाँ गुड-डे और चीतोज़ के
डिब्बे-पैकेट नहीं खुलते थे
मनुहारों में दिखता था प्यार।
कतरा कतरा रिसकर
जो सींचती थी परिवार
किंतु तरसती थी हर बार
पाने को उचित व्यवहार।

इनकी पुत्रियों के मन में
असीम स्नेह के संग
घर कर गया क्षोभ,
आर्थिक स्वतंत्रता में
देखने लगीं वे मुक्ति का द्वार
समय के साथ
आगे बढ़कर संभालने लगी
अर्थ व्यवस्था कि भी कमान
पुरुष के कंधे से कंधा मिला
चलने लगीं संग
कुछ साझे समझौते किए
अन्नपूर्णा से संपूर्णा बन
सुबह के अलार्म संग
शुरू हुई घनघनाहट
चलती सुबह से रात तलक
घर-बाहर संभालती
दौड़ती फिरती
हर मोर्चे पर…
कहीं पूरा तो कहीं
आधा दिन कमाती
सारे बिल भरती
बैंक के काम निपटाती
बच्चों का होमवर्क कराती
टीचर से मिलने स्कूल जाती
सुपर-वुमैन बनने को बेताब
दौड़ती, तो बस दौड़ती जाती
घर परिवार की ख्वाहिशों को
स्वयं होम होती जाती
जितनी पूरी करती
उतनी ही और खड़ी पाती
हाँ! उतनी ही ख्वाहिशें और पाती।
कतरे का कतरा
भी रखा नहीं ख़ुद को
उलाहनों से
फिर भी बच न पाती।

उलाहनों की ये दरारें
भेद गयीं मन को
हुआ फिर एक और अवतार
अगली पीढ़ी की स्त्री
पहचानने लगी
अपनी शक्ति
जल, थल नभ पर
कर दिए हस्ताक्षर
किंतु खोने लगी
परंपरागत स्त्रीयोचित व्यवहार
स्वयं को साबित करती
स्वयं से ही लड़ती
खड़ी है आज शमशीर उठाए
नकारती सब परंपराएँ।
होती है आहत
अपने ही शर से
अपने जोखिम पर
लाँघती है कई सीमाएँ
क्योंकि
प्रश्नों का उसके
उत्तर नहीं है
किसी के पास
कोई कोस देता है
तो कोई करता है परिहास।

लेकिन अभी भी
इस लुप्तप्रायः जाति में
बाकी है कुछ जान
वो छोड़ नहीं पाई फितरत
नेह, ममता और संवेदना की
भीग जाती है भीतर तक
दुनिया के ग़म से।
वो लड़ती है,
अपने अधिकार के लिए
तरसती है नेहभरे
व्यवहार के लिए
वो सम्मान की अधिकारिणी
उसके सामने बौना है
तुम्हारा ओछा संसार
उथला व्यवहार।
नेह का व्यापार नहीं
माँगती है वह
निश्छल नेहभरा संसार
बस नेह भरा संसार।

जड़े

आदमी की
जड़ें उग आती हैं घरों में…
उसे नहीं चाहिए
जानकारी देश दुनिया की
उसकी बादशाहत से बाहर
ताज़-ओ-तख़्त
सभी बेमानी हैं!
वह हरदम सोचता है
दीवारों पर चढ़ रही सीलन की
कभी छत से उतरती
तो कभी ज़मीन से चढ़ती।
और छत पर धरी
पानी की टंकी के नीचे
उग आए पीपल की।
उस पीपल को वह
उखाड़ फेंकना चाहता है
नहीं चाहता पीपल
जो अपनी जड़ें फैला
उस घर पर बना ले
एक मज़बूत पकड़
उस पर रखना चाहता है
वह कायम
अपना साम्राज्य
अपना आधिपत्य।
उसे ख़ौफ़ नहीं है
समय का
जो रौंद देता है सब
उसने देखे हैं
समय की गर्त में
तिरोहित भग्नावशेष
फिर भी
आदमी स्वयं को
समझता है शाश्वत
कभी पीपल सा
तो कभी बरगद सा
महसूसता है ख़ुद को।
और जानबूझकर
भूला रहता है कि
जड़े, शाखें और पुष्प
सभी रह जाएंगे
और
सबके रहते भी वह
उखड़ जाएगा एक रोज़।

सुनो

सुनो!
हर खाँचे में
सही बैठने को
छील देती हो
क्यूँ हर बार
ज़रा-सा मन
कब समझोगी!
आदर्श
आखिर कुछ भी नहीं होते।
हर बार
हर किसी ने
गढ़ा है उन्हें
अपने लफ़्ज़ों में
अपनी सहूलियत से…
तुम तो उपजी भी
शायद
एक आस को तोड़
जैसे बंजर परती पर
उग आई हो अमरबेल
या कोई पीपल
पत्थरों का सीना चीर।
इस तपती
रेतीली भूमि पर
तुम्हारा होना ही
है नमन योग्य
फिर क्यों शर्मिंदा हो
अपने होने पर
कि बार-बार
खुद को तोड़
अपने टुकड़ों से
भरती हो दरारें,
आंसुओं के
महीन रेशम से
करती हो रफू
जिंदगी के ताने-बाने,
जोड़ते रहने की
फितरत में
ढल गई हो तुम!
दोषी हो!
तुम ही अपनी
कि मौन रहीं सदा
और सहमत रहीं।
गढ़ा जाता रहा तुम्हें
बरसों बरस
उनके अनुसार
उम्मीदों की छैनी से
छीली जाती रही,
चमक की आस में
घिसी जाती रही,
हौसलों की आँच में
तपाई जाती रही।
क्या समझी नहीं
अब तक
कितना भी तपो
किसी का कुंदन बन पाना
नहीं है आसान
क्योंकि छिल-छिल कर
अस्थि स्तर तक भी
तुम पाओगी
या तुमसे कहा जाएगा
कि बस ज़रा सा
और होता
तो बेहतर था
तुम कितना ही
छिलो, घिसो या तपो
वो ज़रा सा
कम रह ही जाएगा
जिन मानकों को
रखा गया है
तुम्हारे सामने
उनमें से कोई
नहीं थी संतुष्ट।
ना सीता, ना राधा,
और न ही पार्वती
देवियाँ होकर भी थीं
अभिशप्त ज़रा ज़रा।
सूखने दो आंसुओं को
इनके नमक से
करना है तुम्हें
सत्याग्रह
बाहर आओ
अनंत वर्जनाओं से
कि तुम्हें ही तो
रचनी है सृष्टि
समझाना है
स्वार्थ सिंझी दुनिया को
कि किसी रोज़
दुनिया कि सब औरतें
एकजुट हो अगर
बाँध लेंगी अपनी कोख
तो सिमट कर
मिट जाएगा संसार।

यादों की गुल्लक

आज अचानक बैठे-बैठे
फूट गई यादों की गुल्लक
जंगल में बहते झरने से
झर-झर झरे याद के सिक्के
गौर से देखा अलट-पलट कर
हर सिक्के का रंग अलग था,
खुशबू थी बीते मौसम की
पीर जगाती दिल में, लेकिन
मौसम थे खुशरंग वह सारे।
इक इक सिक्का
लिए कहानी आया बाहर
एक बड़ी-सी ढेरी दस की
बाबा कि जेबों से निकले
बस वह सिक्के नहीं है केवल
हर एक पर अक्स छपा है
लाड़ लड़ाते बाबा का और
पैताने कम्बल में छिपने पर
दादी की मीठी झिड़की भी।
छोटा वाला एक वह सिक्का
जिसकी चुस्की रंग-बिरंगी
लेते लेते छूट गयी थी
त्योरी देख बुआ की उस दिन…
सैक्रीन से बैठ जाएगा
गला तुम्हारा, और
रंग भी ठीक नहीं ये
कुल्फी, सॉफ्टी मलाई-बर्फ
शुद्ध दूध से बनते सारे
लेना है तो कुछ अच्छा लो।
एक चवन्नी मेहनत की है…
टाल और चक्की की फेरी
बड़ी प्रिय वह इस कारण, कि
पाठ वह पहला
अपने बूते कुछ करने का
जिससे चलना सीखा अकेले
और इसी ने राह बनाई।
एक अठन्नी, ली थी ज़िद कर
मेले जाते जाते
रिब्बन, माला, चूड़ी, गुड़िया,
खेल-खिलौने रंग-बिरंगे
टिका नहीं मन किसी पर आ,
तो, वापस आई घूमघाम कर
तब से यूँ ही पड़ी हुई है
बाट जोहती मेले की फिर…
कैसे कहूँ प्रेम और सद्भाव के
अब वह मेले यहाँ नहीं हैं।
रुपया एक मोहब्बत वाला
तकना बस नुक्कड़, छज्जे से
मन की पींगें उड़ती ऊँची
सामने आ बस नज़र झुकाई
लाज और संस्कार का रंग
गहरा था तब किसी भी रंग से।
और कई हैं सिक्के इसमें
राज़ अनूठे दुबके छिप-छिप
रेज़ा-रेज़ा ख़्वाहिश के रंग
यादें ऐसी फैल गयी हैं
सिरे समेटे से न सिमटे।
डूब गई आकंठ इन्हीं में
पूंजी लिए हुए बचपन की
भीगे नयन हृदय हर्षाता
वक्त काश वह फिर आ पाता।

हौसला नदी का

पार साल से नदी
कुछ खारी हो गयी है
थकने लगी थी बीहड़ में
पत्थरों से उलझते
सिंधु से लेकर अपना जल
अब उलटी बह रही है,
जब तक मीठी थी
हर मोड़ पर कटती रही
अब खारी हुई तो
लबालब शांत बह रही है,
हौसला चाहिए
मिठास खोने को भी
ज़रा टेढ़ा-सा मुस्कुरा
घाटियों से कह रही है…

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