भूपराम शर्मा भूप की रचनाएँ

छंद

भतरी गोवर्धनपुर है निवास मेरा,
किंतु बाल-बाटिका में जीवन बिताता हूँ।
‘मास्टर जी,’ पंडित जी’,’ कवि जी’ बताते लोग,
किंतु मैं तो मुंशी जी कहाके सुख पाता हूँ॥
‘शंखधर ब्राह्मण’ बताते परिजन मुझे,
अध्यापक जाति अपनी मैं बतलाता हूँ।
प्राइमरी पाठशालाओं के भोले शिशुओं को,
‘अ-आ-इ-ई-उ-ऊ’ आदि अक्षर सिखाता हूँ॥

अपने अबोध और भोले शिशुओं के बीच,
हलचल में भी अविकल कल पाता हूँ।
जग के प्रपंच-द्वंद-छल-छंद-बैर आदि,
व्याधियों की आँधियों से दूर बच जाता हूँ॥
शिशुओं के क्षणिक सुयोग मिलते ही निज,
रोग-भोग विकल वियोग बिसराता हूँ।
कष्ट नहीं देते गर्म-रेत से हज़ारों कष्ट,
जब शिशुओं के श्रद्धा-सर में नहाता हूँ॥

यौवनदान खण्डकाव्य से

पुरुष है नारी का कर्तव्य
पुरुष ही है उसका अधिकार
रख सका यदि न प्रिया को सुखी
पुरुष के पौरुष को धिक्कार

बना संक्रामक और असाध्य
नारियों के शोषण का रोग
क्योंकि घर की लक्ष्मी को क ई
पैर की जूती कहते लोग

पत्नियों ने पतियों के हेतु
किए हैं कितने ही बलिदान
पत्नियों को पतियों से मिला
किन्तु सर्वदा घोर अपमान

हो रहे मंचों पर व्याख्यान
पुस्तकों में अंकित हों लेख
किन्तु इसका क्रियात्मक रूप
कहीं भी सका न कोई देख

नारियों के हाथों है रुकी
धार्मिकता-आस्तिकता सभी
पुरुष-मन है षडयन्त्र-प्रवीण
छोड़ सकता न दुष्टता कभी

अभी तो है प्रतिशत अति न्यून
बढ़ेगी कलियुग में गति जभी
छटेगी क्रांति-पर्व के प्रखर
भव्य उद्घाटन की तिथि तभी

जागने से सोने तक कार्य
गिने जा सकते उसके नहीं
किन्तु आभार जनित दो शब्द
न कोई कहता उससे कहीं

लिया जिसने रक्षा का भार
उसी को त्रस्त यदि रखे त्रास
बने ‘गृहलक्ष्मी’ , ‘रानी’ शब्द
कदाचित करने को उपहास

गृहस्थी के राजा तो सदा
भ्रमण कर सकते हैं सर्वत्र
किन्तु रानी को देने पड़ें
उन्हें मौखिक आवेदन-पत्र

जिसे कहते हैं अर्द्धांगिनी
सेविका के अतिरिक्त न और
गूढ़ है कितना पुरुष पुराण
शब्द कुछ और अर्थ कुछ और

न जाने किन हाथों से लिखा
विधाता ने नारी का भाग्य
उसे करना पड़ता स्वीकार
सर्वथा जो होता है त्याग्य

पुरुष का क्या है वह तो नित्य
मधुप-सा फिरता है स्वच्छन्द
किसी भी नारी से कर रमण
उसे मिलता मौलिक आनन्द

न उस पर प्रतिबन्धों का बोझ
न उस पर मर्यादा का भार
न उस पर अंकुश कोई अन्य
न उस पर आरोपों की मार

अहं पौरुष का लेकर पुरुष
नित्य कर सकता है व्यभिचार
किन्तु यदि नारी ऐसा करे
चीख पड़ता समस्त संसार

पुरुष के लिए हमारी जाति
मनोरंजन का है सामान
इसी के तन के जाये पुरुष
भला कब रखते इसका ध्यान

पुरुष की दृष्टि देखती रूप
पुरुष का प्रेम दिखावा मात्र
पुरुष की क्षुधा-शान्ति ही सत्य
पुरुष का साथ छलावा मात्र

वीरकुम्भा खण्डकाव्य से

रण-पुंगव कुम्भा जी! तुम थे
अद्भुत, अद्वितीय, असाधारण
इस यश में सदा तुम्हारा ही
रस-रक्षक रुधिर रहा कारण

तुम मातृ-भक्त तुम पितृ-भक्त
तुम भ्रातृ-भक्त तुम देश भक्त
तुम थे केवल एक ही किन्तु
हो गये अनेक में विभक्त

चित-चोर चराचर-चिर-चर्चित
चैतन्य-चित्त, चातुर्य-चित्र
मानवता-मस्तक, महामहिम
ममता-मोहक, माधुर्य-मित्र

संचरणशील, संतरणशील
संभरणशील, संवरणशील
खिल उठता देश तुम्हारे यदि
सब हो जाते अनुकरणशील

जातीय-जागरण-जागरूक
जग-जीवन-ज्योति स्तम्भ ज्येष्ठ
बलिदानी परम्परा में तुम
निकले सर्वोत्तम सर्वश्रेष्ठ

है देख तुम्हारे साहस को
आश्चर्य-चकित प्रत्येक वर्ग
किस भांति तुम्हारा लिख पाऊँ
उत्सर्ग-पर्व, संसर्ग-सर्ग

भव्येश! भाव-भूषण तुमने
सुधि कर भूली भावुकता की
अविलम्ब-अचानक-अकस्मात
सीमा छूली उत्सुकता की

होते तुम-से यदि वीर आज
होते न साम्प्रदायिक विषाद
हिन्दू-मुस्लिम, हिन्दी-उर्दू
मन्दिर-मस्जिद आदिक विवाद

तुम-से दानी-बलिदानी की
यदि रहतीं बनी तपस्यायें
पंजाब-असम-कश्मीर आदि-
की होती नहीं समस्यायें

तुम-से यदि होते दृढ़-प्रतिज्ञ
होती न किसी की मनमानी
देखते न आँख उठाकर भी
हमको चीनी-पाकिस्तानी

तुम-से भट के सम्मुख करते
शठ-शशक-श्रृगाल न सिंहनाद
दो दिन भी नहीं पनप ‌ पाता
अपहरण-वाद, आतंक-वाद

अन्धेर-पूर्ण यह पक्षपात
अब कैसे कब ‌तक सहा जाय
पाखंडी, प्रजा-‌ पीड़कों को
पल-पल पर पीड़ित कहा जाय

निष्करुण, निरंकुश, निडर बने
जो पाकर अनुचित पक्षपात
कर रहा प्रशासन उन पर ही
अनुकूल उन्हीं के दृष्टि-पात

कर सके न अभिनन्दित तुमको
कुम्भा जी! हम सुमनावलि से
कर रहे आज कुछ सम्मानित
शोकाश्रु-शब्द श्रद्धांजलि से

राजपूत खण्डकाव्य मंगलाचरण

अद्वितीय-अलौकिक-अद्भुत
अतुलित-आदृत-अभिज्ञानी
आर्यीर्चित-अति अभिनन्दित
अविजित-आद्या-अभिमानी

शुचि शौर्य-शक्ति-संयुक्ता
शुभ शस्य श्यामला सुजला
सन्तोष-शान्ति-सुख दायिनि
सुभगा-स्वर्गादपि सुफला

प्रिय प्रकृति-प्रिया, परिमल-प्रिय
पर्वत-पादप पुष्पार्चित
परमेश्वरि, पतित पावनी
प्रति पग पयोधि-प्रक्षालित

वर वीर-व्रती वरदानी-
बल-बुद्धि-विवेक विधात्री
कवि के प्रणाम स्वीकारो
जय भारत माँ! जय-पात्री

मैं ‘राजपूत’ में देखूं
रत-अविरत रूप तुम्हारा
वर दो यश सतत जननि का
गाये यह ‘भूप’ तुम्हारा

मुंसी निपट निगुनियाँ बोल

कैसे फेल करो इसुरिया मुंसी निपट निगुनियाँ बोल।

तीनि खुराकैं दईं साल मैं सेर-सेर भरि तोल।
छठे छमाहे दूध देन तोहि लई बकरिया मोल॥

पारसाल के कनागतनु में खेरापती मंगोल।
नाहिं जिमाये तोई भराय दई दुधलपसी इक डोल॥

कचरा-फूंटैं और भुंटियाँ तो कौ दईं अतोल।
खटिया के पाये छुलवायदये चिकने और मझोल॥

मूँगफरी मटरा के होरा देती रही अतोल।
चारि छै दफै तेरे चूसन पै गन्नऊ दै दये छोल॥

पट्टी पुजी खुसी सै दओ गिर्री को रुपिया खोल।
एक मलैया मठा भेजि दओ खरी मिठाई घोल॥

पहली करी किताब खतम जौ दये धरी भरि तोल।
दियासराई बंडल लै दओ टुपिया लै दई मोल॥

कै तो इसुरियै लिखि दै फिरि सै अव्वल या डोल।
नायँ मेरे फीसनु के पैसा जल्द गाँठ सै खोल॥

फेल लिखो मेरो इसुरिया हाय रजिट्टर खोल।
पास लिखत का हाथ टूटि गए बैरी कछु तौ बोल॥

डिप्टी के आवन पै कैसे बोलै मीठे बोल।
अबकी आबैगो तो तेरी खोल देऊँगी पोल॥

नायँ मानैगो करौं बुराई तेरी घर-घर डोल।
पास करै तौ कंडा दै जाऊँ अरु इक कदुआ गोल॥

निर्धन बालक की विनती

हे भगवान टेर अब सुनिलेउ, कीजो तनिक अबरिया नायँ।
जानै कब सैं भटकि रहे हैं, सूझति कतहुँ डगरिया नायँ॥

क्षीर सिंधु मैं कबौ दूध की तुम तौ करो कदरिया नाँय।
हम इक बूँद मठा कौ तरसैं खूँटा बंधी बकरिया नायँ॥

तुम लछिमी पति हौ तुम कौ तो धन की कठिन गठरिया नायँ।
यहाँ फीस अरु कागद हूँ की हमसै होति गुजरिया नायँ॥

तुमकौ विस्नु लोक में व्यापै बरखा और बदरिया नायँ।
यहाँ फूस हू की परि पावति छत पै सहज छपरिया नायँ॥

कहत गुरु जी हरि-पितु-हित बिन मिलती गाँठि दमरिया नायँ।
कैसे पितु हौ जो निज बच्चनु की है तुम्हें खबरिया नायँ॥

तुम लड्डुन सैं भोग लगावौ हमरी तनिक खबरिया नायँ।
रोजु महाजन ताने मारै देतो कोउ उधरिया नायँ॥

बापू करैं मजूरी उनपै कोई खेत-टपरिया नायँ।
अम्मा काम करै साहुन घर तापै एक चदरिया नायँ॥

तुम रेशम के बस्तर पहिरे हम पैं फटी गुदरिया नायँ।
तुम मंदिर में ठाट करि रहे, अपनी सही बखरिया नायँ॥

तुम पै तो दस-दस बासन हैं अपने पै इक थरिया नायँ।
हमहू भूलि जाइंगे तुमकौ लेउगे अगर खबरिया नायँ॥

दमुआं के बापू पाठशाला आये

दमुआँ के बापू आज पाठशाला आये।

भरी समस्त देह खुजली से छूटे गन्दी बास
उकरू बैठ गए कुर्सी पर अध्यापक के पास

पिछौरा लटकाए।

उड़ा मक्खियाँ लट्ठ टेककर बोले लेकर साँस
भई न क्यों अब तक दमुआँ कौ एकौ पोथी पास॥

बीस दिन है आये।

कैसी करौ पढ़ाई मुंशी कैसी माँगों फीस
खतहू दमुआँ बाँचि न आबै गुजरी गए दिन बीस

नाम कौ लिखवाए।

ऐसो ढंग लगै तुमने है करी न कोसित नेक
अब इक पोथी खतम करौ तो देऊँ अठन्नी एक

और दुइ निसराये।

तीन बीड़ियाँ दे दमुआँ को बोले आगी लाउ
एक हमैं, इक मुंसी कौ दै अरु इक तू सुलगाउ

चिलम हम नाइ लाये।

हँसी आ गयी मुझको सारा क्रोध हो गया नष्ट
बोला और बैठने का अब आप न करिए कष्ट

चार बजने आये।

दमुआं के बापू पाठशाला आये

दमुआँ के बापू आज पाठशाला आये।

भरी समस्त देह खुजली से छूटे गन्दी बास
उकरू बैठ गए कुर्सी पर अध्यापक के पास

पिछौरा लटकाए।

उड़ा मक्खियाँ लट्ठ टेककर बोले लेकर साँस
भई न क्यों अब तक दमुआँ कौ एकौ पोथी पास॥

बीस दिन है आये।

कैसी करौ पढ़ाई मुंशी कैसी माँगों फीस
खतहू दमुआँ बाँचि न आबै गुजरी गए दिन बीस

नाम कौ लिखवाए।

ऐसो ढंग लगै तुमने है करी न कोसित नेक
अब इक पोथी खतम करौ तो देऊँ अठन्नी एक

और दुइ निसराये।

तीन बीड़ियाँ दे दमुआँ को बोले आगी लाउ
एक हमैं, इक मुंसी कौ दै अरु इक तू सुलगाउ

चिलम हम नाइ लाये।

हँसी आ गयी मुझको सारा क्रोध हो गया नष्ट
बोला और बैठने का अब आप न करिए कष्ट

चार बजने आये।

ग़ज़ल

बहुत मैं चाहता हूँ दर्द अंतर से नहीं जाता।
ये वह मेहमान है जो जल्द ही घर से नहीं जाता॥

तुम्हीं बस हो न मनमौजी तुम्हारा चित्र भी तो है।
किसी उर से चला जाता किसी उर से नहीं जाता॥

कहीं वह अपनी भूलों पर न लज्जित हों मेरे सम्मुख।
मैं उनके सामने अक्सर इसी डर से नहीं जाता॥

समय-कुसमय मैं जो भी देखता हूँ कह ही देता हूँ।
मैं वह बादल हूँ मित्रो जो बिना बरसे नहीं जाता॥

जो मुझसे शहर में बसने की कहते हैं वे ये सुन लें।
कोई भी हंस मोती छोड़ सरवर से नहीं जाता॥

किसी का जो न हो पाया उसे अपना बनाता हूँ।
यही आरोप है जो आज तक सर से नहीं जाता॥

अगर आएगी लेने मौत तो मैं साफ़ कह दूँगा।
‘भूप’ आता है आदर से निरादर से नहीं जाता॥

फूल और शूल

इस जग में फूलों के आगे शूलों का कोई मोल नहीं।

देखो शूलों का स्नेह निकट जब फूलों के हम बढ़ते हैं
तो शूल बिचारे लाज त्याग सब प्रकार हमें पकड़ते हैं
पर हम रोता छोड़कर उन्हें फूलों को ले ही आते हैं
फूलों को हमसे घृणा अतः आते ही मुरझा जाते हैं
फिर भी तो हम उन फूलों का तजते हैं सौरभ पान नहीं।
इस जग में फूलों के आगे शूलों का कोई मान नहीं॥

विश्व को खिलाता कृषक, उदर में क्षुधा कंठ में प्यास कसे
पर बदले में धनपतियों का मिलता है कटु उपहास उसे
है श्वान ग्राम-प्रहरी परन्तु घर-घर दुत्कारे जाते हैं
है लाल चोंच इससे तोतों को पिंजड़े में बैठाते हैं

चिकना मुँह आदर पाता है चाहे हो चिकनी बान नहीं।
इस जग में फूलों के आगे शूलों का कोई मान नहीं॥

कितनी विचित्र है बात दानदाता जग में गर्वित मन से
अनुभव करता है अपने को उच्चातिउच्च भिक्षुक जन से

दाता तो भिक्षुक को केवल लाभान्वित करता है धन से
भिक्षुक दाता को देता है यश-गौरव निज निर्धनपन से

पर कौन सोचता है दाता का भिक्षुक-सा है दान नहीं।
इस जग में फूलों से आगे शूलों का कोई मान नहीं।

बिन प्रथम चुभीली नोंक सहे अलि क्या जानेंगे मृदुता को
यह सोच फूल हित शूलों ने तन में भर डाला कटुता को
सह लिया अयश पर फूलों को दे दी सहर्ष यश की थाती
ऊपर कठोर है पर कितनी कोमल है शूलों की छाती

दुख से सुख प्रिय लगता यद्यपि दुख बिन सुख की पहचान नहीं।
इस जग में फूलों के आगे शूलों का कोई मान नहीं।

गाँव और शहर

तुम गाँव कहाये जाते हो, मैं शहर कहाया जाता हूँ।

कौन-सी वस्तु मेरी है वह जिसका कि यहाँ उपयोग न हो
कौन-सा तुम्हारा अन्न वहाँ जिसका कि यहाँ पर भोग न हो
आदान-प्रदान परस्पर बिन दोनों के पूर्ण संजोग न हो

तुम मुझमें पाए जाते हो मैं तुममें पाया जाता हूँ।

देखकर तुम्हारे साधारण परिधान यहाँ जन हँसते हैं
पर वहाँ सूट टाई मेरी लख कुत्ते भौंका करते हैं
दोनों ही एक तमाशा-सा दोनों के लिए समझते हैं

तुम यहाँ बनाये जाते हो मैं वहाँ बनाया जाता हूँ।

तुम खिंचे यहाँ पर आते हो सुनकर फ़िल्मी फैशन का स्वर
मैं मरता हूँ पनघट वाले मतवाले अल्हड़ यौवन पर
अपने-अपने से तृप्ति नहीं है असंतोष दोनों के उर

तुम यहाँ लुभाये जाते हो मैं वहाँ लुभाया जाता हूँ।

तुम कहते यहाँ लिपिस्टिक से रंजित आभा इकलौती है
गति वहाँ मचमचाती नूपुर ध्वनि देती मुझे चुनौती है
कृत्रिमता पर अधिकार नहीं ‘नेचर’ पर वहाँ बपौती है

तुम यहाँ हराये जाते हो मैं वहाँ हराया जाता हूँ।

देखकर यहाँ के रसगुल्ले तुम मुँह में पानी भर लाते
भुंटा-गड़री-गन्ने-होले हैं मुझे वहाँ पर ललचाते
दोनों ही दोनों के समीप हैं आकर्षित होकर जाते

तुम यहाँ बुलाये जाते हो मैं वहाँ बुलाया जाता हूँ।

सर्कसों, सिनेमाओं, पार्कों में होता यहाँ मनोरंजन
रस के कोल्हू-खलिहान-खेत रखते है वहाँ प्रफुल्लित मन
हैं यहाँ आर्केस्ट्रा वाले, गाँवों में लोकगीत गूँजन

तुम यहाँ रिझाये जाते हो मैं वहाँ रिझाया जाता हूँ।

तुम कहते हो नगरों में पढ़-लिखकर जीवन बन जाता है
मैं कहता हूँ गाँव तो निर्धनों को हर समय निभाता है
है नगर बढ़ाता आय, गाँव खर्चों के लिए घटाता है

तुम यहाँ सिखाये जाते हो मैं वहाँ सिखाया जाता हूँ।

विश्वास तुम्हें है नगरों में सब सुख स्वर्ग का लूटते हैं
मैं कहता हूँ गाँवों में तो छप्पर पर नोट सूखते हैं
दोनों को बड़ा बताने में दोनों ही नहीं चूकते हैं

तुम यहाँ बढ़ाये जाते हो मैं वहाँ बढ़ाया जाता हूँ

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