Poetry

भूपिन्दर बराड़ की रचनाएँ

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मेरे पुरखे (एक)

वे अड़े रहे अंत तक
खड़े रहे अपनी खुरदरी जड़ें जमाए
फ़सल कटने के बाद भी
जैसे खेतों में खड़े रहते हैं ठूंठ

वे आसानी से जाने वालों में नहीं थे
न चुप रहने वालों में

अपनी नुकीली उंगलियों
और असभ्य भाषा से
वे नोचते रहे आसमान का जिस्म
रात के अंधेरे में
कोसते रहे सख्त हुई सूखी मिट्टी को:
तुम्हीं तो थी गर्भ की गहराई-सी गीली और नर्म
तुम्ही में लुप्त हुए सैंकड़ों बीज
तुम्ही ने चुना हमें पनपने के लिए
निर्लज्ज हो जो अब चुप हो
कैसे करें यकीन कि तुम मर गयी हम से पहले

उन्होंने अंत तक किया बरसात का इंतज़ार
अंत तक कहते रहे लौटेंगे हम
इसी मिट्टी से जन्मेंगीं हमारी अगली पीड़ियां
हजारों होंगे हम जैसे जब हम नही होंगे
सीधा सरल जीवन जीने की इच्छा रखने वाले
ईमानदार और मनहूस

मेरे पुरखे (दो)

पहाड़ों-सा गहरा था मेरे पुरखों सा का रंग
बरसों तक इंतज़ार करते करते
धुंधला गयी थी उनकी आँखें

वे उठी धीरे धीरे
जब मैंने दी आवाज़:
सब नहीं लौट पाए बाबा
बस मैं बच निकला हूँ किसी तरह

मैंने सोचा, अभी उठेंगी उनकी बूढी बाहें
अभी मेरे बालों में फिरेंगी उँगलियाँ
मैंने सोचा नहीं था
चुप्पी ने उन्हें पथरा दिया होगा इस कदर

उनके कंधों से परे था
और भी गहरा अँधेरा
मैंने सोचा उसी में होगी बूढी माँ
डरी हुई, चाची और विधवा फूफी से फुसफुसाती हुई
कहाँ हैं वे सब, बाबा?
मैंने सुनी
चुप्पी से ढकी एक सिसकी

ठीक है, मत कहो कुछ
कुछ नहीं पूछूंगा, यूँ भी क्या हक़ है मुझे
बरसों बाद इस तरह बकबक करने का
तुम्हे छोड़ दुनिया जीत लेने का फितूर था मुझे
बहुत तेज़तर्रार समझता था अपने आपको

नहीं बोले कुछ भी मेरे पुरखे
या फिर बोल नहीं पाए कुछ
वे निगल चुके थे
अकेलेपन और चुप्पी के ढेरों पत्थर

फिर भी न जाने क्यों
लौटते हुए मैंने एक हाथ महसूस किया
अपने कंधे पर

वर्षों के बोझ तले

वर्षों के बोझ तले लटक गए
माँ के बूढ़े कानों में
चाँदी के पुराने झुमकों से
लटकते है तारे,
फीका पड़ गया है
आकाश का रंग

घुटनों और कोहनियों पर
बचपन में लगी चोटों की तरह
मिट रहे हैं यादों के निशान
बालू के टीलों से लुढ़कती
अपनी ही काया याद नहीं
याद नहीं रह गया है
कुछ भी अब ठीक से

बिस्तर पर लेटे
याद आते है बस दो शब्द: सो जाओ
मैली धोती में माँ की अर्धनग्न पीठ:
हो चुकी रात बहुत सो जाओ

सो जाओ कहती थी माँ
मेरी और करवट लेती हुई
छत तक उतर आये तारे
घुलने लगते थे उसकी आती जाती साँसों में
घुलने लगते थे मेरे चारों ओर
नींद का गाढ़ा पानी बनकर
शहर का शोर डूबता था उस पानी में
डूबती थीं अच्छी बुरी यादें

सो जाओ माँ कहती
और उसकी खुली आँखों में
एक चुप प्रार्थना घिरने लगती
स्वप्नहीन इन रातों में कुछ न घटे
कट जाये यह रात, सुबह हो, कुछ न घटे

कनखियों से उसे देखता
सोने का बहाना करता
मैं सचमुच सो जाता था
सब कुछ भूलकर

सुबह आती
तो गुनगुने पानी सी बहती
माँ के हाथ बन
मेरे अंगों पर फिसलती
गुसलख़ाने में
साबुन के गुबारों संग उड़ती
खिड़की से छँटकर आती धूप में
माँ का बदन
चांदी के पेड़ सा लगता

और भी बहुत कुछ
अच्छा था उन दिनों में
जिसके रहते निगली जा सकती थी
कड़वी दवाई
सहन हो जाता था
पिता जी का अचानक
फूट पड़ा गुस्सा
बस नहीं सहन होती थीं
तो माँ की डबडबाई आँखें
जिसका कारण वह
रसोई का धुआं बताती थी

सब कुछ ही तो अच्छा था उन दिनों में
फिर न जाने कहाँ से उतरी वह रात
जब माँ की जगह
मेरे साथ लेटी थी चचेरी बहन
मैं तारों से पूछ रहा था
उस रात के बारे में
जब मैं पैदा हुआ था

अचानक एक तेज़ गंध बिखरी
रात के अँधेरे में
सामने वाले कमरे में
जहाँ माँ थी, बिजली कौंधी
तारे उछले एक चीख के साथ
मेरी आँखों में चुभ गए

मैंने जाना चाहा माँ के पास
माँ नहीं थी
कहीं नहीं गयी है वह
यहीं है तुम्हारे आस पास
मेरी चचेरी बहन ने कहा
मुझे सीने से चिपकाते हुए

दुबका हुआ, सुबकता हुआ
मैं गयी रात तक लेटा रहा उसके पास
फिर न जाने कैसे
मेरे कानो में पड़ने लगी
दूर के टीलों से गुज़रती
सूखी हवा की आवाज़:
हो चुकी रात बहुत, सो जाओ

बिल्कुल तुम पर गया हूँ मैं

छोटी सी बैठक थी हमारी
फिर भी काफी थी
तुम्हारे दोस्तों के लिए
आए दिन उनकी चौकड़ी जमती
तुम्हें बातों का शौक था
उन्हें चाय का
और अनगिनत प्याले बनाती
माँ थकती कहाँ थी

एक छोटी सी दुनिया थी तुम्हारी
जिसमे बसती थीं
मुफ्त में मिलने वाली ख़ुशियाँ
झट से पूरी होने वाली आशाएं
और उन सब पर तैरता हुआ
एक अनंत विश्वास कि होनहार बेटा
जवान हो रहा है घर में

छिपाए छिपती नहीं थी
तुम्हारी खिली बांछें
तिमाही छिमाही तुम्हारे दोस्त
जब मुझे पास बुलाते
और नाटकीय ढंग से
एक सुर में दोहराते:
इस कदर तुम पर गया है यह छोकरा
कि तुम्हारा बचपन भर लगता है
फिर से जीता हुआ

तुमने यकीन किया उनका
मेरे सरल दिल पिता
मेरी आँखों में झांकते हुए
कहाँ जान पाए तुम
कि खाना खाकर निकलूंगा
तो मैं लौटूंगा नहीं एक रात

सोचता हूँ
मौक़ा मिलता तो बताता तुम्हे
कितनी भयावह थी वह रात
एक ख़त्म न होने वाली गली थी
संकरी,अँधेरी और उमस भरी
जिससे गुज़रते मैं लड़खड़ाया कई बार
मेरा पीछा कर रही थी लगातार
एक सुबकी जो माँ की रही होगी
तुम्हें सुबकना नहीं आता था
द्वितीय विश्व युद्ध के साहसी योद्धा
और एक गुमसुम हुए आदमी की
आवाज़ नहीं जाती दूर तक

सोचता हूँ
मौका मिलता तो कहता
न आवारा था मैं न अहसान फरामोश
सिर्फ संतान था ऐसे युग की
जिसमे घर छोड़ना लगता था लाज़मी
गर दिमाग में पनपने लगें
अस्तित्व और अस्मिता के सवाल

हालाँकि बहुत दूर तक नहीं चले
यह सवाल
सब सूख कर मुरझा गए
झुलसे हुए शहरों में
फिर बचीं तो अस्थाई नौकरियां
असहाय अजनबी औरतें
प्यार का नाटक करतीं हुईं

यह कोरा अड़ियलपन था मेरा
या खून में मिली
हार न मानने की जिद
कि मैं निकला तो चलता चला गया
मरुस्थल की सूखी हवा में
थपेड़ों को सहता हुआ

जब भी मौका आया गाहे बगाहे
थम कर सांस लेने का
तो पाया कि ऐसा करने के लिए भी
चाहिए थी चतुराई या शुद्ध कला
दोनों ही नदारद थीं जो
मेरे संस्कारों में

सोचता हूँ
तुम होते तो कहता
बाबा मैं भी थकने लगा हूँ अब
ढीले पड़ने लगे हैं कदम
मैं भी आ पहुंचा हूँ
उम्र के उस मोड़ पर
जहाँ वक्त की घंटी
सुनने लगती है साफ़ साफ़
और मन में सहसा उठने लगती है
कसक लौट जाने की

जानता हूँ
यह सब सोचना भी व्यर्थ है
जब तुम्हारी चौदहवीं पुण्यतिथि भी
निकल चुकी है मेरे बगैर

मैं चौदह से थोड़ा ही बड़ा तो था बाबा
जब मैं घर छोड़ कर निकला था उस रात

वापसी

उखड़ी नींद और ठिठुरन लिए
पुराने जंग लगे चाकू सी
रेल गुज़रती है कोहरे से
गुज़रती है चीख़ती हुई
पलकविहीन पत्थरों के बीच
दिसंबर आने से पहले जो पानी थे
नीला साफ़, थरथराता हुआ

मैं आता हूँ
खून से लथपथ चादर पर लेटे
अपने पिता के क़रीब
आता हूँ
अपने अजन्मे बच्चे की माँ से बहुत दूर
दुकानों की चमकती खिड़कियों के सामने
जहाँ वह मंडराती होगी अविश्वस्त क़दमों से
बहुत दूर उस महानगर से
एक आशाहीन रिश्ते में फंस गया था जिससे
उस सब से बहुत दूर

मैं आ गया हूँ
जूतों के गीले तलुओं में
लगभग भूल चुके प्लेटफ़ार्म को महसूस करता
मुझे छूता है स्टेशनमास्टर का बंद कमरा
छूती है बाहर लगी बंद बड़ी घड़ी
जो कुली यहाँ नहीं हैं, वे सब
अपने ठंडे हाथों से
मुझे थपथपाते हैं

मैं आ ही गया उसी क़स्बे में
जिसे जागना बाक़ी है अभी
उठो, देखो तो, मैं आ गया हूँ
तुम सो जाते हो शाम छह बजे
और उठते नहीं अगली दोपहर तक
उठो, अपना झुर्रियों भरा मुंह खोलो
जमाई लो
मुझे देखो
मैं आ गया हूँ तुम्हारे बीच
तुम्हें जानता हुआ

पुराना क़स्बा सो रहा है

सिर्फ टिकट कलेक्टर
अपना मैला हाथ बढ़ाता है ऊंघता हुआ
मटमैली दाढ़ी नहीं थी उसकी
जब मैं छोड़ गया था
नहीं जाने दिया था उसने
मुझे अपने तेहरवें वर्ष में
पीट निकाला था शंट किये डिब्बे से
जिसके चलने का मुझे इंतज़ार था
भूख से मैं बेहाल था
मुझे उसके चलने का इंतज़ार था

चलने के लिए आगे बढ़ते हैं रिक्शे वाले
मुझे कहीं भी ले जाने को तैयार
कहाँ चलना है बाबूजी
वे सब पूछते हैं
जाना कहाँ है
पानी की टंकी वाले क्वार्टरों में साहब?

इत्ती बड़ी लगती थी पानी की टंकी
हमेशा चूती रहती
दूर तक सुन पड़ती थी उसकी
टपटप की आवाज़ गर्म रातों में
पिता के साथ सैर के लिए मैं जब निकलता था

छावनी, छावनी, छावनी
रिक्शे वाले चिल्लाते हैं
छावनी के रास्ते में बरगद का पेड़ था
आधी रात जहाँ भूतों का बसेरा होता
भूत उस युवा पत्नी का
जिसकी हत्या कर दी गयी
भूत उस हत्यारे सैनिक का
जिसने आत्महत्या की दूसरी गोली से
भूत बसते थे
और वहां कोई नहीं जाता था
सिर्फ आवारा कुत्ते वहां सोते थे
गर्मियों की दुपहरियों में

मैं उन्हें कहता हूँ चला जाऊंगा मैं
मुझे नहीं चाहिए कुछ भी, तुम जाओ
ठंड में डबडबाई आँखों से
मैं कहता हूँ – जाओ !

मैं आता हूँ शहर के द्वार पर
न राजा रहे न द्वारपाल
आज़ादी का परचम यहाँ फ़हराया था
वह भी नहीं

सो रहा है शहर
अँधेरी सुनसान सड़क पर
अपने क़दमों की आवाज़ सुनता
मैं ठिठकता हूँ शहर में घुसते हुए

कमेटी के नल के नीचे उस नुक्कड़ में
एक पागल ठिठुरता हुआ नहाता था
अपनी हंसी और रोने से
हम बच्चों को बहुत डराता था
हम भाग कर पार करते थे यह नुक्कड़
कमेटी का नल अब जहाँ नहीं है

मैं गुजरता हूँ स्कूल के सामने से
जो नहीं है
मैं देखता हूँ जेबों में हाथ डाल
जेबों में चिपचिपी गच्चक नहीं है
नहीं हैं रंगों के खड़ियां

गाड़े नए रंगों में पोत दिया गया
बस बचा है पुराना घंटाघर, झुका हुआ
बुआ की शादी पर नए वस्त्रों में झेंपते
लाठी पर झुके मेरे दादा की तरह

चीज़ें रुकती नहीं बाबा
बहुत कुछ बदल जाता है
अगर मैं खो नहीं गया हूँ
तुम्हारी याददाश्त की
धुंधली होती गलियों में
तो बदल गए उस सब में से एक
मुझे स्वीकार करो

घर के सामने मैं रुकता हूँ सर झुकाए
फिर दरवाज़ा खटखटाता हूँ तीन बार
सांस रोके सुनता हूँ दूसरी ओर
जैसे माँ के बूढ़े क़दमों की आवाज़

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