मंगलेश डबराल की रचनाएँ

अन्तराल

हरा पहाड़ रात में
सिरहाने खड़ा हो जाता है
शिखरों से टकराती हुई तुम्हारी आवाज़
सीलन-भरी घाटी में गिरती है
और बीतते दॄश्यों की धुन्ध से
छनकर आते रहते हैं तुम्हारे देह-वर्ष
पत्थरों पर झुकी हुई घास
इच्छाओं की तरह अजस्र झरने
एक निर्गंध मृत्यु और वह सब
जिससे तुम्हारा शरीर रचा गया है
लौटता है रक्त में
फिर से चीख़ने के लिए ।

अनुपस्थिति

यहाँ बचपन में गिरी थी बर्फ़

पहाड़ पेड़ आंगन सीढ़ियों पर

उन पर चलते हुए हम रोज़ एक रास्ता बनाते थे

बाद में जब मैं बड़ा हुआ

देखा बर्फ़ को पिघलते हुए

कुछ देर चमकता रहा पानी

अन्तत: उसे उड़ा दिया धूप ने ।

( रचनाकाल : 1996)

 

अभिनय

एक गहन आत्मविश्वास से भरकर
सुबह निकल पड़ता हूँ घर से
ताकि सारा दिन आश्वस्त रह सकूँ
एक आदमी से मिलते हुए मुस्कराता हूँ
वह एकाएक देख लेता है मेरी उदासी
एक से तपाक से हाथ मिलाता हूँ
वह जान जाता है मैं भीतर से हूँ अशांत
एक दोस्त के सामने ख़ामोश बैठ जाता हूँ
वह कहता है तुम दुबले बीमार क्यों दिखते हो
जिन्होंने मुझे कभी घर में नहीं देखा
वे कहते हैं अरे आप टी०वी० पर दिखे थे एक दिन

बाज़ारों में घूमता हूँ निःशब्द
डिब्बों में बन्द हो रहा है पूरा देश
पूरा जीवन बिक्री के लिए
एक नई रंगीन किताब है जो मेरी कविता के
विरोध में आई है
जिसमें छपे सुन्दर चेहरों को कोई कष्ट नहीं
जगह जगह नृत्य की मुद्राएँ हैं विचार के बदले
जनाब एक पूरी फ़िल्म है लम्बी
आप ख़रीद लें और भरपूर आनन्द उठाएँ

शेष जो कुछ है अभिनय है
चारों ओर आवाज़ें आ रही हैं
मेकअप बदलने का भी समय नहीं है
हत्यारा एक मासूम के कपड़े पहनकर चला आया है
वह जिसे अपने पर गर्व था
एक ख़ुशामदी की आवाज़ में गिड़गिड़ा रहा है
ट्रेजडी है संक्षिप्त लम्बा प्रहसन
हरेक चाहता है किस तरह झपट लूँ
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार ।

रचनाकाल : 1990

 

अशाश्वत     

सर्दी के दिनों में जो प्रेम शुरू हुआ
वह बहुत सारे कपड़े पहने हुए था
उसे बार-बार बर्फ़ में रास्ता बनाना पड़ता था
और आग उसे अपनी ओर खींचती रहती थी
जब बर्फ़ पिघलना शुरू हुई तो वह पानी की तरह
हल्की चमक लिए हुए कुछ दूर तक बहता हुआ दिखा
फिर अप्रैल के महीने में ज़रा-सी एक छुवन
जिसके नतीजे में होंठ पैदा होते रहे
बरसात के मौसम में वह तरबतर होना चाहता था
बारिशें बहुत कम हो चली थीं और पृथ्वी उबल रही थी
तब भी वह इसरार करता चलो भीगा जाए
यह और बात है कि अक्सर उसे ज़ुकाम जकड़ लेता
अक्टूबर की हवा में जैसा कि होता है
वह किसी टहनी की तरह नर्म और नाज़ुक हो गया
जिसे कोई तोड़ना चाहता तो यह बहुत आसान था
मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि यह प्रेम है
पतझड़ के आते ही वह इस तरह दिखेगा
जैसे किसी पेड़ से गिरा हुआ पीला पत्ता।

 

वर्णमाला

एक भाषा में अ लिखना चाहता हूँ
अ से अनार अ से अमरूद
लेकिन लिखने लगता हूँ अ से अनर्थ अ से अत्याचार
कोशिश करता हूँ कि क से क़लम या करुणा लिखूँ
लेकिन मैं लिखने लगता हूँ क से क्रूरता क से कुटिलता
अभी तक ख से खरगोश लिखता आया हूँ
लेकिन ख से अब किसी ख़तरे की आहट आने लगी है
मैं सोचता था फ से फूल ही लिखा जाता होगा
बहुत सारे फूल
घरो के बाहर घरों के भीतर मनुष्यों के भीतर
लेकिन मैंने देखा तमाम फूल जा रहे थे
ज़ालिमों के गले में माला बन कर डाले जाने के लिए

कोई मेरा हाथ जकड़ता है और कहता है
भ से लिखो भय जो अब हर जगह मौजूद है
द दमन का और प पतन का सँकेत है
आततायी छीन लेते हैं हमारी पूरी वर्णमाला
वे भाषा की हिंसा को बना देते हैं
समाज की हिंसा
ह को हत्या के लिए सुरक्षित कर दिया गया है
हम कितना ही हल और हिरन लिखते रहें
वे ह से हत्या लिखते रहते हैं हर समय ।

लीजिए अब यही कविता अँग्रेज़ी में पढ़िए

Mangalesh Dabral
The Alphabet

I want to write the letter A in a language
A for Apple A for Apricot
but I start writing A for adversity A for Atrocity

I try writing B for bat or B for benevolence
but I end up writing B for brutality B for betrayal

Up until now I’ve been writing C for cat
but now C has the sound of a catastrophe in wait

I used to think D must be for daisies
lots and lots of daisies
outside houses inside houses and inside humans

but I saw that all the flowers were being carried away
to become garlands that would adorn the wicked

Someone grabs my hand and says
Write F for fear which is present everywhere

I stands for injury and L for lapse
despots snatch away our complete alphabet
they turn language into violence
society’s violence

M has been reserved for Murder
no matter how much we write Mop and Moose
they keep writing M for Murder all the time

— translated from the Hindi by Sarabjeet Garcha

एक लोकगीत सुनकर

वह बहुत मीठी धुन थी
दूर से एक स्त्री का स्वर गूँजता हुआ आता था
सुरीला सुखद और मार्मिक
ज़रूर वह लम्बे समय तक सँगीत सीखती रही होगी
मर्म पर छपते उन स्वरों के शब्द
आर्तनाद से भरे हुए थे
हे दीनानाथ मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करो
हे पाँच नामों वाले देवता इस बस्ती के नारायण
स्वीकार करो मेरे ख़ाली हाथों का यह नैवेद्य
मैं सुनती रहती हूँ सास-ससुर घर के लोगों के कुबोल
पता नहीं कहाँ से पुरखे चले आते हैं
और ताने देकर चले जाते हैं
पता नहीं किस गुनाह की सज़ा मुझे मिलती है

दूर से आ रही थी वह ध्वनि
नज़र नहीं आती थी उसकी गायक
लगता था सभी स्त्रियाँ उसे गा रहीं हैं
बिना चहरे की नामहीन
बहुत मीठी थी वह धुन
लेकिन उन शब्दों में भरी थी एक स्त्री की दासता
एक कातरता एक अभागेपन की ख़बर
वह गायन एक साथ मुग्ध करता और डराता था

स्त्रियाँ मीठे स्वरों में बाँचती हैं अपनी व्यथा
अपने अभागेपन की कथा
उसके भयानक शब्दों को सजाती-सँवारती हैं
उनमें आरोह-अवरोह-अलँकार के बेल-बूटे काढ़ती हैं
ताकि वे सुनने में अच्छे लगें
पूछती हैं दीनानाथों से
बताओ कौन से हैं मेरे गुनाह
जिनके लिए दी जा रही है मुझे सज़ा
दीनानाथ कोई जवाब नहीं देते
उनका यह अभागापन अलग से है ।

Share