मंसूर उस्मानी की रचनाएँ

इस शहर में चलती है हवा और तरह की

इस शहर में चलती है हवा और तरह की
जुर्म और तरह के हैं सज़ा और तरह की

इस बार तो पैमाना उठाया भी नहीं था
इस बार थी रिंदों की ख़ता और तरह की

हम आँखों में आँसू नहीं लाते हैं कि हम ने
पाई है विरासत में अदा और तरह की

इस बात पे नाराज़ था साक़ी कि सर-ए-बज़्म
क्यूँ आई पियालों से सदा और तरह की

इस दौर में मफ़्हूम-ए-मोहब्बत है तिजारत
इस दौर में होती है वफ़ा और तरह की

शबनम की जगह आग की बारिश हो मगर हम
‘मंसूर’ न माँगेंगे दुआ और तरह की

आँखों से मोहब्बत के इशारे निकल आए

आँखों से मोहब्बत के इशारे निकल आए
बरसात के मौसम में सितारे निकल आए

था तुझ से बिछड़ जाने का एहसास मगर अब
जीने के लिए और सहारे निकल आए

मैं ने तो यूँही ज़िक्र-ए-वफ़ा छेड़ दिया था
बे-साख़्ता क्यूँ अश्क तुम्हारे निकल आए

जब मैं ने सफ़ीने में तिरा नाम लिया है
तूफ़ान की बाहोँ से किनारे निकल आए

हम जाँ तो बचा लाते मगर अपना मुक़द्दर
इस भीड़ में कुछ दोस्त हमारे निकल आए

जुगनू इन्हें समझा था मगर क्या कहूँ ‘मंसूर’
मुट्ठी को जो खोला तो शरारे निकल आए

गुलशन में ये कमाल तुझे देख कर हुआ

गुलशन में ये कमाल तुझे देख कर हुआ
फूलों का रंग लाल तुझे देख कर हुआ

मुद्दत के ब’अद आज मिले हैं तो जान-ए-मन
दिल को बहुत मलाल तुझे देख कर हुआ

आओ हम आज चाँद का क़र्ज़ा उतार दें
तारों को ये ख़याल तुझे देख कर हुआ

ख़ुशबू से किस ज़बान में बातें करेंगे लोग
महफ़िल में ये सवाल तुझे देख कर हुआ

अश्कों से जब लिखेंगे ग़ज़ल तब सुनाएँगे
इस दिल का जो भी हाल तुझे देख कर हुआ

 

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