मधुछन्दा चक्रवर्ती की रचनाएँ

रिश्तें

रिश्तों के कई रंग होते हैं,
कुछ नाम के, कुछ बेनाम।
पर सबको पड़ता है निभाना
क्योंकि यही दुनिया का दस्तूर है।
और कुछ रिश्तें ऐसे होते हैं,
जैसे चलती बस की खिड़की
से देखों तो छूटते नज़ारे जैसे।
इन रिश्तों को निभाने में
सबका दिल तो रखना पड़ता है
पर सच है कि
इनको निभाने में दिल कई बार
टूटते हैं
कितना बड़ा सच है ये
पर समझते नहीं, कितने अजीब होते हैं
रिश्तें।

बचपन से आज तक

बचपन से आज तक,
जिन्दगी को कितने रंगों में
बदलते देखा।

टॉफ़ी पर ललचाती आखों को देखा,
किताबों से जी को चूराते देखा
और देखा
घने बेर के पेड़ पर चढ़ते अपने आप को।

रात को रोशन करते सितारों को देखा,
तो सुबह की पहली किरण में चमकते
हुए ओस की बूंदों से भीगे पत्तों को देखा।

और उछलते कदमों को
अपनी मन्ज़िल की तरफ बढ़ते देखा।

रात को इंतज़ार करती आँखों को देखा,
सुबह हर काम की जल्दी मचाती हुई
ज़ुबान को सुना।

पानी की धारा में
बह जाते हुए हर ख़्याल को पढ़ा,
खुशबू को समेटकर लाती हुई हवा को छूआ
बारिश की बूंदों में भीगकर अपनी तृष्णा को हरा,
आग की तपन से ठण्ड को दूर किया
चांद की रोशनी में नहा के यौवन को पुकारा।

ऑफ़िस के काम के बोझ को लेकर
दौड़ते बाबुओं को देखा,
और होली-दिवाली पर मदमस्त होकर थीरकते देखा
राइफ़ल उठाकर परेड पर जाते जवानों को देखा
तो कभी शराब में सराबोर होकर
उन्हें ही लड़खड़ाते देखा।

भागा को देखा जो भाग गई
रूबी को देखा जो पागल-सी हो गई
शर्मा को देखा जो तेज़ और चालाक था
शतरंज में जो एक मंत्री था।

भीख मांगती बूढ़ी मैया को देखा
उसके मुरझाये गालों को देखा
छोटे-छोटे कदम, लकड़ी के सहारे चली आती थी
आटा, मैदा या चावल जो भी मिलता था,
संतोष से ले जाती थी
न जाने
कब वह आएगी
हर पल उसका इंतज़ार किया
पर एक दिन वह नहीं आयी
फिर वह कभी नहीं आयी।

इन बातों में एहसास को संग लिए मैं
कब बड़ी हुई इसका

एक दिन

एक दिन
कैसे बीत जाता है?
ये अक्सर सोच में किसी के नहीं आता है
एक दिन जो यूँ ही बीत जाता है

सूर्योदय से दिन की शुरूआत
सूर्यास्त से दिन का अन्त
बस ‘इतनी-सी बात’ ही सबके सामने रह जाती है
पर ये एक दिन
कैसे बीत जाता है?
ये अक्सर सोच में किसी के नहीं आता है
एक दिन जो यू ही बीत जाता है

एक दिन कोई काम की तलाश में बीतता है
एक दिन भूख को मिटाने में बीतता है
एक दिन सवालों के जवाब ढूँढने में बीतता है
एक दिन उलझनों को सुलझाने में बीतता है

एक दिन सच को सामने लाने में बीतता है
एक दिन झूठ को खत्म करने में बीतता है

एक दिन बिखरे चीज़ों को समेटने में बीतता है
एक दिन कुछ चीज़ों को, खयालों को, सपनों को
सवारने में बीतता है
एक दिन
जो सपने को सच करने की कोशिश में बीतता है

एक दिन किसी को याद करने में बीतता है
एक दिन किसी के ख़यालों में बीतता है

एक दिन इसी तरह से बीतता है
हमारे सामने से,
पर अक्सर हमारे ही सोच में नहीं आता है
एक दिन जो हमारे सामने से बीतता है।

पता न चला आज तक
पर सुहाना-सा सफ़र था ये मेरा
जो किया मैने बचपन से आज-तक।

 

भूख

अनिश्चित जीवन में
निश्चित माया।
विचार मग्न मन,
पर दुर्बल काया।

झुकी रीढ़ की हड्डी,
पर झुकी न जीवन जीने की आशा।
चले जा रहे अनिश्चित पथ पर,
पर नहीं निश्चित है ठौर-ठिकाना।

हाथ उठाकर आशीश देते हैं,
मांगते केवल दो मूठ चावल।
भूख की तड़पन है मुख पर,
पर वाणी है निश्छल।

सड़क का किनारा है संसार इनका,
सड़क पर व्यतीत है जीवन इनका,
साथी बना है दुर्भाग्य इनका,
पर नहीं है निर्बल मन इनका।

मुर्झाए चेहरे पर अब भी है जीने की लालसा,
पर बनाया हमने ही इन्हें भिखारी।
जो हमें आज—तक देते आए हैं दुआएँ इतनी,
क्यों इनके लिए हमारी मानवता हारी?

कभी जीवन इनका भी बीता होगा,
सुखमय, सुदृढ़, सुयौवन।
पर नियति का भी खेल अजीब
जाना पड़ा इन्हें ही वन।

वन कैसा?
भीड़-भाड़ लोगों से भरे जंगल
धुआँ उड़ाते वाहन।
सिंह नाद से भी भयंकर मशीनों के गर्जन।
जहाँ भावना, सम्मान बह जाती नयनों से
दूसरों की दी गाली से।
जहाँ पूँजीपतियों का झुण्ड है,
सत्ता पर बैठे शेर की फैकी झूठन को खाने के लिए।
जो निर्बल, कोमल सीधे मानवों को
फाँसते अपनी नीति से।
जहाँ मिल बाँट खाते हैं रिश्वत की रोटी लिए।

वन
जहाँ केवल स्वार्थ जीता है,
मरता है परोपकार उसके पंजों के प्रहार से
जहाँ कर्म ही कर्म से टकराता है।
जहाँ विचार ही विचार से टकराता है।
जहाँ बदलते हैं पल-पल में दल
हो जैसे वह विहगों का दल
बदले जो मौसम में अपना घर।
ऐसे वन में आकर
इन बूढ़ी हड्डियों का जीवन संग्राम फिर शुरू होता है,
पर अब उसमें अंतर-ही-अंतर है।

सर से पाँव तक
परिश्रम की बूँद ही साक्षी।
पर नहीं है संतुष्टि मोटे मालिकों को
जितना कर पाए इस उम्र में भी,
क्या जाएगा अगर मिल जाए उतने की ही मजदूरी?
पर दिखा रहे उन्हें काम में हुई खामियाँ,
बता रहे वे बहाना न देने का कहकर अपनी मजबूरी।

ठोकर खाते,
लड़खड़ाते कदम,
फटे कपड़े,
और मुह में दम
भिक्षा कि झोली लिए,
घर-घर जाते हैं।
दो मूठ चावल की बस दया मांगते हैं।
हाथ उठाकर आशीष देते हैं।
भूख की क्या मजबूरी देखो,
क्या-क्या दिन दिखलाता है।

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