मधु संधु की रचनाएँ

मेरी उम्र सिर्फ उतनी है

मेरी उम्र सिर्फ़ उतनी है
जितनी
तुम्हारे साथ बिताई थी
तब
जब तुम आज़ाद थे
शहज़ादा सलीम थे
मजनूँ फ़रहाद थे
रांझा महिवाल थे
पुरुषीय अहं से
परिवार-समाज से
बड़े-बड़े झूठों से
बिल्कुल अनजान थे।

मेरी उम्र सिर्फ़फ उतनी है
जितनी
मैंने
तुम्हारे हरम में आने से पहले
मनाई थी
कालेज केन्टीन में
कॉफी के धुएँ में
लेट नाइट चैटिंग में।
बहसें-तकरार थे
समस्या-समाधान थे
तेरे और मेरे के
झंझट न झाड़ थे।

मेरी उम्र सिर्फ़ उतनी है
जितनी में
मान-सम्मान था
निर्णय की क्षमता थी
नेह-विश्वास था
साँचों में ढलने की
शर्तें प्रतिमान न था
जा-जा कर लौटते थे
मैंने नहीं खींचा था
आते -बतियाते थे
सचमुच में चाहते थे।

मेरी उम्र सिर्फ़फ उतनी है
जितनी अनामिका की अंगूठी से
सिंदूरबाजी से,
मंगल सूत्र धारणा से पहले
घूँट-घूँट पी थी।
व्यक्ति से वस्तु बनने
तुम्हारी अचल सम्पत्ति में ढलने
गुस्से, रतजगों, आँसुओं में घुलने
विरोधाभासों में जीने
व्यक्तिवाचक से शून्यवाचक हो जाने से पहले
स्वप्न लोक में जी थी।

तब
एक सहलाता अकेलापन था
मीठी वेदना थी
प्रेम का भ्रम था
पाने की चाह थी
पहचाना अपरिचय था
वज्र विश्वास था
सुखद प्रतीक्षा थी
भविष्य का सूर्य था
क्यों तोड़ दिए सारे सपने नींद सहित तुमने।

आकांक्षा

इतिहास की क़ब्रों में दबे हुए
पृष्ठ कहते हैं कि
जन्म होते ही मेरा
गला दबा देते थे।
पलंग के पाए तले रखकर
पितृसत्ताक के सत्ताधारी
उस लोक पहुँचा देते थे।

एक ज़र्रा हशीश
तिल भर अफीम
या
एक कण विष देकर
मेरा इहलोक सँवार देते थे
क्योंकि वे जानते थे
कि
इहलोक दुखों से भरा है
और
मेरा कोमल मन
कोमल गात
उन दुखों से जूझ नहीं पाएगा।

वे जानते थे
कि मैं
पुराण-कथाओं की तरह
अपने सत्यवान के लिए
चार सौ साल की
उम्र नहीं मांग पाऊंगी
इसीलिए मुझे
धधकती चिता में
आत्मदाह करना होगा।

उन्हें पता था
कि धरती की बेटियाँ
सीता माता की तरह
अग्नि परीक्षा नहीं दे सकती।
मेरे संरक्षक और शुभचिंतक
इस तरह मुझे
स्वर्गारोहण का
सुरक्षा कवच देते थे।

ऐसे सुरक्षा कवच
आज भी
मिल रहे हैं मुझे।

वैज्ञानिक उपलब्धियों ने
भूण-हत्याओं का आविष्कार करके
मुझे पितृसत्ताक दुखों के
उस पार जा फेंका है।

आकांक्षाएँ
युगों से पूरे विश्व में
पूरी होती रही हैं मेरी
पर
पिता, भाई, पुत्र के माध्यम से।

लेकिन
आज मैंने उनके माध्यम से
उच्चाकांक्षाओं की पूर्ति के
स्वप्न देखने बंद कर दिए हैं।

चिर दमित आकांक्षाएँ पनपती हैं-
मेरी सोलह वर्षीय आकांक्षा है
कि
मैं फेमिना से
मिस इंडिया चुनी जाऊँ।

मिस वर्ल्ड और मिस यूनीवर्स बनकर
विज्ञापन की दुनिया में
परचम उड़ाऊँ।
केवल चैनल्ज की दिव्य दृष्टि से
हर अनजाने कोने में पहचानी जाऊँ।

मेरे अंदर बैठी
वैज्ञानिक स्त्री की आकांक्षा है
कि सुनीता विलियम्स बन
सातवें आसमान की
बुलंदियों को छू आऊँ।

या फिर
राजकुमारी डायना बन
गरीबों अनाथों को कपड़े बाँटूँ।
हिलेरी क्लिंटन बन
देश-विदेश की सैर करूँ।

इंदिरा गांधी बन
राजनीति का संचालन करूँ।
बिजनेस मैगनेट बन
विश्व बाजार की ऊठक-बैठक कराऊँ।

सतरंगे स्वप्न पूरे करके भी
मेरे पैर
धरती पर
जमे रहें
जमे रहें…

महारावण

तामसी शक्तियों का बल
मुझे आतंकित करता है।
रावण कभी नहीं मरते
पाप कभी नहीं ढलते
बुराई अनन्त है।

मुझे पता है
रावणों के भाग्य में महाकार है
गगनचुम्बी ऊँचाई है
दस तरह की बातें करने के लिए
दस मुख
खुराफातें सोचने के लिए
दस सिर
संहार के लिए
बीस राक्षसी हाथ हैं।

कितना बड़ा झूठ है
कि
रावण मरते हैं ?
उन्हें मारने के लिए
राम की नहीं
महारावण की
आवश्यकता है।

मुझे विश्वास है
ईश्वर, प्रभु, परमेश्वर
कि तुम राम नहीं हो
रावण के सगेवाल हो
तुमने
रावण से महाकार
दुख भेजकर
अपने लिए
प्रेम- भक्ति
उपासना- श्रद्धा
बटोरी है।

तुमने सिर्फ
लेना ही सीखा है
तुम कैसे पाप, दुख, दर्द का
उन्मूलन कर सकते हो ?
फिर दुनिया
तुम्हें भूल न जाएगी ?
धरती के रामों की सुरक्षा के लिए
महाराव

प्रसन्न वदन अमलतास

तिमंज़िले को छूता
मेरे आँगन का
प्रसन्न वदन अमलतास
हर साल
पतझड़ की घोषणा से
हो जाता है उदास।

बिन पत्र, बिन फूल, बिन फल
आँगन का छिन जाता सारा उल्लास।

अमलतास!
कैसे कोई समझे तुझे
ऋषियों की माया हो
बच्चे से नटखट हो
गिरगिट से दलबदलू।
कभी कनक-पीत चंदोवा फैलाते हो
कभी धूप-बारिश से राहत दिलाते हो
कभी हड़ताल पर रूठे-रूठे जाते हो।
छाया दे घनी सघन
सबका मन मोहते हो
पंछी है, घोंसला है
बड़प्पन, संरक्षण है
फूल, फल, औषधि है
फिर भी तुम एक बार पतझड़ क्यों चुनते हो।

कैसे मन लगता है
कैसे मन तपता है
दो-चार बौछरों से
गदगद हुए जाते हो
उन्मत्त उन्मादों में सरगमलय गाते हो
हौले शरमाते हो
लहलहाते पल्लव दल
रौनक लौटाते हो

धन्यवाद, अमलतास।

ण भी रच दो प्रभु।

 

Share