मनोज पाण्डेय की रचनाएँ

बाबर

तुमने अपने बेटे से
अपने लिए
उसकी जवानी नहीं मांगी
न ही
उसे चौदह क्या, दो दिन के लिए भी
दिया वनवास
कि निभ जाये, तीसरी पत्नी को दिए
“प्राण जाए पर वचन न जाए”
की कुल रीति

न ही
बुढौती में उठने वाली
वासना की छणिक कौंध में;
अपने बेटे से करवाई
भीषण प्रतिज्ञा

न ही
जिंदगी के बाकी बचे दो चार दिनों न
में ‘जनम-जनम का साथ निभाने’ आई
चौथी-पाचवीं… पत्नी के बहकावे में
अपने बेटे की आँखों में
उसके अपने हाथों से
गर्म सलाखें डलवाई

मैं…
न अशोक
न शांतनु
न दशरथ
और
न ही ययाति

मैं…
तुम्हारी तरह पिता होना
चाहता हूँ
बाबर

गाँधी! कैसे गए थे चंपारण

(बिहार जाने वाली ट्रेनों के जनरल बोगी में यात्रा करने वालों के प्रति)

पहली बार
चम्पारण
किस ट्रेन से गए थे
गाँधी?
‘सत्याग्रह’ पकड़ी थी, तो
गोरखपुर उतरे या
छपरा
आम्रपाली थी तो
कितनी लेट

तीसरे दर्जे के डिब्बे में
जगह पाने के लिए
गाँधी! कितने घंटे पहले
स्टेशन पर आ गए थे
तुम?
लाइन में कितनी देर खड़ा रहना पड़ा था?
कस्तूरबा भी रही होंगीं
एक बेटे को गोदी उठाए
और दूसरे की अंगुली पकडे
मोटरी-गठरी भी रही होगी साथ
लाइन सीधी कराने में
आर.पी.यफ. के सिपाही ने
कितनी बार डंडे फटकारे थे?
गालिओं की गिनती नहीं की होगी
तुमने?

शायद
योग भी करते थे तुम
हाँ, बताओ मूत्रयोग
में कितनी पीड़ा हुई थी
पादते-गंधाते लोगों के
बीच!
तीसरे दर्जे के आदमी को
अपनी पेशाब रोकने में
महारत हासिल होती है ना!

टिकट होने के बाद भी
जी.आर.पी. और टी.टी. बाबू को
कितने रुपये दिए थे?
टिन के डब्बे के साथ
कपडे के थैले का अलग
हिसाब भी तो जोड़ा
होगा टी.टी. बाबू ने

गाँधी!
तुम्हारा तीसरा दर्जा
सत्याग्रह, जननायक
सम्पूर्णक्रांति, सप्तक्रांति
सदभावना, वैशाली
और न जाने कितनी ट्रेनों
के जनरल डिब्बों से कितना
मिलता था

कभी मिलें तो
बताना!

भगवान! तुम्हारे घर बेटी पैदा नहीं होती?

तुम
ये तो मानोगे
अपनी इच्छा से ही लिया
हर बार… अवतार
तुम्हारी इच्छा के आगे
किसी और की क्या बिसात?

खैर
अपने अवतार-रूप में
तुमने
लीला की;
रास-लीला की
कई बार;
कई-कई किये विवाह
बच्चे भी तुम्हारी इच्छा से पैदा हुए होंगे
जाहिर है
हैं ना भगवन!

इन बच्चों में कोई बेटी क्यों न हुई?
हे सर्वज्ञ
पहले ही पहचान जाते थे
या
रोपित नही करते थे
जरूरी गुणसूत्र
जानबूझ कर?

क्या हुआ भगवन?
चुप क्यों हो गये?

लिंगबोध

(पुनर्रचित कविता)
फिर से तय किया लाजमी है
जरूरी है
तय किया अलग करना नहीं
बल्कि बराबरी है
कि आपके हिस्से में
क्यों रहे
“दिन होता है”
और मेरे हिस्से में
“रात होती है”
क्यों न कुछ दिन
तुम्हारे हिस्से में
“रात होता रहे”
और मेरे हिस्से
“दिन होती रहे”
बराबरी के लिए लड़ने वाले
इस समय में
व्याकरण में भी
अब शब्दों के ‘लिंग-बोध’ भी
तय किया जायेगा
बराबरी के लिए लड़ने वालियों के हिसाब से

बिकाऊ समय

खरीद लो
या
बिक जाओ

यही दो अनिवार्य शर्त है…
इस बिकाऊ हो चुके समय की

घर की रद्दी से लगायत
घर की कोख तक की
कीमत लग जा रही है!

आप चाहें तो
अपने:
गुर्दे, लीवर, खून, रेटिना, चमड़ी
स्स्ब्को बिकने के लिए सजा सकते है
यहाँ तक की दिमाग भी,कई बार
अच्छी कीमत दे जाता है

जिस समय में
हर चीज कोई न कोई
कीमत दे जा रही है
उस महान बिकाऊ समय में
आपकी हैसियत
और अहमियत!
आपके बिकाऊ मूल्य पर
तय हो रही है
क्या खराबी है?
(यह पक्की दुनियादारी है)
आपके हाथ भी तो
अपनी कीमत लग जा रही है

जो जीते जी ही नही
मरते दम तक नही
बिके ऽऽऽऽऽ
उनको भी यह महान बिकाऊ समय
चप्पल-बंडी पर छाप बेच रहा है
चे और गान्ही की हालत
छुपी नही है किसी से
इतना ही नही
यह महान बिकाऊ समय
इस कोशिश में तो लगा ही है कि
बिक जाएगी ही यह पृथ्वी भी
किसी न किसी दिन
किसी ब्लैक-होल के हाथों
गनीमत है
सिरजने वाले अभी भी
सिरज रहे है
प्रेम
मुस्कान
शब्द
और धरती

देश-प्रेम

बार-बार हमें
बताया जाता है कि
बहुत सुंदर है हमारा देश
हजारों हजार प्रेम करने वाले लोगों की
सुनाई जाती है कहानियां

नियम और फायदे गिनाते हुए
संगीनों और बूटों की चमक-धमक के साथ
कहा जाता है कि जो ‘हमारा’ है
इसलिए मान लो कि ‘तुम्हारा’ भी है।

अब लाजमी है कि
प्रेम करो…….. तुम

लेकिन…
मैं नहीं कर सकता
नहीं ही कर सकता… कि
मालूम है मुझे
‘एकतरफा प्रेम’ मनोरोग है…

हमारा समय

हमारे लिए हमारा समय ही
चुनौती है
आकर्षण है
आधार है
दुधारी तलवार है

चुक जाने के बाद

सब कुछ बेच-खरीद कर
चुक जाने के बाद
आना लौट कर
अपनी कविता के पास
किसी भी रस्ते से
पर दुकान से होते नहीं
पूरी की पूरी तुम्हारी होगी
बिना ख़रीदे, बिना बेचे

आना अपनी कविता के पास
अच्छर ग्यान से ही काम चलेगा
गणित न आती हो तो भी

गढ़ सको, तो गढ़ना
रच सको, तो रचना
लिख सको, तो लिखना
देख सको, तो देखना
पढ़ सको, तो पढना

पूरा का पूरा महसूस कर सकोगे
अपने आपको

सब कुछ बेच-खरीद कर
चुक जाने के बाद
खोजना अपनी कविता को
बंद आखों से काम चलेगा
अच्छर चीन्ह न पाओ तब भी

देखना, किसी की आँखों में
छूना, किसी की घुंघराली लटों में
सुनना, किसी तोतली बोली में
सूँघना, धरती से उठती गंध में
चखना, अनजानी रिश्तों के रस में

बिना ख़रीदे बिना बेचे
पाओगे
कि, कविता तुम्हारी ही है
सब कुछ बेच-खरीद कर
चुक जाने के बाद
आना ही है, लौट कर
एक न एक…

दिन

कभी न कभी
कभी न कभी

नरेन्द्र दाभोलकर के लिए

न तो अपनी मन्नत-मनौती से
न बद्दुआओं से
न वशीकरण से
न मारन-उच्चाटन से
न मूठकरनी से
न अपने तमाम छल-प्रपंचों से
और हाँ…
न अपने शापऽऽऽऽ से
हरामखोरों तुम नहीं मार पाए

आखिर मर कर भी
वही जीता
उसकी बात साबित हुई
“गोली दिल में लगे तो जान जाती है”

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