मनोहर बाथम की रचनाएँ

दिल ज़्यादा

भूकम्प
से

भू
कम कँपी

दिल

गूंगा

हर चौथे रोज़ ही ही दीखती थी
दो तीन बरस के बच्चे के साथ
डॉक्टर से गिड़गिड़ाती
बच्चे के बोलने के इलाज के लिए
’गूंगा’ लफ़्ज उसे अच्छा नहीं लगता

माँ की तरह डॉक्टर भी
उम्मीदों के साथ
कि कभी तोतली आवाज़ से सही
निकलेगा ’अम्मी’

कल की ही तो बात है
उस ज़ालिम के बम से
चीख़ों से सारी बस्ती गूँजी
कहते हैं पहली और आख़िरी बार
गूंगा भी ’अम्मी’ पुकारते
चीख़ा

ज़्यादा

सीज फ़ायर

टिटवाल की नियन्त्रण रेखा पर
दोनों तरफ़ के लोग
चौदह साल में पहली बार
झेलम के आर-पार

सलमा के आँसू झेलम में गिरे
तो पार से मामू ने
पानी उठाकर चूमा

मामू की नीलम हमारी झेलम
दो नाम एक आत्मा

काश! उसके पंख होते
यह दस मीटर का फ़ासला
वह उड़कर ही पार करती

झेलम की लहरों में
आज सुर है
सलमा की आवाज़
उधर जल्दी ही पहुँचेगी
(तोपों की आवाज़ें जो शान्त हैं)

आवाज़ पहुँच गई
तो वो भी पहुँच जाएगी एक रोज़

टिप्पणियाँ

टिटवाल= कश्मीर का एक सीमावर्ती गाँव
सलमा= एक कश्मीरी युवती
नीलम= पाकिस्तान में झेलम को नीलम पुकारते हैं।

तलाशी

आमने-सामने के मकानों में
एक एनकाउंटर
वो मरने पर आमादा
मुझे लड़ने को करता मज़बूर

रातभर ज़ोर-आजमाईश
दिन भी आधा गया
एक आतंकी मारने की क्या ख़ुशी?
जब मेरा अपने बेटे-सा
शहीद हुआ ’भंवर’

आतंकी के पर्स की तलाशी से
कुछ सौ-सौ के नोट,
दो उर्दू में लिखे ख़त,
एक पुराना ब्लैक एण्ड व्हाइट में
बुजुर्ग बाप और अंधी माँ का फ़ोटो
दूसरा रंगीन शायद माशूक का

’भंवर’ का पर्स भी

मुझे भेजना था
बाक़ी सामान के साथ
उसके पर्स में भी
यही सब कुछ मिला
बस, माशूक की जगह
फ़ोटो में उसकी बीबी के साथ
दो मासूम बच्चे
और ए

जाति

सत्रह तारीख़ को
इसी बगीचे में
फिरंगियों की गोलियों से
गणेश और सलीम
एक साथ शहीद हुए

तब उनकी जाति
शहीदों की थी
उनका धर्म आज़ादी था

मरने पर हमने बनाई
एक समाधि
और एक क़ब्र

और शहीदों को तब्दील कर दिया
हिन्दू और मुसलमान में

क आधा लिखा ख़त था

 

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