‘ममनून’ निज़ामुद्दीन की रचनाएँ

झुकी निगह में है ढब पुर्सिश-ए-निहानी का

झुकी निगह में है ढब पुर्सिश-ए-निहानी का
हया में ज़ोर दिया रंग मेहर-बानी का

जिए हैं गर्म नफ़स सोज़ से कि बहर-ए-चराग़
करे है शोला ही काम आम-ए-ज़िन्दगानी का

तबस्सुम-ए-लब-ए-ग़ुंचा को देख रोता हूँ
कि ठीक रंग कि उस ख़ंदा-ए-निहानी का

कहाँ से ज़ोर-ए-दिल-ओ-सीना-ओ-जिगर लाऊँ
तुम्हें तो खेल लगा हाथ तेग़-रानी का

इलाही जैब कि दामन कि आस्तीं धोऊँ
मिज़ा ले सीख लिया शुग़्ल ख़ूँ-फ़िशानी का

नहीं बचा मरज़-ए-इश्क़ से कोई ‘ममनूँ’
हमें दरीग़ बहुत है तेरी जवानी का

जो बाद-ए-मर्ग भी दिल को रही किनार में जा

जो बाद-ए-मर्ग भी दिल को रही किनार में जा
तो सो चुका मैं फ़राग़त से बस मज़ार में जा

तमाम दर्द हों मालूम कुछ नहीं कि कहाँ
तेरे ख़दंग ने की है तन-ए-नज़ार में जा

यही तो रिज़्क है बाद-ए-फ़ना मेरा ज़ालिम
समझ के बर्क़-ए-शरर-बार ख़ार-ज़ार में जा

क़दम समझ के तू रख तिश्नगान-ए-हसरत से
तिही नहीं है टुक उल्फ़त की रह-गुज़ार में जा

उठी जो कुल्फ़त-ए-दिल कम हो मेरी कुल्फ़त में
ग़ुबार जैसे के मिल जाए है ग़ुबार में जा

न हो कहीं के दो-सद-ख़ून-ए-खुफ़्ता हों बे-दार
सबा जो जाए तो आहिस्ता कू-ए-यार में जा

ख़दंग-ए-ग़मज़ा तो ख़ार-ए-शिगाफ़ है उस का
छुपाए जी को कोई कौन से हिसार में जा

कल वस्ल में भी नींद न आई तमाम शब

कल वस्ल में भी नींद न आई तमाम शब
एक एक बात पर थी लड़ाई तमाम शब

ये भी है ज़ुल्म तो कि उसे वस्ल में रहा
ज़िक्र-ए-तुलू-ए-सुब्ह-ए-जुदाई तमाम शब

किस बे-अदब को अर्ज़-ए-हवस हर निगह में थी
आँख उस ने बज़्म में न उठाई तमाम शब

याँ इल्तिमास-ए-शौक़ वहाँ ऐहतिराज़-ए-नाज़
मुश्किल हुई थी ओहदा-बराई तमाम शब

क्या सर पे कोह-कन के हुई बे-सुतूँ से आज
‘ममनूँ’ सदा-ए-तीशा न आई तमाम शब

खा के कल हो पेच-ओ-ताब उठा जो दिल से नाला था

खा के कल हो पेच-ओ-ताब उठा जो दिल से नाला था
जा के गर्दूं पे चमकता शोला-ए-जव्वाला था

ख़्वाब में बोसा लिया था रात बल्बे-नाज़ुकी
सुब्ह दम देखा तो उस के होंठ पे बुतख़ाला था

वाह री अफ़सुर्दगी इस ख़ातिर-ए-दिल-गीर की
अश्क का क़तरा जो टपका चश्म से सो ज़ाला था

थी ख़्याल-ए-मह-रूख़ाँ से शब बग़ल लब-रेज़ नूर
आब से ख़ाली वलेकिन मय ब-रंग-हाला था

कल ब-रंग-ए-ग़ुचा थी किस से मजाल-ए-गुफ़्तुगू
बात जब करता था मुहँ में दिल का यक परकाला था

बद-गुमानी से डरा वर्ना लिया तेरा जो नाम
देखना बोसे की ख़ातिर

कोई हम-दर्द हम-दम न यगाना अपना

कोई हम-दर्द हम-दम न यगाना अपना
रू-ब-रू किस के कहें हम ये फ़साना अपना

न किसू जैब के हैं फूल न दामन के हैं ख़ार
किस लिए था चमन-ए-दहर में आना अपना

फ़ाएदा क्या जो हुए शैख़-ए-हरम राहिब-ए-दैर
न हुआ दिल में किसी के जो ठिकाना अपना

है हज़ारों दिल-ए-पुर-ख़ूँ को यहाँ पेच पे पेच
देखियों तुर्रा-ए-मुश्कीं न मिलाना अपना

मैं लब-ए-दल्लाला था

नूर-ए-मह को शब तह-ए-अब्र-ए-तुनक क्या लाफ़ था

नूर-ए-मह को शब तह-ए-अब्र-ए-तुनक क्या लाफ़ था
बाल उस मुखड़े से उठ जाते तो मतला साफ़ था

साफ़ी दिल-ग़ज़ंद की क्या थी दम-ए-बोस-ओ-किनार
बोसे को मुश्किल ठकरना सीने से ता नाफ़ था

इक निगाह का दूर से भी आज कल महरूम है
दिल कि तेरा मुद्दतों ख़ू-कर्दा-ए-अल्ताफ़ था

हो दर-ए-मै-ख़ाना पर बे-दुख़्त-ए-रज़ बैठे हुए
हज़रत-ए-‘ममनूँ’ यही क्या शेवा-ए-अशराफ़ था

 

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