Poetry

मल्लिका मुखर्जी की रचनाएँ

माँ

धूप कड़ी सहकर भी माँ तुम, कभी न हारी यौवन में,
धरम तुम्हारा खूब निभाया, तुमने अपने जीवन में !

सहम रही ममता पलकों में, नज़र तुम्हारी झुकी-झुकी,
तड़प रही है धड़कन भी अब, साँस तुम्हारी रुकी-रुकी ।
न्योता दिया बुढ़ापे ने अब तुमको अपने आँगन में !

गूँज रही कानों में मेरे वही तुम्हारी मुक्त हँसी,
आज कराहों में भी तो है छुपी हुई मुस्कान बसी !
हाय जिंदगी सजी-सजाई, बीती कितनी उलझन में !

टूट गए कुछ सपने तो क्या, रात अभी भी बाकी है,
और नए कुछ सज जाएँगे, प्रात अभी भी बाकी है ।
ढलती संध्या में भर लो तुम जोश नया अपने तन में !

और किसी से क्या लड़ना है ?

पगलाई मैं ख़ुद से लड़कर, और किसी से क्या लड़ना है ?

कुम्हलाई कलियाँ डाली पर,
ऐसे बाग़ उजड़ते देखे ।
दौर चला ऐसा आँधी का
जड़ से पेड़ उखड़ते देखे ।
गले लगाकर पतझड़ को, अब सूखे पत्ते बन झड़ना है !

उमड़ रही सरिताएँ मन में,
छलक रहे साहिल पर सरवर ।
प्यास नहीं बुझती है फिर भी
नत-मस्तक हैं बहते निर्झर ।
बस, मेघों की लिए सवारी सूने नभ में अब उड़ना है !

ठगने वाले अपने ही थे,
गैरों ने तो दिया सहारा ।
नमक छिड़कते रहे घाव पर,
आह सुनी तो किया किनारा ।
ज़खम दिए फूलों ने इतने, अब तो काँटों में गड़ना है ।

कभी जले अरमान कहीं

देखे मैंने हँसते-खिलते रंग कई, उत्पल में !
देखे मैंने बनते-मिटते रूप कई, बादल में !

कभी बूझ गई प्यास युगों की,
कभी जले अरमान कहीं ।
कभी कट गई मुश्किल राहें
कभी लगा आसान नहीं ।
देखे मैंने जलते-बुझते दीप कई, पल-पल में !

कभी मिल गए अंतर्यामी,
कभी दिखे शैतान कहीं ।
कभी चल दिए साथ हमारे,
कभी मिला संधान नहीं ।
देखे मैंने गिरते-धँसते लोग कई, दलदल में !

कभी कह दिया ख़ूब प्यार है,
कभी कहा पहचान नहीं ।
कभी बन गए इतने अपने,
कभी बने अन्जान कहीं ।
देखे मैंने चलते-फिरते साँप कई, जंगल में !

शून्य क्षितिज

क्षितिज के लालित्य ने
हमेशा लुभाया है मुझे ।
सागर-तट पर खड़ी रही
या पर्वत के शिखर से देखा,
आँखें बिछ-बिछ जाती थी
धरती और आकाश के
शाश्वत प्रेम का नज़ारा देखकर !
उगते सूरज की अरुणिमा के साथ
कतारबद्ध उड़ते पंछियों का समूह,
ढलते सूरज की लालिमा के साथ
रंग बदलते
बादलों की अठखेलियाँ,
सतरंगी इन्द्रधनुष की मुसकान,
सब कुछ कितना अद्भुत,
जीवंत हुआ करता था !

पर –
रंग नहीं भरते अब
क्षितिज के केनवास पर ।
शून्य क्षितिज से टकराकर
लौट आती है मेरी निगाहें
कुछ काले धब्बे अपने साथ लेकर ।
पूछती हूँ ख़ुद से मैं
बार-बार प्रश्न यही –
गुज़रते वक्त के साथ
धुंधलाई है मेरी दृष्टि
या रिक्त हुआ है मेरा मन ?

बँटवारा

हर दूसरे शनिवार को बारह बजते ही
माँ बेसब्री दरवाजे की तरफ देखा करती ।
उनकी आँखों में
एक अजब सी प्यास हुआ करती थी ।
मैं भी बार-बार दरवाजे की तरफ देखती
डाक का थैला साइकिल पर लटकाए हुए
बनवारी को हमारे घर की तरफ आते देख
मैं खुशी से उछल पड़ती ।

‘माँ, नानीमाँ का खत आया है !’
बनवारी के हाथ से पोस्टकार्ड छिनकर
मैं माँ को दे देती और कहती,
‘माँ पढ़कर सुनाओ ।’
खत बंगाली भाषा में होता था
और हम भाई-बहनों को तब
बंगाली भाषा में
लिखना-पढ़ना नहीं आता था ।
माँ जोर से पढ़ती
वही सात-आठ पंक्तियाँ
जो हर खत में लिखी होती थी, पर-
न जाने क्या जादू था उन पंक्तियों में
कि हम हर बार सुनना चाहते थे ।
अंतिम पंक्ति आज भी मेरे हृदय में अंकित है-
‘भगवान न जाने कब
मेरी तरफ नज़र उठाकर देखेंगे !’

पढ़ते-पढ़ते माँ एक गहरी साँस लेकर चुप हो जाती ।
हम अपने–अपने काम में लग जाते ।
समय बदल गया है ।
नानीमाँ अब नहीं रही,
पिताजी भी नहीं रहे ;
माँ बुढ़ापे के अंतिम छोर पर रुकी है ।
अपने दोनों बेटों के परिवार के साथ
बारी-बारी से रहती है-
एक नया बँटवारा है !

मैं विवश हूँ ।
एक बार माँ-बेटी के रिश्ते की
उस गहराई को महसूसना चाहती हूँ,
इस पवित्र रिश्ते को जीना चाहती हूँ
जो सिर्फ पोस्टकार्ड पर लिखे
उन चंद शब्दों पर बुलंद हुआ करता था,
पर माँ को मैं पत्र नहीं लिख सकती,
फोन भी नहीं कर सकती ;
विवशता की पराकाष्ठा है ।
कभी-कभार जब माँ से मिलने का मौका आता है,
उनकी धुंधली आँखों में
मुझे एक ही पंक्ति तैरती हुई दिखाई देती है-
‘भगवान न जाने कब
मेरी तरफ नज़र उठाकर देखेंगे !’

पगडंडी

बड़ी चका-चौंध है इस शहर में !
चौड़े-चौड़े रोड
जो रात भर नियोन लाइट की रोशनी से
जगमगाते रहते हैं ।
कतार से चलती हैं कारें, स्कुटर्स, बसें,
दोनों ओर खड़े हैं
आलीशान टावर्स, शोपिंग मोल्स, मल्टीप्लेक्सीस,
पार्टी-प्लोट्स, होटल्स, कल्ब हाउसीस-
फिर भी न जाने क्यों
इतनी बेजान-सी लगती है
मुझे यह चहल-पहल !

तलाशती हूँ मैं
मेरे गाँव की उस पगडंडी को
जो मेरे घर के आँगन से निकलकर
नेरोगेज की रेल्वे लाइन को पार करती हुई
उस कुएँ के पास खड़े
बरगद के पेड़ के पास से गुजरकर,
खेतों के किनारे-किनारे
बलखाती नागिन की तरह
आगे बढ़ते हुए
मेरे स्कूल तक पहुँचती थी !

जिस के दोनों ओर खड़े इमली के पेड़
मुझे जानते थे,
बेरी का पेड़ भी मुझे पहचानता था ।
स्कूल बेग कंधे पर झुलाते हुए
उछलती-कूदती
जब मैं स्कूल के लिए निकलती,
थूहर की बाड़ से लिपटी लताएँ
मुझे देखकर मुस्कुराती थी,
खेतों में लहराते गेंदा फूल के पौधे
मुझे छूने को तरसते थे ।
उसके किनारे बिछी हरी-हरी दूर्वा का
कोमल स्पर्श
आज भी महसूस होता है पाँवों में !
कोई लौटा दो मुझे मेरी वह पगडंडी
जो मेरे साथ चलती थी !

अबला

नारी
चाहे कितना भी पढ़ ले,
चाहे जितना
आगे बढ़ ले,
सफलता की
कितनी भी सीढ़ियां चढ़ ले,
पर कभी नहीं बन सकती
कठोर
क्यों कि
उसके सीने में धड़कता है
एक दिल कमजोर !

वह समझ नहीं पाती
जीवन का सही गणित ।
देते वक्त
दो और दो पाँच बन जाती है
और
लेते वक्त
दो और दो तीन ही रह जाती है !
तभी तो
कितनी भी बहादुर बने वह,
अबला ही कहलाती है !

कितने एकाकी !

कितना समय बीत गया
याद नहीं
पर याद है –
हर सुबह चाय साथ बैठकर पीते-पीते
हम बुनते थे
अनगिनत सपने
अपने उज्ज्वल भविष्य के !
राहें पथरीली थी
फिर भी थकते नहीं थे
हमारे क़दम
क्योंकि,
हमारी मंज़िल एक थी
और आज ?
आज भी हम
हर सुबह चाय पीते हैं चुप-चाप
हमारे बीच नहीं होता कोई संवाद
बुने थे जो सपने,
कुछ साकार हुए,
कुछ ध्वस्त हुए हैं ।
कभी हम
एक-दूसरे के बिना अधूरे थे,
आज हमारे साथ है बस,
अधूरेपन का अहसास !

संबंध

मेरे आँसुओ,
मेरे चिर-परिचित साथियो !
नयनो की अतल गहराई में डेरा डाले
गुमसुम पड़े रहते हो तुम !
मेरे हृदय की धरती पर जब
कराहने लगती हैं व्यथाएँ
अकाल बनकर,
तब रूप धर सैलाब का
चले आते हो तुम
मेरे नयनों के धरातल पर !
तुम्हें रोकने की कोशिश में
टूट जाते हैं
मेरी नाज़ुक पलकों के किनारे,
पर विचलित नहीं होती हूँ मैं !

किन्हीं कोमल हाथों का
शीतल स्पर्श पाने को तरसते
उन तपते सहरा-से मेरे गालों पर
बहने लगते हो तुम ।
तुम्हारी ऊष्मा से ही सही
व्यथाओं का धधकता अंगार
जब बुझ जाता है,
मेरे आकुल हृदय की धरती पर
फिर से पनपती है
उपजाऊ ज़मीन और
मैं बुनने लगती हूँ सपना
फिर एक नई फ़सल उगाने का !

Share