महाराज कृष्ण सन्तोषी की रचनाएँ

व्यथा

अभी भी ज़िन्दा है मेरे भीतर
गुरिल्ला छापामार
बेहतर दुनिया के लिए लड़ने को तैयार

पर एक कायर से
उसकी दोस्ती है
जो उसे यही समझाता रहता है
दूसरों के लिए लड़ोगे
तो मारे जाओगे

सच कहता हूँ
यही है मेरे जीवन की व्यथा
सपना देखा उस गुरिल्ला ने
जीवन जिया इस कायर ने

बेरहम

पहाड़ ने मान रक्खा
मेरे हौंसले का

घाटी ही
बेरहम निकली

पेड़ से गिरा दिया
मेरा घोंसला

एक अच्छा दिन

बहुत अच्छा दिन बीता आज

न पढ़ा अखबार
न देखा टेलिविजन ही

सुबह-सुबह ओस की बून्दों में
मैंने देख लिया अपना प्रतिबिम्ब
फिर अच्छा लगा यह सोचना
कि ओस ही है हमारे जीवन की आत्मकथा

बहुत अच्छा दिन बीता आज

न मन्त्र
न ईश्वर
न मित्र याद आए

आज अकेला ही
हरी-हरी घास पर
नँगे पाँच चलते हुए
मैंने पृथ्वी का प्यार नाप लिया
और पेड़ों से लिया मौन

बहुत अच्छा दिन बीता आज

न किसी ने नाम पूछा
न जात
न गाँव

आज ऐसा लगा
दुनिया का सबसे बड़ा अमीर
वही हो सकता है
जो सारी पृथ्वी से कर पाए प्यार
और यह बात
मुझे किसी किताब ने नहीं
हरी घास की एक पत्ती ने समझाई

काठ की तलवारें

हम काठ की तलवारें हैं
हमें डर लगता है
माचिस की छोटी-सी तीली से भी

हम मँच पर कलाकार का साथ
तो दे सकती हैं
पर सड़क पर किसी निहत्थे की रक्षा नहीं कर सकतीं

हम काठ की तलवारें हैं
हमारा अस्तित्व छद्म है
हमारी नियति में कोई युद्ध नहीं
कोई जोख़िम नहीं
किसी का प्यार नहीं
हम रहेंगी हमेशा
मौलिकता से वंचित

हम काठ की तलवारें हैं
हमें आग से ही नहीं
छोटे से चाकू से भी डर लगता है ।

आतँक और एक प्रेम कविता

अभी जैसे कल की बात हो
जब मुझे उसने चूमा था इस पार्क में

उसके चुम्बन का सुख
भीतर ही भीतर छिपाते हुए
मैंने उससे कहा था
और मत करना साहस

अभी जैसे कल की बात हो
जब मौसम था बसन्त का
और पेड़ फूलों से भरे हुए थे
इन्हीं फूलों की महक में
हम बातें करते रहे
भूलते हुए समय को
और लौटते हुए घर
जब उसने मुझे भर लिया बाहों में
मैंने उसे चेताया
कहा
यहाँ हवा जासूस हे
कुछ भी छिपा नहीं रहता

अभी जैसे कल की बात हो
जब उसने
पुल और नदी को गवाह बनाकर
मुझे अपने प्यार का विश्वास दिलाया था
उस समय बहुत डर गई थी मैं
कहीं कोई दुश्मन चेहरा
हमें देख तो नहीं रहा था

पर अब जैसे थम गया हो समय
मारा गया मेरा प्यार
बीच सड़क पर
अपनी असीम सम्भावनाओं के साथ
क्या इसलिए वह मारा तो नहीं गया
कि वह प्यार के सिवा
कुछ जानता ही न था

ऐ मेरे वतन की हवाओ !
सचमुच यहाँ खतरनाक है
प्यार करना
फिर भी कहना
मेरे हमउम्रों से
जोख़िम उठाकर भी प्यार करना

जैसे हमने किया
समय के ख़िलाफ़
समय को भूलते हुए ।

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