महेंद्र अग्रवाल की रचनाएँ

गम नहीं, गम नहीं, गम नहीं…

गम नहीं, गम नहीं, गम नहीं
ग़मज़दा आपसे , कम नहीं

लफ़्ज़ बेशक बहुत शोख है
आपकी बात में दम नहीं

चोट पर चोट की आपने
आँख फिर भी हुई नम नहीं

पांव चलते रहे उम्र भर
सामने भी सफ़र कम नहीं

खुश्क व्यवहार आदत में है
लफ़्ज़ सूखे है शबनम नहीं

कैसा है आज मौसम कुछ भी पता नहीं है

कैसा है आज मौसम कुछ भी पता नहीं है
है ईद या मुहर्रम कुछ भी पता नहीं है

सत्ता की चौधराहट ये वक्त है चुनावी
किसमें है कितना दमखम कुछ भी पता नहीं है

इस ज़िन्दगी ने हमको कुछ ऐसे दिन दिखाये
मन में खुशी है या ग़म कुछ भी पता नहीं है

सब सो रहे हैं डर के, अपनी अना के भीतर
बस्ती में गिर गया बम कुछ भी पता नहीं है

रोने को रो रहे हैं हालात के मुताबिक
आंसू हुए क्या कुछ कम कुछ भी पता नहीं है

जीने को जी रहे हैं नायाब ज़िन्दगी सी
तुझसे कहें क्या हम दम कुछ भी पता नहीं है

शफ़्फ़ाक ज़िन्दगी की शफ़्फ़ाक सी ग़ज़ल है
शेरों में आ गया जम कुछ भी पता नहीं है

ज़िन्दगी बस एक ये लम्हा मुझे भी भा गया

ज़िन्दगी बस एक ये लम्हा मुझे भी भा गया
आज बेटे के बदन पर कोट मेरा आ गया.

भोर की पहली किरन बरगद तले झोंका नया
जिस्म सारा ओस की बूंदों से यूं नहला गया

हूं बहुत ही खुश बुढ़ापे में बहू-बेटों के संग
चाहतों का इक नया मौसम मुझे हर्षा गया

दुश्मनी मुझको विरासत में मिली थी, खेत भी
क़ातिलों से मिलके लौटा गांवभर में छा गया

ये अलग है खिल नहीं पाया चमन पूरी तरह
मेरा जादू शाख़ पर कुछ सुर्खियां तो ला गया

बेवकूफी जल्दबाजी में चुना सरदार था
खेत की ही मेड़ जैसा खेत को ही खा गया

 

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