Poetry

महेश आलोक की रचनाएँ

चलो कुछ खेल जैसा खेलें

चलो कुछ खेल जैसा खेलें

थोड़ा- थोड़ा साहस थोड़ा- थोड़ा भय साथ-साथ रखें
थोड़ा-थोड़ा अनुचित थोड़ा-थोड़ा उचित
इतना प्रेम करें कि मजा यह भी हो कि थोड़ा-थोड़ा नैतिक
थोड़ा-थोड़ा अनैतिक होना अच्छा लगे

थोड़ी-थोड़ी सड़कें थोड़ी-थोड़ी खिड़कियाँ देह की अन्तिम कला में खोलें

थोड़ी-थोड़ी मृत्यु थोड़ा- थोड़ा जीवन
प्रेम के भीतर रखने का काम भी
गलत नहीं लगेगा ऐसे समय

इस कठिन समय में
चलो कुछ खेल जैसा खेलें

किसी दिन पत्थरों की सभा होगी

किसी दिन पत्थरों की सभा होगी
और वे किसी भी पूजा-घर में
बैठने से इन्कार कर देंगे

वे उठेंगे और प्राण-प्रतिष्ठा के तमाम मंत्र
भाग जाएंगे कंदराओं में
वह पूरा दृश्य देखने लायक होगा जबकि मंत्रों के चीखने-चिल्लाने याकि
मित्र मंत्रों के घातक प्रयोगों की धमकी का असर
उन पर नहीं होगा

वे अपनी सरकार से माँग करेंगे कि उस दिन को
राष्ट्रीय पर्व घोषित किया जाए

वे दुनिया भर की मूर्तियों को पत्र लिखेंगे
कि अगर सुरक्षित रहना है तो लौट जाएं
कलाकारों के आदिम मन में

और वह हमारे लिये कितना शर्मनाक दिन होगा जब
मलबे से तमाम पत्थर जुलूस की तरह निकलेंगे
और बरस पड़ेंगे ईश्वर पर

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