महेश उपाध्याय की रचनाएँ

साँध्य-गीत

टूट गई
धूप की नसैनी

तुलसी के तले
दिया धर कर
एक थकन सो
गई पसर कर

दीपक की ज्योति
लगी छैनी

आँगन में
धूप-गन्ध बोकर
बिखरी
चौपाइयाँ सँजोकर

मुँडरी से उड़ी
कनक-डैनी

सन्नाटा बढ़ गया

दिन बौना रात की पहाड़ी पर
चढ़ गया
ओर-छोर सन्नाटा बढ़ गया

तस्वीरें डूब गईं जलवंशी
जाग गया घर का आँगन दंशी

अन्धियारा आँखों में तिनके-सा
पड़ गया
सन्नाटा बढ़ गया ।

जंगल में रात

चाँदी की चोंच
थके पंखों के बीच दिए
पड़कुलिया झील सो गई
जंगल में रात हो गई

शंखमुखी देह मोड़कर
ठिगनी-सी छाँह के तले
आवाज़ें बाँधते हुए
चोर पाँव धुँधलके चले

डूबी-अनडूबी हँसुली
कितनी स्याही बिलो गई
जंगल में रात हो गई ।

सावनी उजास

हाथों में फूल ले कपास के
स्वर झूले सावनी उजास के

पागल-सी चल पड़ी हवाएँ
मन्द कभी तेज़
झूल रही दूर तक दिशाएँ
यादों की चाँदनी सहेज

झीनी बौछार में नहाए
फिर नंगे खेत
सरिता के आस-पास के
स्वर झूमे सावनी उजास के ।

अन्धकार का बबूल

आस-पास झर गया
गुड़हल का फूल
बींध गया देह
अन्धकार का बबूल

एक भीड़ सन्नाटा
गन्धहीन मन
पानी का डूबा-सा
लग रहा बदन

आँखों में कसक रही
धूल सिर्फ़ धूल ।

गीत की सरन

लहरों से सीख लिए
सारे ठनगन !
ओरी ! ओ ! नागरी दुल्हन

कलियों की उर्वशी हँसी
तेरे हर अंग में बसी
फैलाती गन्ध की शिकन

दीप-शिखा देह सोनई
अन्धियारा चीरती गई
तेरे अनुभाव की किरण

आँखों में छन्द आँजकर
रसवन्ती देह माँजकर
जा बैठी गीत की सरन

 

किसे आना था ?

मान जा रे मन !
हठीले मान जा
तोड़ दे चट्टान-सी ज़िद
छोड़ दे बचपन
किसे आना था ?

हवा आने का
भुलावा दे गई
गीत गाने का
बुलावा दे गई
देख छायाहीन अब तक
दरपनी आँगन
किसे आना था ?

अब नदीपन कहाँ ?
सागर के लिए
खिंच गए हैं
दो तिहाई हाशिए
अब न उन पाँवों रही वह
लहर संजीवन
किसे आना था ?

 

 

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