Poetry

महेश कटारे सुगम की रचनाएँ

गीत अब बदलाव के हम साथ मिलकर गाएँगे

गीत अब बदलाव के हम साथ मिलकर गाएँगे ।
चल पड़े हम लोग तो कुछ और भी आ जाएँगे ।।

ज़ुल्म की चूलें हिलेंगी झूठ होंगे बेनक़ाब
चीख़ को अन्याय की देहलीज़ तक पहुचाएँगे ।

ज़ख़्म खाए हम सभी है दर्द सबका एक-सा
ढूँढ़कर अपने ग़मों की हम दवा अब लाएँगे ।

रोज़मर्रा के सवालों को उठाया जाएगा
ख़ौफ़ के रिश्ते न अब हर्गिज़ निभाए जाएँगे ।

साज़िशें जो भी हुई हैं आमजन के साथ में
अब सुगम गिन-गिन के सब बदले चुकाए जाएँगे ।

करना तो है ज़िद्द्त का सफ़र देखिए क्या हो

करना तो है ज़िद्द्त का सफ़र देखिए क्या हो ।
अब हमने भी कस ली है कमर देखिए क्या हो ।।

हर रोज़ निगाहों में चमकता है आफ़ताब
इस ख़्वाब का उम्मीदे सफ़र देखिए क्या हो ।

मुझको ख़बर है वक़्त पै मेरे रफ़ीक भी
उगलेंगे रक़ीबों-सा ज़हर देखिए क्या हो ।

ये रात तीरगी से भरी काट दी मगर
अब आ गई है उजली सहर देखिए क्या हो ।

निकला है आज मौत का क़द नापने सुगम
है पास मुहब्बत का हुनर देखिए क्या हो ।

ग़रीबों का बज़ट है या कसाई का गंडासा है

ग़रीबों का बज़ट है या कसाई का गंडासा है ।
सभी की गर्दनें काटीं हताशा ही हताशा है ।।

बड़ी उम्मीद थी इनसे मिलेंगी सब्ज़ सुविधाएँ
मगर इन जेबकतरों से मिली ख़ाली निराशा है ।

रियायत दी गई सारी बड़े उद्योगपतियों को,
बज़ट में प्यार उन पर ही लुटाया बेतहाशा है ।

किसानों और श्रमिकों ने दिया था वोट भूले तुम
नहीं उनको मिला कुछ भी अँधेरा है कुहासा है ।

ये सारे मध्यवर्गी आज अपना धुन रहे हैं सर
लिखी है नाम पर उनके दिलासा ही दिलासा है ।

हमारे वोट से जीते खड़े हो उनके पाले में
हाँ मोदी जी बज़ट इस बात का करता खुलासा है ।

1-03-2015

 

रंग सभी बदरंग बजट के मोदी जी

रंग सभी बदरंग बजट के मोदी जी ।
आम आदमी को हैं खटके मोदी जी ।।

रंगे राहत मध्यवर्ग को मिला नहीं
मगर कह रहे सबसे हटके मोदी जी ।

सुर्ख़ रंग पूंजीपतियों पर डाले सब
खूब रंगा उनको बेखटके मोदी जी ।

रंग उड़ाए तुमने ख़ूब हवाओं में
ख़ूब दिखाए लटके-झटके मोदी जी ।

थमा जेटली के हाथों में पिचकारी
वार किया है तुमने डट के मोदी जी ।

वोटों के रंगों से तुम्हें भिगाया था
उनको देखा नहीं पलट के मोदी जी ।

1-03-2015

खेली खूब बज़ट में होली वा भई वा

खेली खूब बज़ट में होली वा भई वा ।
फाड़ी है चड्डी और चोली वा भई वा ।।

भगवा रंग गुलाल उड़ाती फिरती है
छोड़ रखी है ऐसी टोली वा भई वा ।

रंग उड़ाते फिरते हो स्मार्ट सिटी
नहीं बहुत सौं पर है खोली वा भई वा ।

मेहंगाई का रंग बहुत ही गहरा है
सूझ रही है तुम्हें ठिठोली वा भई वा ।

रोज़गार का रंग अभी तक फीका है
लेकिन बातें हैं बड़बोली वा भई वा ।

ज़र्द रंग से चेहरों की रौनक ग़ायब
तुम्हें दिख रही कुमकुम रोली वा भई वा ।

रंग सवालों के चुभते हैं आँखों में
सजा रहे हो सुगम रंगोली वा भई वा ।

28-02-2015

दिल टूटा है जिगर चाक है

दिल टूटा है जिगर चाक है ।
बाक़ी सब कुछ ठीक-ठाक है ।।

पीते ख़ून गिलासों में ये
इनकी तो ये ही ख़ुराक है ।

पाँच साल जी भर के लूटें
नीयत फिर भी साफ़ पाक है ।

सेवक हैं सुविधाभोगी सब
आख़िर ये कैसा मज़ाक है ।

उस कश्ती में बैठे हैं हम
जिसमें पहले से सुराख़ है ।

28-02-2015

हमने ऐसा ग़म का मंज़र देखा है

हमने ऐसा ग़म का मंज़र देखा है ।
जैसे फैला हुआ समन्दर देखा है ।।

हद से बाहर देखी है हमने नफ़रत
मगर प्यार को हद के अन्दर देखा है ।

नाटक हमने नहीं किए व्यवहारों में
दिल के अहसासों को छूकर देखा है ।

सब कुछ पाकर भी आख़िर इस दुनिया से
ख़ाली जाते हुए सिकन्दर देखा है ।

जिसने भी संघर्ष किया तूफ़ानों से
उसको लिखते सुगम मुक़द्दर देखा है ।

27-02-2015

 

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