यतींद्रनाथ राही की रचनाएँ

बातें करो मत

वंचना है
कल नए दिनमान की
बातें करो मत!

महक रिश्तों में कहाँ है
काग़ज़ी हैं फूल सारे
एक माया जाल में
उलझे हुए पंछी विचारे
क्या करें ये डालियाँ ही
नीड़ अपने छल रही हैं
स्वप्न निद्रा है
किसी उद्गान की
बातें करो मत।

झूठ-सच अच्छे-बुरे का
कौन जाने भेद कैसा
आदमी के आकलन की
है कसौटी सिर्फ पैसा
दौड़ है अन्धी, न जाने
और कितना दौड़ना है
क्या वरण करना पड़ेगा
और क्या क्या छोड़ना है
बंचकों की हाट हैं
प्रतिदान की
बातें करो मत!

चरण पर किसके
धरें सिर
मूर्तियाँ तो सभी खण्डित
ग्रहण शापित लग रहे हैं
ये विमल आभाविमंडित
पतन के इस गर्त में भी
तान कर सीना खड़े हैं
झूमते हैं जो मुकुट धर
पाप के माणिक जड़े हैं
चेतना के मृतक्शणों में
ज्ञान की
बातें करो मत।

सौ सौ विभ्रम 

उलझे लक्ष्य
कटीले पथ हैं
एक ज़िन्दगी
सौ सौ विभ्रम

इतनी धूल जमी दर्पण पर
सारी उमर
झाड़ते बीती
देख न पाए एक झलक भर
छवि
जीवन धन की मनचीती
जितनी बार गए पनघट पर
लेकर लौटे खाली गागर
दूर-दूर तक रहे उफनते
जलती हुई रेत के सागर
भरी मुट्ठियाँ
टूटे सपने
अधर काँपते
पलके पुरनम।
धरते रहे दीप पौढ़ी पर
अन्तःपुर
रह गए अँधेरे
मिले देवता भी तो ऐसे
चेहरों पर ओढ़े कुछ चेहरे
मैली सभी चादरें साधो
किसे ओढ़ लें
किसे बिछाएँ
महाकुंभ की महाभीड़ में
बोलो!
डुबकी कहाँ लगाएँ
निकला नहीं भोर का सूरज
होते रहे क्षितिज
कुछ अरुणिम।

नीलकंठ हम नहीं
नियति में लिखा
हलाहल ही पीना है
कटे पंख
पिजरे के पाँखी
जीना भी, कैसा जीना है?
मन करता है
गगन चीरकर
ऐसे दूर देश उड़ जाएँ
महाषून्य की महागन्ध में
पँखुरी पँखुरी
हो झर जाएँ
बाँहों में आकाश बाँधलें
साँसों में
साँसो के सरगम।
एक ज़िन्दगी।

कब तक

नदिया रुको
बता दो इतना
कब तक यह कल-कल है

आँगन में रोपे गुलाब थे
फूली नागफनी है
पेट पीठ से बाँध तोड़ती
पत्थर हीरकनी है
पूजा-पाठ, धर्म के नाटक
लक्ष्य, वोट की ममता
कोई कुम्भ नहीं दे पाता
हमें कहीं समरसता
माला तिलक-छाप
ये झंडे
लगा,
ढोंग है छल है।
लोकतन्त्र
परिहास हो गया
नायक लगे विदूशक
थूक-थूककर चाट रहे हैं
रक्शक हों या भक्शक
चीर-हरण में,
दुःशासन ही नहीं
युधिष्ठर दोषी
अन्धे थे धृतराष्ट्र
भीष्म तो थे शासन के पोषी
जहाँ शक्ति,
जयकार उसी के
पिटता सदा निबल है।

किसको कोसें,
किसे सराहें
सभी एक थैली के बट्टे
नैतिकता को चाट रहे हैं
कुछ बौने तिलचट्टे
एक न्याय की तुला
अनय का फटता रोज़ गगन है
हैं आँधी के आम
लूटने में हर एक मगन है
सौ सौ प्रश्न झुके कन्धो पर
मिलता
एक न हल है।

सुधि के मेघ

रहे सींचते, ऊसर बंजर
हरियाली के दरस न पाए
आज
अषाढ़ी अहसासों पर
सुधि के
सघन मेघ घिर छाए।

रातों को छोटा कर देती
थी लम्बी पगली वार्ताएं
और शीत की ठिठुरन वाली
वे मादक कोमल ऊष्माएँ
ओस नहायी
किरन कुनकुनी
छुए अंग अलसाए।
अँधियारों में कभी लिखी थी
जो उजियारी प्रणय कथाएँ
भरी दुपहरी बाँचा करती
थीं उनको चन्दनी हवाएँ
हरित कछारों में
दिन हिरना
जाने कहों कहाँ भरमाए।

संस्पर्शों के मौन स्वरों में
कितने वाद्य निनाद ध्वनित थे
किसी अजाने स्वर्गलोक के
रस के अमृत कलश स्रवित थे
प्राण-प्राण पुलकित
अधरों ने
जब अपने
मधुकोश लुटाए।

बाँध नहीं पाते शब्दों में
पल-पल पुलकित
वे पावनक्शण
बूँद-बूँद में प्राप्त तृप्ति-सुख
साँस-साँस में अर्पण-अर्पण
उल्लासों के वे मृग-छौने
नहीं लौटकर फिर घर आए।

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