रमेश रंजक की रचनाएँ

यही बेहतर

इधर दो फूल मुँह से मुँह सटाए
बात करते हैं
यहीं से काट लो रस्ता
यही बेहतर

हमें दिन इस तरह के
रास आए नहीं ये दीगर
तसल्ली है कहीं तो पल रहा है
प्यार धरती पर
उमर की आग की परचम उठाए
बात करते हैं
यहीं से काट लो रस्ता
यही बेहतर

खुले में यह खुलापन देखकर
जो चैन पाया है
कई कुर्बानियों का रंग
रेशम में समाया है
हरे जल पर पड़े मस्तूल-साए
बात करते हैं
यहीं से काट लो रस्ता
यही बेहतर

मुट्ठी भर बाँधकर

मुट्ठी भर बाँधकर इरादे
बाहों भर तोड़कर क़सम
गीतों के रेशमी नियम जैसे-
वैसे ही टूट गए हम

यह जीवन
धूप का कथानक था
रातों का चुटकला न था
पर्वत का
मंगलाचरण था यह
पानी का बुलबुला न था

आँगन का आयतन बढ़ाने
बढ़ने दो-चार सौ क़दम
हमने दीवार की तरह तोड़ी
परदों की साँवली शरम
मुट्ठी भर बाँधकर इरादे…

तीसरे दिन

मुझे हर तीसरे दिन
तीलियों का पुल बुलाता है
शाम कहती है- कहो क्या बात है?
एक शीशा टूट जाता है

बिखर जाती हैं सितारों की तरह किरचें
(नंगे) पाँव डरते हैं
और उड़-उड़कर क़िताबों के नए पन्ने
मना करते हैं
बदन सारा कसमसाता है

धूल में मैली हुई है
पर न मैली हुई जो मन से
झाँकती है जब कभी तस्वीर वह
कभी खिड़की, कभी आँगन से
नींद की दो डोरियों के बँधे पाँवों में
कौन है जो थरथराता है ?
एक शीशा टूट जाता है।

दिन अधमरा देखने

दिन अधमरा देखने
कितनी भीड़ उतर आई
मुश्किल से साँवली सड़क की
देह नज़र आई ।

कल पर काम धकेल आज की
चिन्ता मुक्त हुई
खुली हवाओं ने सँवार दी
तबियत छुइ-मुई

दिन की बुझी शिराओं में
एक और उमर आई ।

फूट पड़े कहकहे,
चुटकुले बिखरे घुँघराले
पाँव, पंख हो गए
थकन की ज़ंजीरों वाले

गंध पसीने की पथ भर
बतियाती घर आई

जिस दिन से आए

जिस दिन से आए
उस दिन से
घर में यहीं पड़े हैं
दुख कितने लंगड़े हैं ?

पैसे,
ऐसे अलमारे से
फूल चुरा ले जायें बच्चे
जैसे फुलवारी से

दंड नहीं दे पाता
यद्यपि-
रँगे हाथ पकड़े हैं ।

नाम नहीं लेते जाने का
घर की लिपी-पुती बैठक से
काम ले रहे तहख़ाने का
धक्के मार निकालूँ कैसे ?

ये मुझसे तगड़े हैं ।

वक़्त तलाशी लेगा

वक़्त तलाशी लेगा
वह भी चढ़े बुढ़ापे में
सँभल कर चल ।

कोई भी सामान न रखना
जाना-पहचाना
किसी शत्रु का, किसी मित्र का
ढंग न अपनाना

अपनी छोटी-सी ज़मीन पर
अपनी उगा फसल
सँभल कर चल ।

ख्वारी हो सफ़ेद बालों की
ऐसा मत करना
ज़हर जवानी में पी कर ही
जीती है रचना

जितना है उतना ही रख
गीतों में गंगाजल
वे जो आएंगे
छानेंगे कपड़े बदल-बदल
सँभल कर चल ।

मरने दे बन्धु 

मरने दे बन्धु!
उसे मरने दे

एक रोगी की तरह जो दोस्ती
रोज़ खाती है दवाई चार सिक्के की
और फिर चलती बड़े अहसान से
चाल इक्के की
जो अँगूठी
रोज़ उँगली में करकती है
उतरने दे

मोल के ये दिन, मुलाक़ातें गरम
सामने भर का घरेलूपन
चाय-सी ठंडी हँसी, आँखें तराजू,
एक टुकड़ा मन
खोलने इस बन्दगोभी को
एक दिन तो बात करने दे

मरने दे बन्धु!
अरे! मरने दे

बन्धु रे

बन्धु रे!
हम-तुम
घने जंगल की तरह होते
नम भर वाले अगर
थकते नहीं ढोते
बन्धु रे, हम-तुम!

फिर न रेगिस्तान होते
देह में ऐसे
फिर न आते क्षर पर
मेहमान हों जैसे
हड्डियों को काटती क्यों
औपचारिकता
खोखली मुस्कान की
तह में नहीं रोते
बन्धु रे, हम-तुम!

चेहरों से उड़ गई
पहचान बचपन की
अजनबी से कौन फिर
बातें करे मन की
बात करने के लिए
अख़बार की कतरन

फेंक देते हैं हवा में
जागते-सोते
बन्धु रे, हम-तुम!

दृष्टि स्नेहिल
दूसरों के वास्ते रख कर
ख़ून हो कर
हो गये नाख़ून से बदतर
कनखियों के दंश
दरके हुए आँगन की
आड़े में काँटे नहीं बोते
बन्धु रे, हम-तुम!

मुझ निर्धन का धन है

मुझ निर्धन का धन है
एक दिन
रविवारे मत आना

धीमी दिनचर्या के
आस-पास अपनापन
दर्पण का एक वचन
मुश्किल से मिलता है
साँचे का लोह-बदन
एक दिन पिघलता है

और किसी दिन
चाहे आ जाना
मत आना, रविवारे मत आना

फूल हो के 

फूल हो के

टहनियों की छातियाँ उठने लगी हैं
गीत मेरे
अब न खा जाना कहीं धोखे
फूल हो के

रंग आये हैं
लुभाने पाँव लेकर
जिस तरह
मल्लाह आये नाव लेकर

(इन्द्रधनु वातावरण में
खो न जाना फूल हो के)

गीत मेरे
बड़ी मुश्किल से तुम्हें
मोड़ा गया धूप ढो के

 

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