योगेंद्रकुमार लल्ला की रचनाएँ

हल्ला-गुल्ला

एक आम का पेड़, लगा था
उस पर बहुत बड़ा रसगुल्ला,
उसे तोड़ने को सब बच्चे
मचा रहे थे हल्ला-गुल्ला!
पर मेरी ही किस्मत में था
उसको पाना, उसको खाना!
मैंने देखा स्वप्न सुहाना!

सारे बच्चे इम्तहान के दिन
बैठे थे अपने घर पर,
खुली किताबें रखीं सामने
सभी पास हो गए नकल कर!
पर मेरी ही किस्मत में था
सब बच्चों में अव्वल आना
मैंने देखा स्वप्न सुहाना!

ओलंपिक के खेल हो रहे
भारत के ही किसी नगर में,
बच्चा-बच्चा खेल रहा था
घर-आँगन में डगर-डगर में!
पर मेरी ही किस्मत में था
सारे पदक जीतकर लाना
मैंने देखा स्वप्न सुहाना!

कर दो हड़ताल

कर दो जी, कर दो हड़ताल,
पढ़ने-लिखने की हो टाल।
बच्चे घर पर मौज उड़ाएँ,
पापा-मम्मी पढ़ने जाएँ।

मिट जाए जी का जंजाल,
कर दो जी, कर दो हड़ताल!

जो न हमारी माने बात,
उसके बाँधो कस कर हाथ!
कर दो उसको घोटम-घोट,
पहनाकर केवल लंगोट।

भेजो उसको नैनीताल,
कर दो जी, कर दो हड़ताल!

राशन में भी करो सुधार,
रसगुल्लों क हो भरमार।
दो दिन में कम से कम एक,
मिले बड़ा-सा मीठा केक!

लड्डू हो जैसे फुटबाल,
कर दो जी, कर दो हड़ताल!

हम भी अब जाएँगे दफ्तर,
बैठेंगे कुरसी पर डटकर!
जो हमको दे बिस्कुट टॉफी,
उसको सात खून की माफी।

अपना है बस, यही सवाल,
कर दो जी, कर दो हड़ताल!

तोते जी 

तोते जी, ओ तोते जी!
पिंजरे में क्यों रोते जी!

तुम तो कभी न शाला जाते,
टीचर जी की डाँट न खाते।
तुम्हें न रोज नहाना पड़ता,
ठीक समय पर खाना पड़ता।

अपनी मरजी से जगते हो,
जब इच्छा हो, सोते जी!
फिर क्यों बोलो, रोते जी!

तुम्हें न पापा मार लगाते,
तुम्हें न कड़वी दवा पिलाते!
तुम्हें न मम्मी आँख दिखाती,
तुम्हें न दीदी कभी चिढ़ाती!

खूब उछलते, खूब कूदते,
कभी नहीं चुप होते जी!
फिर क्यों बोलो रोते जी!

आओ, तुम बाहर आ जाओ,
मुझ जैसा बच्चा बन जाओ,
सबसे मेरे लिए झगड़ना,
पर दादी से नहीं बिगड़ना!

तुम ही मेरी बुढ़िया दादी-
के बन जाओ पोते जी!
अब क्यों बोलो रोते जी!

मेला

आओ मामा, आओ मामा!
मेला हमें दिखाओ मामा!
सबसे पहले उधर चलेंगे
जिधर घूमते उड़न खटोले,
आप जरा कहिएगा उससे
मुझे झुलाए हौले-हौले!
अगर गिर गया, फट जाएगा,
मेरा नया-निकोर पजामा!

कठपुतली का खेल देखकर
दो धड़की औरत देखेंगे,
सरकस में जब तोप चलेगी
कानों में उँगली रखेंगे!
देखेंगे जादू के करतब,
तिब्बत से आए हैं लामा!

फिर खाएँगे चाट-पकौड़ी
पानी के चटपटे बताशे,
बच जाएँगे फिर भी कितने
दूर-दूर से आए तमाशे!
जल्दी अगर न वापस लौटे,
मम्मी कर देंगी हंगामा!

-साभार: नंदन, जून 1992, 30

कमाल 

दुनिया में कुछ करूँ कमाल,
पर कैसे, यह बड़ा सवाल!

एक उगाऊँ ऐसा पेड़
जिसमें पत्ते हों दो-चार,
लेकिन उस पर चढ़कर बच्चे
देख सकें सारा संसार।
बड़े लोग कोशिश कर देखें
चढ़ने की, पर गले न दाल।

एक बनाऊँ ऐसी रेल
जिसमें पहिए हों दो-चार,
बिन पटरी, बिन सिग्नल दौड़े
फिर भी बड़ी तेज रफ्तार।
बटन दबाते ही जा पहुँचे
कलकत्ता से नैनीताल।

एक बनाऊँ ऐसी झील
जिसमें नाव चलें दो-चार,
पानी घुअने-घुटने हो पर
बच्चे तैरें पाँच हजार।
खिलें कमल की तरह टाफियाँ
ना खाएँ तो रहे मलाल।

-साभार: नंदन, जुलाई, 2005, 20

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