रंजना गुप्ता की रचनाएँ

नियति 

मै नियति की
क्रूर लहरों पर
सदा से ही
पली हूँ …

जेठ का हर
ताप सह कर
बूंद बरखा की
चखी है..
टूट कर हर बार
जुड़ती
वेदना मेरी सखी है..

मैं समय की
भट्टियों में
स्वर्ण सी पिघली
गली हूँ ..

मैं नदी संवेदना की
नत मुखी
बहती रही हूँ..
रक्त लथपथ
पत्थरों से
चोट खा खाकर
बढ़ी हूँ..

धार पर तलवार के
सौ बार मैं
बिछली चली हूँ ..

मैं नही सम्बन्ध की
मौलिक कोई
स्थापना हूँ …
जो मिला जी भर
ह्रदय से
मैं उसी की
याचना हूँ…

बस सुबह की
ओस सी गहरे
अंधेरों में ढली हूँ….

गाँव में 

आम बौराए झरी है
नीम मेरे गाँव में..
फूटता सेमल लिपटता
राह चलते पाँव में…

पात पीपल के पड़े पीले
हरे फिर हो गये..
और पाकड़ धूपिया
संवाद तन में बो गये…

चुभ गया काँटा करौंदे का
अभी बस पाँव में …

पक गये फल फूल
गूलर बेर के भी केर के..
मद भरा महुआ टपकता
है हवा को टेर के ..

मंजरी महकी है बाग़ों की
गमकती छाँव में..

ओढ़ती अनगढ़ नियति
मिट्टी सनी पगडंडियाँ…
द्वार से चौबार तक
बस नेह की हैं मंडियाँ..

मोर का नर्तन परखती
मोरनी हर ठाँव में …

‘फ़ुरसत’

फ़ुरसत वाले ख़ाली से दिन
नींद भरे कुछ बासी से दिन..

कहीं घुमक्कड़ लम्हें चुप हैं
घने अंधेरे काले घुप हैं..
कहीं साँकलों की खट खट
तो कहीं आहटें भी गुपचुप हैं….

ऊब रहे बेचारे से दिन
आवारा बंजारे से दिन ….

किश्तों में रातें बँट जाती
नीदें तकियों में छुप जाती..
घोर उदासी उमड़ घुमड़ कर
बीच ह्रदय आकर धँस जाती…

क़िस्मत के बँटवारे से दिन
बेकारी के भारी से दिन…

नदी एक आँखों में बसती
मन के उद्गगम से जो बहती…
पलकों की सीपी में बूँदे
मोती बन बन करके ढलती..

सागर जितने खारे से दिन
थके थके हैं हारे दिन….

दृष्टि

दृष्टि धुँधली हो गयी फिर
दीप तुम कुछ देर ठहरो…

मन हिरन घबरा रहा है
पाँव कँपते बीहड़ों में…
वेदना संवेदना बन
बँट गयी क्यों ..?
दो धड़ों में…

शब्द गूँगे हो गये अब
मौन से क्रंदन भरो….

दूर तक फैले हुए नभ ने
न कुछ ढाढ़स दिलाया…
आँख का तिनका
समझ कर
राह से तुमने हटाया…

ज़िद के निचले पायदानों
पर फिसलने से डरो…

अनकहे संवाद कितने
हो गये गोठिल सभी…
प्रीत के वातास झरते
हो गये
बोझिल अभी…

है बहुत गहरा कुहासा
रश्मियाँ कुछ तो करो….

हम नदी के पाट से
सूने रहे जन्मों जनम…
घात और
प्रतिघात सहते
मिट गये कितने भरम …

रात गहरी हो गयी फिर
नींद अब तो पग धरो….

शून्य 

कुछ पीड़ा का कम हो जाना
कुछ यादों का थम सा जाना..
एक विवर से नये शून्य तक
बढ़ जाना है ….

बंधी गले में जन्म मरण तक
कर्तव्यों की क्रूर शिलाएँ…
बोझा ढोते युग बीते है
पाँवों के तलवे पथराए…

कुछ संध्या का ढल सा जाना
मन के तलछट का हिल जाना…
अनजाने डर के पर्वत पर
चढ़ जाना है….

प्रश्नाकुल आँखों के घेरे
कुछ रातों के नहीं सवेरे…
बाँस कपास बिजूक़ा वाले
खेतों में साँपों के डेरे ….

कुछ मिथकों का सच हो जाना
कुछ सच का मिथ्या हो जाना…
पन्ने पन्ने यही ककहरा
पढ़ जाना है …..

झूठा पल झूठे है लम्हें
केवल दर्द हमारा होगा….
ऊँगली से भी छुआ नीर को
तो पोखर भी खारा होगा…

जब तब आँखों का भर आना
मुठठी से कण कण झर जाना….
काँप रहे अधरों की भाषा
गढ़ पाना है …..

आँसू

ढूंढ कर लाया है बादल
वो गिरा आँसू तुम्हारा..

द्वन्द की ये संधियाँ
संलाप की ये चुप्पियाँ..
एक पूँजी पति न जाने
बन गया क्यों सर्वहारा..

पृष्ठ अंकित है पुराने
रक्त स्याही के बहाने..
खुल गए है घाव सारे
दर्द का जर्जर किनारा …

कसमसाती वर्जनाएँ
तोड़ देती अर्गलायें…
आ ही जाती रौशनी
यदि ले दरारों का सहारा…

धुँध की चादर पड़ी है
एक मुश्किल की घड़ी है..
क्या हुआ जो व्यर्थ सारा
हो गया जीवन तुम्हारा ..?

बात केवल प्यास की थी
चुक गए विश्वास की थी..
टूट कर चाहा जिसे.
वह बन गया है सिंधु खारा ..

नदी बहती है

अहन्मन्यता के
अहँकार के पहाड़ों को
पार करती बहती है नदी

सौम्य शीतल जलधार
विरोध, अन्तर्विरोधों, बाधाओं को
ठेलती, परे धकेलती
फूटती है रसधार
निर्बाध, निरन्तर

विसँगतियों, वैमनस्यताओं के
दुर्गम पठार को करती दरकिनार
उत्तल उदधि के फेनिल तट
लहरो के कलरव, चञ्चल
अन्तर सी निर्मल

झर-झर बहती रहती है
नदी प्रेम की बहती है
कल-कल
छल-छल

बौने होते गीत

शब्दों के कँजूस कहार
जब नहीं ढो पाते
सम्वेदना की पालकी
तब गीत ठूँठ हो जाते हैं
और कविता की ज़मीन बँजर
हो जाती है

मगर निरँकुश दर्द की उद्दाम
बिछलन को रोक कर
हमे एक बान्ध बनाना ही होगा
वरना कतरा-कतरा बहती नदी रोक पाएगी
अपने अजन्मे शिशु के गर्भपात को

नदी का / जंगल का होना
हमारे होने से भी ज़्यादा ज़रूरी है
हमारी पीढ़ियों का ज़िक्र
तारीख़ों में तब्दील हो
उससे पहले
हमे अपनी सम्वेदना, अपना दर्द, अपना अंश
बचाना ही होगा

निपटना होगा
उन मनहूस दुराशाओं, दुरभिसन्धियों से
जो हवा पानी, नदी, जँगल, ज़मीन और पहाड़
सबके ख़िलाफ़ लामबन्द हो रही है

ये औरतें 

सदियों से
गले में आँसुओं को
घुटकती औरतें

सदियों से क्यों चुप रही औरतें
सदियों से ग़ुलामी की
अभ्यस्त औरतें

जब भी माँगती है अपने पुरुषों से
माँगती है बस
गहने, कपड़े, हीरे, जवाहरात
ज़मीन और जायदादें

पर क्यों नही माँग सकीं
वे मुर्दा औरतें
आज तक अपने पुरुषों से
अपने लिए, अपनी आज़ादी
अपने फ़ैसले
अपनी अस्मिता
अपना वजूद !

वक़्त की आहट

तुम्हारे शब्द
तलवार की तरह काट देते हैं
मेरा अँग-अँग
बघनखे की तरह छील देते है मेरी अन्तरात्मा
और उन घावो पर तुम्हारी कुटिल हँसी
तीखे तेज़ाब की तरह जेहन में उतरती है
चीर देती है मेरे जिस्म को आर-पार

पर तुम शायद भूल गए हो कि
वक़्त कभी किसी का सगा नही होता
आज तुम्हारे साथ है, कल मेरे साथ
खड़ा होगा
किसी विशाल वृक्ष को काटने से नही
ख़त्म होती उसकी विरासतें
उसके पनपने की सम्भावनाएँ

जड़ों में कभी उपयुक्त अवसर पाकर अँकुरण फूटेगा
फिर शाखाओं / कोपलों और फुनगियों के
घने छतनार विकसेंगे
जिसकी भरपूर छायाएँ मीलों पसर जाएँगी
हज़ारों-हज़ार परिन्दों का घर
उसके कोटरों में घनीभूत छाया में होगा
लेकिन तब तक तुम्हारी हवेलियाँ
खण्डहर बन चुकी होंगी
और विवश होकर
अपने जलते वजूद को दफ़नाने
इस छायादार वृक्ष के नीचे तुम्हें आना ही पड़ेगा

फिर मैं लौटूँगी किसी दिन
किसी समय / किसी जन्म में तुम्हारा उधार चुकाने
तुम्हें तुम्हारी पीड़ा से अवमुक्त कराने
और तभी होगा
इस प्रहसन का पटाक्षेप
तुम्हारी और मेरी दोनों कई पीड़ाओं का अन्त

पीर है ठहरी

पीर है ठहरी ह्रदय में जाँचती
द्वन्द या दुविधा दृगों से बाँचती

आस के उत्कल बसन्ती थे कभी
रात ठहरी है भुजाओं में अभी
श्वास में खँजर
हवाएँ काँपतीं

प्रीत के पन्ने सभी निकले फटे
घाव थे कल तक दबे वे सब खुले
पट्टियाँ फिर भी
व्यथाएँ बान्धतीं

रोकती मुझको मेरी ही मर्ज़ियाँ
दौड़ती है पसलियों में बर्छियाँ
दस्तकें फिर भी
कहा ना मानतीं

बँसवट तो है सुगन्धों से लदे
हम कहीं गहरे कुएँ में थे धँसे
दर्द कितना है
ये कैसे नापतीं

राग बसन्ती

फूलती सरसों कुहुकती कोयलें
आम बौराए महकती कोपलें

ऋतु बसन्ती की बजी है पैंजनी
पाँव में लिपटी मधुर सी चाशनी
ज्वार बनते
जा रहे हैं हौंसले

धूप के परचम सुनहरे हो गए
पल उनींदे रस भरे दिन हो गए
गीत गन्धा
लेखनी के फैसले

सुस्त तन की मस्त मन की आहटें
आ गया फागुन बताशे बाँटने
ढोल-ताशे
मिल रहे जैसे गले

रँग उत्सव राग धर्मी चेतना
बाँसुरी पिचकारियों की अर्चना

फिर हठी
मधुमास के शिकवे-गिले ।

वे दिन

सुरमई वो धूप वाले दिन गए
रँग भीगे बादलों के दिन गए

कर्ज से भी सूद महँगा हो गया
घोंसला चिड़िया का ख़ाली हो गया
तोतली बातों
भरे वे दिन गए

झुरमुटों के क़ैद थोड़ी चाँदनी
बाँसुरी में घुट रही है रागिनी
छन्द के गीतों भरे
वे दिन गए

सभ्यताएँ जँगली सब हो गईं
जन्म से पहले गलतियाँ हो गईं
जो दिलासे के बचे
थे दिन गए

रोटियों से चान्द सस्ता हो गया
हरिया बचपन में ही बूढ़ा हो गया
भूख की इस आँच में
जल तन गए

खोखले सन्दर्भ जीवन के रहे
खेत फिर इस साल बोए बिन रहे
धान की फ़सलों
भरे वे दिन गए

योजना असफल

योजना असफल विफल सब युक्तियाँ
ताश के जैसी तिलिस्मी रिक्तियाँ

वक्त बँजारा हुआ दिग्भ्रान्त-सा
सारथी है डिग रहा विश्वास का ।
स्याह बादल को
लिखी हैं चिट्ठियाँ ।

अवाक हैं आँखें बुढ़ाती आस की
उम्र बढ़ती ज्यों अकल्पित प्यास की
शब्द तरकश में नहीं हैं
मौन की ये चिट्ठियाँ

स्वजन सँघाती हुआ सब कुछ हवन
चेतना के आत्मघाती उपकरण
कुश पवित्री
श्लोक हो या सिद्धियाँ

वन पलाशों के लदे यूँ फूल से
बिम्ब सब धुन्धले हुए थे धूल से
उथली नदी की
कोख में ज्यों मछलियाँ

ये अनिष्टों के परिन्दे रक्त प्यासे
उड़ रहे आपात के बादल बनाते
घातकी हैं
सूर्य की भी रश्मियाँ

स्वार्थी मौसम निरँकुश देश का
बेवजह कुचले गए प्रतिरोध का
शुभ नहीं हैं
लाभ की ये तख़्तियाँ

हाट और बाज़ार

हाट और बाज़ार की
ये सँकरी सी वीथियाँ
जल रहीं इनसानियत
की खेतियाँ

झूठ और पाखण्ड की सँजीदगी
मज़हबी उन्माद की कुछ बानगी
रक्त लथपथ
गीत की हैं पँक्तियाँ

स्वाद तीखा सा कसैला सत्य का
क़त्ल युग के एक पूरे कथ्य का
मोल कौड़ी बिक
रही हैं हस्तियाँ

धर्म ईश्वर चुन दिए दीवार में
औलिया जीसस खड़े लाचार से
आस्था की उड़
रही हैं धज्जियाँ

प्रश्न भाषा जाति का रँग का नहीं
दब चुके हैं बर्फ़ में रिश्ते कही
उठ गईं
सम्वेदना की अर्थियाँ

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